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दफ्तर की रफ़्तार भरी ज़िंदगी से मिले तनाव का 'रामबाण इलाज'
- Author, रॉबर्ट कोलवाइल
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
रफ़्तार ही ज़िंदगी है. अगर कोई चीज़ जड़ है, तो मानो वो ज़िंदा नहीं मुर्दा है.
इंसान की ज़िंदगी की बात करें, तो हर गुज़रते पल के साथ हमारी ज़िंदगी की रफ़्तार तेज़ होती जा रही है.
इंसानों के पुरखे कभी गुफ़ाओ में रहा करते थे. और आज आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार हो गई है हमारी ज़िंदगी.
मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वो यूरोप से कॉनकॉर्ड विमान से न्यूयॉर्क गए थे. कॉनकॉर्ड विमान आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार से चलता था. इसे अस्सी के दशक में फ्रांस और ब्रिटेन ने मिलकर बनाया था. तो, दिलीप साहब ये देखकर हैरान रह गए कि इतने तेज़ रफ़्तार विमान से भी अपनी मंज़िल पर पहुंचकर लोग भागते हुए एयरपोर्ट से निकल रहे थे. उनका मानना था कि आज की नस्ल भागमभाग वाली ही है. आराम से काम ही नहीं होता.
ख़ैर, दिलीप साहब के तजुर्बे से इतर आज रफ़्तार ही तरक़्क़ी और कामयाबी का पैमाना है. फलां गाड़ी इतनी तेज़ चलती है. उसकी इंटरनेट की स्पीड इतनी ज़्यादा है. वो काम बहुत तेज़ कर लेता है. कुल मिलाकर, स्पीड इज़ लाइफ़.
बीते कुछ दशकों में दुनिया ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है. रोज़गार के नए मौक़े सामने आए हैं. लोगों की ज़िंदगी में तेज़ी आई है. तेज़ी से आगे बढ़ती तकनीक ने इसमें बहुत अहम किरदार निभाया है.
दिलीप कुमार जैसे बहुत से लोगों को इस तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी से शिकायतें हैं. उनके मुताबिक़ आज लोग एक दूसरे से दूर हो गए हैं. अपने काम की डेडलाइन पूरा करने के लिए सब सिर्फ़ दौड़ रहे हैं.
कंपनियों ने छीना सुकून
मल्टीनेशनल कंपनियों ने तो इंसान से उसका सुकून ही छीन लिया है. हालांकि ये कंपनियां अपने कर्मचारियों को बहुत सी सहूलतें देती हैं लेकिन उसके बदले में क़ीमत भी उसी तरह वसूलती हैं. दिन शुरू होने के साथ ही ख़त्म हो जाता है, लेकिन हमारा काम ख़त्म नहीं होता. काम का प्रेशर लोगों की ज़िंदगी में तनाव बढ़ा रहा है.
आज ज़्यादातर नौकरीपेशा लोगों की शिकायत है कि उन्हें अपनी मर्ज़ी का काम करने का मौक़ा नहीं मिलता. रोज़गार की दौड़ में भागते-भागते उनके शौक़ पीछे छूटते जा रहे हैं.
एक रिसर्च के मुताबिक़ 94 फ़ीसद लोग मानते हैं कि उन्हें अपने सभी काम वक़्त पर करने के लिए समय नहीं मिल पाता. घर पर रहते हुए भी ऑफिस का तनाव बना रहता है. लगातार मिलने वाले इस तनाव की जड़ है ऑफिस ई-मेल. गैजेट्स ने हमारी ज़िंदगी को ऐसे जकड़ा है कि निजात नहीं मिलती.
अमरीका में किए गए एक सर्वे के मुताबिक़ आधे से ज़्यादा ऐसे लोग हैं जो अपनी छुट्टियां भी बेफ़िक्र होकर नहीं गुज़ार पाते. वो इसी तनाव में रहते हैं कि चंद दिनों की छुट्टी के बाद जब ऑफ़िस जाएंगे तो काम का पुलिंदा उनका इंतज़ार कर रहा होगा.
कहा जाता है कि जो लोग ऑफिस में ज़्यादा समय बिताते हैं उन्हें दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
क्रिएटिव सोच को खत्म करता है ऑफिस का तनाव
बहुत से जानकारों का कहना है कि काम का ये तनाव हमारी रचनात्मक क्षमता यानी क्रिएटिव सोच को ख़त्म कर रहा है. रचनात्मक सोच के लिए दिमाग़ी सुकून बहुत ज़रूरी है. आज इस दौड़ती भागती ज़िंदगी में सुकून की ही सबसे ज़्यादा कमी है.
कोई भी इंसान एक वक़्त में एक ही काम कर सकता है. लेकिन काम की मार ऐसी है कि हम एक साथ कई कामों में उलझे रहते हैं.
जैसे, आप किसी काम में ध्यान लगाकर उसे पूरा करने की कोशिश में हैं, लेकिन तभी कोई ई-मेल आ जाती है जिसका तुरंत जवाब देना है तो आपका अपने काम से फोकस हट जाता है.
2005 में की गई एक रिसर्च के मुताबिक़ हम बिना किसी बाधा के किसी काम में 11 मिनट ही फोकस कर सकते हैं. हाल ही में की गई एक और रिसर्च से पता चलता है कि जो कर्मचारी कम से कम मेल देखते हैं वो तनाव का शिकार कम होते हैं और उनका अपने काम पर ध्यान ज़्यादा होता है.
कुछ जानकार ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि मसरूफ़ ज़िंदगी के कुछ नकारात्मक पहलू ज़रूर हैं. लेकिन इस नेगेटिविटी में पॉज़िटिव बातें छिपी हैं.
1999 में हुए एक एक रिसर्च के मुताबिक़ जो लोग ज़्यादा तनाव के माहौल में रहते हैं उनमें चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता बढ़ जाती है. साथ ही वो ज़्यादा रचनात्मक तरीक़े से सोचने लगते हैं. तनाव का एक सकारात्मक पहलू ये भी है कि चुनौतियों को पूरा करने के बाद जिस ख़ुशी का एहसास होता है वो बयान करना मुश्किल है.
क्या तनाव लेने के लिए तैयार हैं लोग?
बहुत से सर्वे ज़ाहिर करते हैं कि लोग आज इस तरह का तनाव लेने के लिए तैयार हैं. नौजावनों में चुनौती क़बूल करने का माद्दा ज़्यादा होता है. ब्रिटेन में दस में से आठ कर्मचारी अपने काम से ख़ुश हैं.
पूरे यूरोप में 74 फ़ीसद लोग अपने काम से मुतमईन हैं. अमरीका में ये आंकड़ा 88 फ़ीसद का है. लंबे वक़्त से ये आंकड़ा या तो यूं ही बना हुआ है या इसमें इज़ाफ़ा हुआ है. लेकिन कमी कभी नहीं आई.
बदलते आर्थिक माहौल ने काम के रूप को भी बदला है. मसलन, अभी तक जो काम हाथ से होते थे, अब उनकी जगह मशीनों ने ले ली है. मशीनों के ज़रिए वो काम अब आसान हो गए हैं और ख़तरा कम हो गया है. काम की जगह पर ज़ख़्मी होने वाले मज़दूरों की संख्या में काफ़ी कमी आई है.
हालांकि बहुत से लोगों का कहना है कि मशीनों के आ जाने से रोज़गार कम हो जाएगा. लेकिन वो ये भूल जाते हैं नई तकनीक के साथ रोज़गार के मौक़े बढ़ेंगे. समय बचेगा तो दूसरे कामों के लिए उसका इस्तेमाल हो सकेगा.
राहत के लिए क्या करें?
इसमें कोई शक नहीं कि आज की मसरूफ़ ज़िंदगी तनाव देती है. लेकिन अगर आप चाहें तो छोटी-छोटी बातों पर अमल करके ख़ुद को इस तनाव से दूर रख सकते हैं.
- कुछ देर के लिए ई-मेल नोटिफिकेशन बंद कर दीजिए
- अपने काम की जगह से चंद मिनटों के लिए उठ कर बाहर खुली हवा में टहल आइए.
- ऑफिस की बातों को दिल से ना लगाकर सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान केंद्रित करके अपने ऑफिस, काम और मसरूफ़ जिंदगी का मज़ा लीजिए.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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