ट्रंप की वापसी सऊदी अरब और ईरान के लिए कैसी है, क्या मध्य पूर्व में थमेगा टकराव?

अमेरिका-सऊदी अरब संबंध

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इमेज कैप्शन, डोनाल्ड ट्रंप का बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति का पहला कार्यकाल सऊदी अरब से उनके अच्छे संबंधों के लिए जाना जाता है.
    • Author, फ़्रैंक गार्डनर
    • पदनाम, बीबीसी सुरक्षा संवाददाता, रियाद से

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में सोमवार को अरब और इस्लामी देशों के शिखर सम्मेलन में 50 से अधिक नेताओं ने हिस्सा लिया.

इसके साथ ही ये बहस तेज़ हो गई कि व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के मध्य-पूर्व के लिए क्या मायने हो सकते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप किस मामले में कब क्या रुख़ अख़्तियार कर लें, कहा नहीं जा सकता. ट्रंप के इस रवैये को लेकर यूरोप में खासा डर है. लेकिन दूसरी ओर, ऐसा लगता है कि अरब देश उनकी वजह से अपने क्षेत्र में स्थिरता की उम्मीद कर रहे हैं.

अरब न्यूज़ में छपे अपने कॉलम में संयुक्त अरब अमीरात के एक प्रमुख कारोबारी ख़लफ़ अल-हब्तूर ने लिखा है, ''मध्य पूर्व में सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लिहाज़ा गठबंधन देशों को मज़बूत करने और अतिवादियों पर नकेल कसने पर ट्रंप का ज़ोर देना ही आगे का रास्ता हो सकता है.''

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सऊदी अरब में जो बाइडन की तुलना में डोनाल्ड ट्रंप को ज़्यादा समर्थन हासिल है.

2017 में जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने तो अपने पहले विदेश दौरे के लिए उन्होंने सऊदी अरब को चुना. कहा जाता है कि ये विचार दिग्गज मीडिया कारोबारी रूपट मर्डोक का था.

डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरड कुशनर के सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से अच्छे संबंध हैं. इस वजह से ट्रंप के भी क्राउन प्रिंस से अच्छे संबंध रहे हैं.

क्राउन प्रिंस की मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से नाराज़गी रही है, क्योंकि बाइडन ने मानवाधिकार के मुद्दे को लेकर सऊदी अरब के रवैये की आलोचना करते हुए उसके बहिष्कार की बात कही थी.

ट्रंप की मध्य-पूर्व नीति और ईरान

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जहां तक मध्य-पूर्व का सवाल है तो इस मामले में ट्रंप सरकार का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है.

उन्होंने यरूशलम को इसराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी. इससे इसराइल तो खुश हो गया लेकिन अरब देश नाराज़ हो गए. इसके साथ ही उन्होंने गोलान हाइट्स पर इसराइल के कब्ज़े को भी मान्यता दे दी. इससे भी अरब देश नाराज़ हैं.

लेकिन ट्रंप ने 2020 में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को का इसराइल से राजनयिक संबंध भी कायम करवाया. सूडान भी इसराइल से राजनयिक संबंध बनाने को राज़ी हुआ.

डोनाल्ड ट्रंप ईरान के सवाल पर आक्रामक रहे हैं.

2018 में उन्होंने ज्वाइंट कॉम्प्रिहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन कहे जाने वाले ईरान परमाणु समझौते से हाथ पीछे खींच लिए थे.

उन्होंने इसे 'दुनिया के इतिहास का सबसे ख़राब समझौता' कहा था. ट्रंप मध्य-पूर्व के कई देशों के इस नज़रिये से सहमत थे कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाने में ये समझौता नाकाम है.

इन देशों का ये भी मानना था कि इस समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को रोकने की क्षमता नहीं है. उल्टे इसने ईरान की रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को मालामाल कर दिया है. और इस पैसे का इस्तेमाल ईरान की ओर से लड़ रहे मिलीशिया की फंडिंग में हो रहा है.

साल 2020 में ट्रंप की इजाज़त मिलने के बाद रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के कुद्स फोर्स के सर्वोच्च कमांडर कासिम सुलेमानी को मार दिया गया.

ईरान इस पर आग बबूला था लेकिन कई अरब देशों ने इस पर संतोष जताया था.

अब काफ़ी बदल चुके हैं मध्य-पूर्व के हालात

ग़जा पट्टी में इसराइल की बमबारी

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इमेज कैप्शन, ग़जा पट्टी में इसराइल की बमबारी के बाद का एक दृश्य

लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद से अब तक मध्य-पूर्व के हालात काफ़ी बदल गए हैं.

इसराइल का हमास और हिज़्बुल्लाह से युद्ध चल रहा है. इसराइल का यमन के हूती विद्रोहियों और उसके समर्थक ईरान से भी टकराव हुआ है.

बाइडन प्रशासन में अमेरिका का इस क्षेत्र में असर कम हुआ है. अमेरिकी प्रशासन अपने नज़दीकी सहयोगी इसराइल पर ग़ज़ा और लेबनान में संयम रखने के लिए दबाव डालने में नाकाम रहा है.

समझा जाता है कि व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी से इसराइल को ईरान में तेल और परमाणु संयंत्रों पर हमले की खुली छूट मिल सकती है. जबकि बाइडन प्रशासन इस तरह के हमले की इजाज़त देने से इनकार करता रहा है.

इसराइली ख़ुफिया एजेंसी के एक पूर्व अधिकारी जोशुआ स्टिनरिच कहते हैं, ''ट्रंप इसराइल का खुलकर समर्थन करते रहे हैं और ईरान का ज़ोरदार विरोध. इससे वो इस क्षेत्र में इसराइल के मज़बूत सहयोगी बनकर उभरे हैं. ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि व्हाइट हाउस में उनकी वापसी ईरान पर लगाम लगाने की अमेरिकी प्रशासन की कोशिशों को और तेज़ करेगी.''

कुछ और भी बदला है

चीन और सऊदी अरब

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इमेज कैप्शन, चीन की मध्यस्थता के बाद ईरान और सऊदी अरब ने अपनी दुश्मनी भुलाने का फ़ैसला किया है. (फ़ाइल फ़ोटो)

लेकिन इस क्षेत्र में कुछ और भी बदल चुका है.

चीन की मध्यस्थता के बाद सऊदी अरब और ईरान अपने पुराने मतभेदों और सात साल पुरानी दुश्मनी भुलाने के लिए तैयार हो गए हैं.

उनका ये बदला हुआ रुख़ यमन के युद्ध में दिखा जहां सऊदी अरब की एयर फोर्स ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर बम बरसाए थे.

रविवार को सऊदी अरब के सेना प्रमुख तेहरान पहुंच कर अपने ईरानी समकक्ष से मिले. दोनों देश अब रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग मज़बूत करने की बात कर रहे हैं.

ईरान में 1979 में इस्लामी क्रांति हुई. उसी समय से सऊदी अरब और इसके सुन्नी पड़ोसी देश ईरान की सुरक्षा को एक बड़े ख़तरे के तौर पर देखते आए हैं.

2019 में सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर अचानक ड्रोन हमले हुए. इसके आरोप इराक़ में मौजूद ईरान समर्थित उग्रवादियों पर लगे.

इस हमले के बाद अरब देशों को लगा कि वो कभी भी ईरान के हमले की ज़द में आ सकते हैं.

बहरहाल, जब अरब और इस्लामी देश संयुक्त सम्मेलन कर ग़ज़ा और लेबनान में संघर्ष ख़त्म करने की मांग कर रहे हैं तो ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी से मध्य-पूर्व में अनिश्चितता और अस्थिरता दोनों तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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