बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा में बड़े उलटफेर के पीछे की रणनीति क्या है?- प्रेस रिव्यू

बीजेपी ने पिछले हफ़्ते शनिवार को लोकसभा चुनाव के लिए 195 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की थी.

इस लिस्ट में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और स्मृति इरानी सहित कई हाई प्रोफ़ाइल उम्मीदवारों के नाम का तो एलान किया ही गया है. लेकिन लिस्ट में कई नए नामों की चर्चा है, जिन्हें जाने-पहचाने चेहरों के टिकट काट कर मैदान में उतारा गया है.

ऐसा ही एक नाम है, बांसुरी स्वराज का जो बीजेपी की वरिष्ठ नेता और विदेश मंत्री रह चुकीं सुषमा स्वराज की बेटी हैं.

उन्हें मौजूदा सांसद और मोदी सरकार में विदेश मंत्री एस जयशंकर की जूनियर मंत्री मीनाक्षी लेखी की जगह उम्मीदवार बनाया गया है.

दिल्ली से जिन लोगों के टिकट कटे हैं, उनमें रमेश बिधूड़ी (दक्षिणी दिल्ली) हर्षवर्धन (चांदनी चौक), मीनाक्षी लेखी और परवेश वर्मा का नाम है.

बिधूड़ी हाल ही में चर्चा में आए थे जब उन्होंने बीएसपी सांसद दानिश अली के ख़िलाफ़ सदन के भीतर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था. वहीं परवेश वर्मा साल 2020 के दिल्ली दंगों में अपनी कथित हेट स्पीच को लेकर चर्चा में रहे थे.

अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ ने इसे लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि बीजेपी की लिस्ट में कई सरप्राइज़ फैक्टर हैं. इसमें पहला मौजूदा केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी का टिकट काटकर बंसुरी स्वराज को उतारना.

लिस्ट का दूसरा सरप्राइज़ करने वाला फ़ैक्टर रहा शिवराज सिंह चौहान की केंद्रीय राजनीति में एंट्री. मध्य प्रदेश के विदिशा से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को टिकट दिया गया है.

मध्य प्रदेश में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें पार्टी ने मुख्यमंत्री नहीं बनाकर मोहन यादव को सीएम बनाया था.

इसे लेकर चौहान गाहे-बगाहे अपनी निराशा सार्वजनिक करते रहे हैं.

बांसुरी स्वराज की एंट्री और दिल्ली में कटे कई सासंदों के टिकट

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी ने अपनी पहली लिस्ट में हिंदी पट्टी के दो मुख्य राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में ज़्यादातर उन्हीं उम्मीदवारो को टिकट दिया है, जिन्हें 2019 चुनाव में मैदान में उतारा था. लेकिन इस बार पार्टी ने दिल्ली और छ्त्तीसगढ़ की सीटों पर अहम उलटफेर किया है.

ऐसा तब किया है, जब दोनों ही राज्यों में बीजेपी ने बीते दो लोकसभा चुनावों में काफ़ी बेहतरीन प्रदर्शन किया था.

दिल्ली में बीजेपी ने सातों सीटों बीते दो चुनावों में जीती हैं और छ्त्तीसगढ़ में 2014 में कुल 11 सीटों में 10 सीटें बीजेपी ने जीती थी और साल 2019 में नौ सीटें जीती थी.

अख़बार कहता है कि इस बार बीजेपी ने लिस्ट बनाते समय जीतने की क्षमता के साथ-साथ मतदाताओं के बीच उम्मीदवारों की छवि और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ संबंध जैसे फैक्टर पर ज्यादा फ़ोकस किया है.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज को नई दिल्ली सीट से मैदान में उतारने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें काफ़ी समर्थन मिलता है. हाल के दिनों में वो कार्यकर्ताओं से जुड़ने को लेकर काफ़ी सक्रिय रही हैं.

इंडियन एक्सप्रेस से दिल्ली बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ''वह बहुत मिलनसार हैं और पार्टी कार्यकर्ता उनमें उनकी दिवंगत माँ सुषमा स्वराज की छवि देखते हैं.''

दिल्ली में कुल पाँच सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित हुए हैं और उनमें केवल मनोज तिवारी अकेला ऐसा नाम हैं जो अपनी उम्मीदवारी बचा पाए हैं.

यहां तक की मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे हर्षवर्धन सिंह को भी दरकिनार कर दिया गया है. रविवार को हर्षवर्धन ने कहा था कि वह सक्रिय राजनीति छोड़ना चाहते हैं.

छत्तसीगढ़ में रमन सिंह के बेटे को टिकट नहीं

अब बात करते हैं छ्त्तीसगढ़ की. यहाँ कई संसद के चेहरों को राज्य के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बना दिया गया.

विष्णुदेव साय राज्य के मुख्यमंत्री बन गए हैं, अरुण साव और रेणुका सिंह अब विधायक हैं. ऐसे में बीजेपी की तीन सीटें ख़ाली हो गई थीं.

अब बीजेपी ने कांग्रेस नेता और राज्य के पूर्व सीएम भूपेश बघेल के भतीजे विजय बघेल को चाचा को विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर देने का इनाम दिया है, उन्हें बीजेपी ने पटान से टिकट दिया है.

बीजेपी ने पूर्व सीएम रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह की जगह मौजूदा सांसद संतोष पांडे को ही फिर टिकट दिया है. पांडे संगठन के व्यक्ति हैं. वहीं अभिषेक सिंह को लेकर कहा जाता है कि वह बहुत सक्रिय नहीं हैं.

छ्त्तीसगढ़ में सभी उम्मीदवारों को सत्ता विरोधी लहर, निष्क्रियता, वोटर्स और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ संबंध की कमी के आधार पर बदला गया है.

हालांकि, आठ बार के विधायक और मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल को इस बार लोकसभा का टिकट मिला है. इसकी बड़ी वजह है राज्य की राजनीति में उनका कद.

वहीं राज्यसभा सांसद सरोज पांडे, जो दुर्ग से पहले सासंद रह चुकी हैं, उन्हें इस बार कोरबा से टिकट दिया गया है.

कोरबा में बड़ी संख्या में प्रवासी आबादी रहती है. कोरबा एक इंडस्ट्रियल बेल्ट है, इसलिए आदिवासी आबादी के साथ-साथ वहां बड़ी संख्या में यूपी बिहार से प्रवासी मज़दूर रहते हैं. सरोज पांडे के इस इलाक़े से पारिवारिक संबंध भी हैं.

राजस्थान के समीकरण

राजस्थान में घोषित 15 उम्मीदवारों में से सात नए चेहरे हैं. चूरू, जालौर, अलवर, भरतपुर, नागौर, उदयपुर और बांसवाड़ा-डूंगरपुर ऐसी सीटें हैं, जहाँ नए उम्मीदवार हैं.

इन सीटों से बीते चुनाव में जीत कर संसद पहुंचे सासंदों के विधानसभा में चले जाने के बाद ये निर्वाचन क्षेत्र ख़ाली हो गए हैं.

जयपुर (ग्रामीण) से राज्यवर्धन सिंह राठौड़ सांसद थे, अलवर से पहले बालक नाथ सासंद थे और राजसमंद से वर्तमान डिप्टी सीएम दीया कुमारी लोकसभा सांसद थीं.

चूरू से पैरा एथलीट देवेन्द्र झाझरिया को मैदान में उतारा गया है. झाझरिया जाट समुदाय से हैं, इस क्षेत्र में ये समुदाय एक बड़ा वोट बैंक है. झाझरिया को मौजूदा सांसद राहुल कासवान की जगह टिकट दिया गया है. अलवर से केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद भूपेन्द्र यादव को मैदान में उतारा गया है.

तेजस्वी यादव ने अपनी पार्टी को बताया ‘ए टू जेड’ जाति की पार्टी

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, आरजेडी नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपनी पार्टी की छवि को मुस्लिम और यादवों की पार्टी तक ही सीमित नहीं रखना चाहते और इसलिए उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी ए टू जेड जाति की पार्टी है.

पटना के गांधी मैदान में अपने 17 महीने के शासन का हिसाब देते हुए उन्होंने कहा, “कुछ लोग कहते हैं कि हम सिर्फ़ एमवाई पार्टी हैं यानी मुसलमानों और यादवों की पार्टी हैं. लेकिन हम भी बाप (बीएएपी) हैं - जहां बी का मतलब है, बहुजन, ए का मतलब है 'अगड़ा', ए का मतलब है, आधी आबादी' (महिलाएं,), और पी का मतलब है ग़रीब.”

उन्होंने भाषण देते हुए कहा, “इसी गांधी मैदान में हमने रोज़गार पत्र बाँटे. जब मैंने पहली बार 10 लाख नौकरियों का प्रस्ताव दिया तो नीतीश कुमार ने पूछा, पैसा कहां से आएगा? 17 महीनों में मैंने उन्हें ग़लत साबित कर दिया.”

साल 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी पार्टी सबसे बड़ा दल बन कर तो उभरी लेकिन बहुमत से काफ़ी दूरी पर रही. इसकी एक वजह रही कि ग़ैर यादव जातियां आरजेडी के खिलाफ़ रहीं, राजद के वरिष्ठ नेता ने अख़बार को बताया कि "ए टू जेड" पिच आरजेडी का मतदाताओं से वादा है कि किसी को भी अनदेखा या बाहर नहीं किया जाएगा.

राजनीतिक विज्ञानी और दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के फेलो राहुल वर्मा ने कहा कि राजद जिस एमवाई-ओनली टैग से बचने की पूरी कोशिश कर रहा है, वह इतनी आसानी से नहीं मिटेगा.

राहुल वर्मा ने द हिंदू अख़बार से कहा कि आरजेडी जिस एमवाई-ओनली टैग से बचने की पूरी कोशिश कर रहा है, वह इतनी आसानी से उनका पीछा नहीं छोड़ेगा.

वर्मा ने कहा, “आरजेडी की शुरुआत एम-वाई पार्टी के रूप में नहीं हुई थी. यह बड़े पैमाने पर बहुजन मतदाताओं की पार्टी हुआ करती थी, न केवल यादवों, बल्कि दलितों के एक वर्ग, पिछड़े वर्गों के वोट भी जीतती थी. लेकिन समय के साथ, यह कम हो गया है क्योंकि पिछड़े वर्गों के वोट और अधिक बँटते चले गए हैं.''

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