मोदी के यूएस दौरे में मिल सकता है अमेरिकी MQ-9B ड्रोन, जानिए क्या है इसमें ख़ास

राघवेंद्र राव

बीबीसी संवाददाता

ड्रोन एमक्यू-9बी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान सभी नज़रें उस बड़े रक्षा सौदे पर रहेंगी, जिसके तहत भारत के अमेरिका से 31 हथियारबंद ड्रोन ख़रीदने की संभावना जताई जा रही है.

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में डिफेंस एक्विज़िशन कॉउंसिल (रक्षा अधिग्रहण परिषद) ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से सशस्त्र एमक्यू 9 बी ड्रोन की ख़रीद को मंज़ूरी दी.

हालाँकि इस प्रस्ताव को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी की हरी झंडी मिलना अभी बाक़ी है.

अनुमान लगाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के बीच बातचीत होने के बाद इस रक्षा सौदे पर आधिकारिक मुहर लग सकती है.

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ कुल 31 ड्रोन में से 15 भारतीय नौसेना के लिए और आठ-आठ ड्रोन सेना और वायु सेना को दिए जाएंगे. इस ख़रीद की अनुमानित लागत क़रीब तीन अरब डॉलर (क़रीब 25000 करोड़ रूपए) है.

इन ड्रोन को हासिल करने की भारत की योजना अपनी मानवरहित रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने की कोशिश का एक बड़ा हिस्सा है.

उम्मीद जताई जा रही है कि ये ड्रोन भारत को अपनी सीमाओं पर निगरानी क्षमता बढ़ाने और संभावित खतरों की अधिक प्रभावी निगरानी करने में सक्षम बनाएगा.

साथ ही हिन्द-महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे पर नज़र रखने के लिए भी इन ड्रोन का इस्तेमाल होना तय है.

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क्यों ख़ास है ये ड्रोन?

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ख़बरों के मुताबिक भारत एमक्यू 9 सिरीज़ में उपलब्ध दोनों तरह के ड्रोन एमक्यू 9 ए स्काई गार्डियन और एमक्यू 9 बी सी गार्डियन को ख़रीदने पर विचार कर रहा है.

जहाँ सी गार्डियन ड्रोन समुद्री निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे, वहीं स्काई गार्डियन ड्रोन की तैनाती ज़मीनी सीमाओं की रखवाली के लिए की जाएगी.

इस तरह के सशस्त्र ड्रोन फाइटर पायलटों द्वारा उड़ाए जाने वाले लड़ाकू विमानों की तरह दुश्मन के ठिकानों पर मिसाइलें और गोला-बारूद दागने की क्षमता रखते हैं.

ये ड्रोन निगरानी और टोह लेने में सक्षम हैं और उनका सशस्त्र संस्करण हेलफायर मिसाइलों से लैस है.

लंबी दूरी तक उड़ान भर खुफ़िया जानकारी जुटाने और निगरानी रखने के साथ-साथ इन विमानों का इस्तेमाल मानवीय सहायता, आपदा राहत, खोज और बचाव, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, एंटी-सरफेस वॉरफेयर और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में किया जा सकता है.

साथ ही इन ड्रोन को नशीले पदार्थों की तस्करी और समुद्री डकैती जैसी स्थितियों से निपटने के लिए भी तैनात किया जा सकता है.

ये ड्रोन हर तरह के मौसम में क़रीब तीस से चालीस घंटे तक की उड़ान एक बार में भर सकते हैं. ये ड्रोन 40000 फ़ीट तक की ऊंचाई तक उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं.

सी गार्डियन ड्रोन समुद्री निगरानी और डोमेन जागरूकता के लिए ज़िम्मेदार होंगे जबकि स्काई गार्डियन ड्रोन का उपयोग भूमि सीमाओं की रखवाली के लिए किया जाएगा.

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ठंडे बस्ते से बाहर आया प्रस्ताव

पिछले कुछ सालों में समय-समय पर इन ड्रोन की ख़रीद का ज़िक्र होता रहा है लेकिन काफ़ी समय से ये माना जा रहा था कि ये बात ठंडे बस्ते में डाल दी गई है.

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी कहते हैं, "मुझे लगता है कि भारत अमेरिका को इतनी बड़ी ख़रीद कर खुश करने की कोशिश कर रहा है क्योंकि अमेरिकियों ने इस बिक्री के लिए मंजूरी हासिल करने के लिए बहुत कुछ किया. बहुत वक़्त से बात सिर्फ जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन की ख़रीद के बारे में बात हो रही थी."

"अचानक से एक हफ़्ता पहले ड्रोन ख़रीदने की बात आ गई. और जो 30 ड्रोन के बजाय 18 ड्रोन की संख्या थी वो अब 31 हो गई. ये ड्रोन भारत को बेचकर अमेरिका भी ये दिखाना चाहेगा कि वो एक बड़ी रक्षा साझेदारी के बारे में ईमानदारी से काम कर रहा है."

राहुल बेदी कहते हैं कि इन ड्रोन को ख़रीदने की बात तब शुरू हुई जब साल 2016 में भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम (एमटीसीआर) का आधिकारिक सदस्य बन गया.

वे कहते हैं कि अगर भारत एमटीसीआर पर दस्तख़त नहीं करता तो ये ड्रोन उसे मिल नहीं सकते थे.

"एमटीसीआर पर दस्तख़त करने के कुछ ही वक़्त बाद भारत ने अमेरिका को इन हथियारबंद ड्रोन ख़रीदने के लिए लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट भेजा. अब तक अमेरिका इन ड्रोन को केवल नेटो सदस्य देशों को ही उपलब्ध करवाता था. तो अगर भारत को ये ड्रोन मिलते हैं तो ये पहली बार होगा कि किसी ग़ैर-नेटो देश को ये ड्रोन मिलेंगे."

राहुल बेदी के मुताबिक़ भारत ने जब इन ड्रोन को खरीदने की मंशा जताई तो अमेरिका ने काफ़ी कोशिशें करके इनकी बिक्री के लिए अनुमति हासिल की.

उनके मुताबिक, "उस समय 30 ड्रोन ख़रीदने की बात थी--थल सेना, वायु सेना और नौ सेना के लिए दस-दस ड्रोन लिए जाने थे. लेकिन इन ड्रोन की मंहगी क़ीमत के चलते भारत ने 30 के बजाय 18 ड्रोन ख़रीदने की बात की. अब अचानक से 31 ड्रोन ख़रीदने की बात आई है."

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'इन ड्रोन को ऑपरेट और मेन्टेन करना सस्ता नहीं'

एक बड़ा सवाल इन ड्रोन की क़ीमत और चलाने पर आने वाले खर्च के बारे में है क्यूंकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन ड्रोन को ख़रीदना और चलना दोनों ही मंहगे सौदे हैं.

राहुल बेदी का कहना है कि "जहां तक निगरानी की बात है तो ये दुनिया का सबसे बेहतरीन ड्रोन है" लेकिन साथ ही वो एक ज़रूरी सवाल भी उठाते हैं.

वे कहते हैं, "चार अरब डॉलर खर्च के ये ड्रोन लाये तो जायेंगे लेकिन इनका इस्तेमाल कहां होगा? इन ड्रोन को चलाना काफी महंगा पड़ता है. इनके हर मिशन की लागत बहुत ज़्यादा है. तो क्या इन ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ कर रहे आतंकवादियों पर किया जाएगा? कुछ मुठ्ठीभर आतंवादियो को मारने के लिए इतने मंहगे मिशन चलना संभव नहीं होगा. मैं नहीं जानता कि निगरानी के अलावा इन ड्रोन का इस्तेमाल कैसे हो पायेगा. हथियारबंद ड्रोन को आप कहाँ इस्तेमाल करेंगे? चीन के साथ सीमा पर करेंगे तो चीन भी जवाब देगा. अगर पाकिस्तान की सीमा पर इस्तेमाल करेंगे तो ये बहुत मंहगा पड़ेगा."

राहुल बेदी का ये भी कहना है कि अमेरिकी उपकरणों की सबसे बड़ी कमी ये है कि उन्हें ऑपरेट और मेन्टेन करना काफ़ी मंहगा है. वे कहते हैं, "अमेरिकी उपकरणों में जुगाड़ नहीं किया जा सकता जो एक बहुत बड़ी कमी है."

मोदी बाइडन

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दोनों देशों के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग

भारत ने हाल के वर्षों में अमेरिका से कई महत्वपूर्ण रक्षा क्षेत्र का साज़ो-सामान ख़रीदा है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में इज़ाफ़ा होता दिखा है.

पिछले कुछ सालों में भारत ने अमेरिका से 22 अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर, 15 चिनूक हैवी-लिफ्ट हेलिकॉप्टर, 10 सी-17 ग्लोबमास्टर 3 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, पी8आई मेरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट और एम 777 होविट्ज़र आर्टिलरी गन्स ख़रीदी हैं.

भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत्त एयर कमोडोर और रणनीतिक मामलों के समीक्षक प्रशांत दीक्षित कहते हैं कि एमक्यू 9 ड्रोन का अधिग्रहण एक सार्थक क़दम है.

वे कहते हैं, "क्या ये सौदा भारत के सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम में मदद करता है? उत्तर है, हाँ. हमारे पास पहले से ही भारतीय नौसेना के लिए ड्रोन हासिल करने का कुछ अनुभव है. तो इन ड्रोन की ख़रीद निश्चित तौर पर एक सार्थक क़दम है."

ग़ौरतलब है कि साल 2020 में भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र पर निगरानी बढ़ाने के लिए अमेरिका से दो एमक्यू 9 ड्रोन लीज़ पर लिए थे. इन ड्रोन को तमिलनाडु के रानीपेट जिले में अराक्कोनम के पास स्थित एक भारतीय नौसैनिक हवाई स्टेशन आईएनएस रजाली पर तैनात किया गया है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ इन ड्रोन की लीज 2024 में ख़त्म हो जाएगी.

एयर कमोडोर दीक्षित का मानना है कि इस सौदे को अंतिम रूप देने से पहले भारत सरकार को ठोक-बजा कर देखना चाहिए की ड्रोन की ख़रीद के बाद कोई दिक्कतें तो नहीं आएंगी?

वे कहते हैं, "अतीत में कई ऐसे मौक़े आए हैं जब अमेरिकी संसद ने अमेरिकी सरकार के कई रक्षा से जुड़े मामलों में दख़ल दिया. तो सोचने वाली बात ये है कि

जब हमें अमेरिकी ड्रोन मिलेंगे और जब हमें उनके पुर्जों की आवश्यकता होगी, तो क्या हम मुश्किलों में पड़ेंगे?"

भारत के रक्षा मंत्रालय ने इस सौदे को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है पर ख़बरों की मानें तो 31 ड्रोन की 3 बिलियन डॉलर की लागत में रखरखाव, ओवरहॉल और मरम्मत भी शामिल होंगे.

इस सौदे को लेकर इस तरह की ख़बरें आई हैं कि अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि इस सौदे को प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान निर्धारित कर लिया जाए.

एयर कमोडोर प्रशांत दीक्षित कहते हैं, "अमेरिका के साथ हमारे संबंध बढ़े हैं लेकिन हमने अभी तक अमेरिकियों के साथ रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. मुझे लगता है कि हमें सावधानी से चलना होगा. अमेरिका और अमेरिकी उद्योग हमेशा वाणिज्यिक कोण को पहले देखता है. पहले वे दरवाज़ा खोलने की कोशिश करते हैं. एक बार दरवाज़ा खुल जाए तो उसे चौड़ा करने की कोशिश करेंगे. जहाँ तक मेरी समझ है, अमेरिका भारतीय नौसेना को F-18 हॉर्नेट बेचने का इच्छुक है. इस दौरे के दौरान जो दूसरी बड़ी बात है वो कॉम्बैट एयरक्राफ्ट इंजन के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करना है."

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