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हज के दौरान पालन किए जाने वाले इन आठ रिवाजों का इतिहास
- Author, तारेकुज्जमां शिमुल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
हज मुसलमानों का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है. यह इस्लाम की पाँच मौलिक बुनियादों में से एक है. यह शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हर मुसलमान के लिए फ़र्ज़ या ज़रूरी है.
यही वजह है कि हर साल एक तय समय पर दुनिया भर से मुस्लिम देशों के लाखों पुरुष और महिलाएं हज करने के लिए सऊदी अरब के शहर मक्का में जुटते हैं.
अरबी साल के आख़िरी महीने ज़िलहज को हज का महीना कहा जाता है. इसकी वजह यह है कि उस महीने की आठवीं से बारहवीं तारीख़ तक हज की मुख्य रस्मों का पालन किया जाता है.
एक मुसलमान को हज पूरा करने के लिए कई रीति-रिवाजों का पालन करना पड़ता है.
उनमें हज के लिए ख़ास किस्म की पोशाक पहन कर मक्का में प्रवेश करना, काबा की परिक्रमा करना, अराफात मैदान में रहना, सफा और मरवा पहाड़ों के बीच दौड़ना, शैतान पर पत्थर फेंकना, पशुओं की कुर्बानी देना और सिर मुंडाने जैसी प्रथा शामिल हैं.
मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि इस्लाम धर्म के प्रचलन से पहले भी सैकड़ों साल से मक्का में हज लगभग इसी तरह मनाया जाता था.
तो हज के रीति-रिवाज कब और कैसे शुरू हुए थे? इन रिवाजों के पीछे की कहानी और निहितार्थ क्या हैं?
इहराम में सफ़ेद लिबास पहनना
हज के मामले में जिस पहले रिवाज का पालन करना होता है वह है ‘इहराम’. मक्का से दूर रहने वालों को मक्का जाने के रास्ते में एक तयशुदा जगह पर पहुँच कर इहराम संपन्न करना होता है.
अरबी शब्द 'इहराम' उस स्थिति को बताता है, जिसमें कोई व्यक्ति ख़ुद को हर तरह के पाप और निषिद्ध गतिविधियों से दूर रखता है.
ढाका विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर मोहम्मद उमर फ़ारुख़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "आसान भाषा में कहें तो इहराम हज का इरादा करने और इसके लिए तयशुदा लिबास को धारण करना है."
इस ख़ास चरण के प्रतीक के रूप में पुरुषों को बिना सिला हुआ दो टुकड़े वाले सफेद कपड़ा पहनना पड़ता है.
कनाडा के इस्लामिक सूचना और दावा केंद्र के पूर्व अध्यक्ष डॉ. साबिर अली एक इंटरव्यू में बताते हैं, "यह देखने में काफ़ी हद तक कफन के कपड़े जैसा लगता है. इहराम के समय ऐसे कपड़े पहनने का मतलब यह समझाना है कि हम सृष्टिकर्ता के साथ साक्षात्कार के लिए तैयार हैं."
पुरुषों के मामले में सफ़ेद कपड़े पहनने का प्रावधान होने के बावजूद महिलाओं के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. वो चाहें तो किसी भी रंग का ढीला-ढाला लिबास पहन सकती हैं.
मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि पैग़ंबर इब्राहिम अरब में हज करने वाले पहले व्यक्ति थे. ईसाई धर्म का पालन करने वाले उनको इब्राहिम के नाम से जानते हैं.
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ़ारुख़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, “काबा के निर्माण के बाद हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह के आदेश पर हज करना शुरू किया और उसी समय सफ़ेद कपड़े पहनने के साथ ही हज के तमाम रीति-रिवाज शुरू किए गए.”
बाल और नाखून नहीं काटना
इहराम धारण करने के बाद हज ख़त्म करने से पहले हज यात्रियों को कई नियमों का पालन करना पड़ता है.
इनमें किसी से झगड़ा या विवाद नहीं करना, यौन संबंध बनाने से दूर रहना, बाल और दाढ़ी नहीं काटना, हाथ-पैर के नाखून नहीं काटना, जीव हत्या या रक्तपात नहीं करना और चुगली करने या दूसरों के निंदा से दूर रहना शामिल है.
मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि सफ़ेद कपड़े पहनने की तरह ही इन नियमों को भी पैग़ंबर इब्राहिम के समय शुरू किया गया था.
कनाडा के इस्लामिक सूचना और दावा केंद्र के पूर्व अध्यक्ष साबिर अली कहते हैं, "इन नियमों के पालन के ज़रिए यह बताया जाता है कि हम लोग हज के समय सृष्टिकर्ता की नज़दीकी हासिल करने की उम्मीद में एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, जहाँ हमें सजने-संवरने जैसी सांसारिक चीज़ों पर ध्यान देने की भी इच्छा नहीं होती."
काबा की परिक्रमा
इहराम के बाद हज पालन का दूसरा रिवाज है, इस्लाम के सबसे पवित्र स्थान काबा की सात बार परिक्रमा.
हजयात्री आमतौर पर पैदल ही वामावर्त दिशा (घड़ी की काँटे के घूमने की उल्टी दिशा) में काबा की परिक्रमा करते हैं.
मुस्लिम विद्वान मानते हैं कि यह रिवाज भी बनी इब्राहिम के समय ही शुरू हुआ था. लेकिन उनका कहना है कि यह साफ नहीं है कि परिक्रमा वामावर्त क्यों की जाती है और सात बार ही क्यों की जाती है.
मुस्लिम विद्वान डॉ. साबिर अली ‘लेट द करोना स्पीक’ शो में कहते हैं, "इसके पीछे की असली वजह और रहस्य सृष्टिकर्ता ही सबसे अच्छी तरह जानता है.”
हालाँकि, इस्लाम के कुछ जानकारों का मानना है कि जन्नत में 'बैतुल मामूर' नामक जिस पवित्र घर के चारों ओर फरिश्ते चक्कर लगाते हैं, काबा के तवाफ़ की उससे काफ़ी समानता है.
अली कहते हैं, "इसी वजह से काबा को बैतुल्लाह या अल्लाह का घर कहा जाता है. हाजी यह दिखाने के लिए इस पवित्र घर की सात बार परिक्रमा करते हैं कि वे सृष्टिकर्ता की प्रतीक्षा कर रहे हैं."
इस्लामी चिंतकों का कहना है कि हज के इस रिवाज का पालन इस्लाम-पूर्व काल में भी किया जाता था.
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ. मोहम्मद उमर फारूक़ कहते हैं, "यह हज़रत इब्राहिम के समय से ही था."
इस्लामी चिंतकों को कहना है कि इस्लाम के नबी का जन्म होने तक काबा तवाफ के रिवाज में मामूली बदलाव देखा गया.
फारूक़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "पता चलता है कि उस समय अरब के लोग निर्वस्त्र होकर काबा की परिक्रमा करते थे. बाद में इस्लाम ने इसे रोक दिया और इब्राहिम की ओर से शुरू किए गए मूल रिवाज पर लौट आया."
सफ़ा-मरवा के बीच दौड़ लगाना
सफ़ा और मरवा पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ना हज पालन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
इस्लाम के अनुसार, पैग़ंबर इब्राहिम ने अल्लाह के आदेश पर अपनी पत्नी हाजिरा और नवजात बेटे इस्माइल को मक्का में सफा और मरवा के पहाड़ों के पास छोड़ दिया था. जब वहां पानी ख़त्म हो गया तो हाजिरा ने पानी की तलाश में सफा और मारवा पहाड़ियों के बीच की जगह पर सात बार दौड़ लगाई थी.
उसके बाद अल्लाह के निर्देश पर वहां एक कुआँ बन गया और हाजिरा और उसके नवजात पुत्र ने उसमें से पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई. वह कुआँ बाद में ‘जमजम कुआँ’ के नाम से मशहूर हुआ.
कनाडा के इस्लामिक सूचना केंद्र के पूर्व अध्यक्ष साबिर अली कहते हैं, हज के लिए जाकर सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ने के जरिए इस्माइल औन उनकी मां हाजिरा की उसी घटना तो सांकेतिक तौर पर याद किया जाता है.
अराफ़ात मैदान में रहना
मीना में रात बिताने के बाद दूसरे दिन हजयात्री अराफ़ात के मैदान के लिए रवाना हो जाते हैं. उसके बाद पूरे दिन वहां रह कर दुआ करना का एक महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना जाता है. उसके बाद शाम को हजयात्री मुजदलिफ़ा के लिए रवाना होकर वहीं खुले आसमान के नीचे रात बिताते हैं.
मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि मीना से लेकर मुज़दलिफ़ा तक पालन किए जाने वाले तमाम कर्मकांडों में पैगंबर इब्राहिम और उनकी पत्नी और बेटों का इतिहास भी शामिल है. उनका यह भी कहना है कि इसके अलावा गर्मियों में पूरे दिन अराफ़ात मैदान में रहने के बाद मुज़दलिफ़ा में खुले आसमान के नीचे रहने का भी विशेष आध्यात्मिक महत्व है.
ढाका विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. मोहम्मद उमर फारूक़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "अराफ़ात और मुज़दलिफ़ा में रहकर तीर्थयात्री यह महसूस कर सकते हैं कि नेक कर्मों के बिना सांसारिक धन, प्रसिद्धि और प्रभाव, कर्मों के अंतिम लेखा-जोखा में हमारे काम नहीं आएंगे."
वहीं, कई लोगों का यह भी कहना है कि हज के दौरान अराफ़ात और मुज़दलिफ़ा में लाखों लोगों का जमावड़ा इस्लामिक 'हशर के क्षेत्र' या न्याय के दिन की याद दिलाता है.
शैतान को पत्थर मारना
हज के सबसे महत्वपूर्ण रिवाजों में से एक शैतान पर पत्थर फेंकना है. मुज़दलिफ़ा से आते समय तीर्थयात्री सात कंकड़ या छोटे पत्थर लेकर मीना आते हैं. वहां शैतान के नाम पर एक प्रतीकात्मक दीवार बनाई गई है जिसे 'बड़ा जमरात' के नाम से जाना जाता है. हजयात्री अपने साथ लाए सातों पत्थरों को उस दीवार पर फेंकते हैं.
मीना में शैतान की ऐसी दो और दीवारें हैं. हज के आख़िरी दो दिनों में उन भी पर सात-सात पत्थर फेंके जाते हैं.
मोहम्मद उमर फारुक़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "शैतान की बुरी योजना से बचने के लिए हजरत इब्राहिम ने उस पर पत्थर फेंके थे. शैतान की दीवार पर प्रतीकात्मक पथराव की शुरुआत वहीं से हुई थी."
इस्लाम के मुताबिक, अल्लाह ने पैग़ंबर इब्राहिम से अपनी सबसे प्रिय संपत्ति की क़ुर्बानी या बलिदान देने को कहा. उसके बाद इब्राहिम ने अपने प्रिय पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने का फ़ैसला किया. इस्माइल ने भी पिता के फ़ैसले को कबूल कर लिया. इसके बाद इब्राहिम अपने बेटे के साथ अराफात के खुले रेगिस्तान में चले गए.
वहां इस्माइल की क़ुर्बानी देने के लिए जाते समय शैतान ग़लत सलाह देकर पैग़म्बर इब्राहिम के काम में बाधा डालने की कोशिश कर रहा था. वैसी स्थिति में इब्राहिम ने तीन जगहों पर शैतान को निशाना बना कर पत्थर फेंके.
मुस्लिम विद्वानों की राय में उसी घटना की याद में आगे चल कर हज में पत्थर फेंकने का रिवाज शुरू हुआ.
पशुओं की क़ुर्बानी
मीना में शैतान पर पत्थर फेंकने के बाद पशुओं की क़ुर्बानी देने का रिवाज है. मुसलमानों का मानना है कि इस प्रथा से भी पैग़ंबर इब्राहिम का इतिहास जुड़ा हुआ है.
लोग मानते हैं कि अल्लाह के निर्देश पर पैग़ंबर इब्राहिम अपने नवजात पुत्र इस्माइल की क़ुर्बानी देने अराफात के मैदान में ज़रूर ले गए थे, लेकिन आख़िरकार वैसा कुछ नहीं हुआ था यानी उन्होंने पुत्र की क़ुर्बानी नहीं दी थी.
अल्लाह इब्राहिम के विश्वास और आज्ञाकारिता से प्रसन्न हुए और इस्माइल की जगह एक पशु की क़ुर्बानी दी गई थी.
इस्लामी चिंतकों का कहना है कि उस घटना की याद में ही हज के तीसरे दिन गाय, बकरी, भैंस या ऊंट की कुर्बानी दी जाती है. उनका मानना है कि मुख्यतः अल्लाह के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए ही यह क़ुर्बानी दी जाती है.
उसी दिन ईद-उल-अज़हा या क़ुर्बानी की ईद का भी पालन किया जाता है. इस्लामी-पूर्व काल में भी पशुओं की क़ुर्बानी की यह प्रथा प्रचलित थी.
ढाका विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. मोहम्मद उमर फारूक़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "उस समय देवी-देवता के नाम पर क़ुर्बानी दी जाती थी. आगे चल कर मक्का में इस्लाम की स्थापना के बाद पैग़ंबर इब्राहिम की ओर से शुरू की गई क़ुर्बानी की परंपरा को दोबारा शुरू किया गया था."
सिर मुंडवाना
सिर मुंडवाना भी हज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. पशुओं की कुर्बानी के बाद उसी दिन सिर मुंडाया जाता है.
डॉ. मोहम्मद उमर फारूक़ बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "बाल मुंडवाना मूल रूप से हज की शुरुआत में इहराम की स्थिति से मुक्ति के प्रतीकात्मक कार्यों में से एक है."
लेकिन महिला हाजियों को पूरी तरह सिर नहीं मुंडाना पड़ता. वो सिर के बाल के सामने का कुछ हिस्सा काट कर फेंक सकती हैं.
इस्लामिक चिंतकों के मुताबिक, बाल मुंडवाने की यह प्रथा पैग़ंबर इब्राहिम के समय से चली आ रही है. उनका यह भी मानना है कि हज करने के परिणामस्वरूप व्यक्ति में जो बदलाव आता है, वह बाल कटवाने से प्रतीकात्मक रूप से विकसित होता है.
मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि बाल काटने से हज का इहराम टूट जाता है. इसी वजह से उसके बाद दाढ़ी बनाने या हाथ और पैर के नाखून काटने में कोई बाधा नहीं है.
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