ये दुर्भाग्य है कि राजनीति का आधार मज़हब है- उस्ताद अमजद अली ख़ान

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"दुनिया से हमारा रिश्ता सिर्फ़ स्वर के ज़रिए हुआ है. हमने शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया. संगीत ऊपर वाले का दिया हुआ एक क़ीमती तोहफा है जिसने दुनिया को आपस में जोड़ा हुआ है."
ये शब्द हैं मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान के. उस्ताद अमजद अली ख़ान का जन्म ग्वालियर में हुआ था.
वह एक संगीतकार परिवार से आते हैं, जिस वजह से बचपन से ही उनका संगीत का सफ़र शुरू हो गया था.
उनके परिवार का संगीत से 18वीं सदी से नाता है. वह अपने परिवार की छठी पीढ़ी हैं जो सरोद की विरासत को संभाल रहे हैं.
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महज़ 12 साल की उम्र में उन्होंने एकल सरोद-वादन की पहली पब्लिक परफॉर्मेंस दी थी.
उन्हें साल 1975 में पद्मश्री, 1991 में पद्म भूषण और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
बीबीसी हिंदी की ख़ास पेशकश 'कहानी ज़िंदगी की' में उस्ताद अमजद अली ख़ान ने अपनी ज़िंदगी के कई अहम पलों को इरफ़ान के साथ साझा किया.
पिता से सीखी सरोद की बारीकियां

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उस्ताद अमजद अली ख़ान ने अपने पिता उस्ताद हाफिज़ अली ख़ान से ही सरोद वादन में परंपरागत तरीके से तकनीकी दक्षता हासिल की.
वह पांच भाई-बहन थे. वह बताते हैं कि उनका परिवार सिंधिया परिवार में संगीतकार रहा था और उनके परिवार के सारे आदमी सरोद ही बजाते थे.
वह कहते हैं, "हमारे वालिद साहब बहुत बड़े गायक थे. पंडित भीम सिंह जी ने उनसे गाना सीखा. उनसे मिलने के लिए बड़े-बड़े संगीतकार आते थे. बचपन से हम वालिद साहब से कहते थे कि मैं सरोद के ज़रिए गाना चाहता था."
"वालिद साहब का ख़्याल था कि मौसिकी को समझो और किताब से दूर रहो. लेकिन जब वालिद साहब पर दबाव पड़ा तो उसके बाद मेरा स्कूल में दाखिला करवाया गया."
साल 1963 में उन्होंने पहली बार विदेश यात्रा की और वह अमेरिका की थी.
उन्होंने बताया, "एक डेलिगेशन था जिसमें डांसर और संगीतकार थे. उस डेलिगेशन में बिरजू महाराज भी थे. हमारा यह तय हुआ कि बिरजू महाराज मेरे साथ तबला बजाएंगे और मैं उनके डांस के साथ तबला बजाऊंगा."
उनकी इस विदेश यात्रा के बाद उनका स्कूल पूरी तरह से छूट गया. उन्होंने बताया कि वह अपनी हर परफॉर्मेंस से कमाया गया पैसा अपनी मां को ही देते थे.
उस्ताद अमजद अली ख़ान का मानना है कि लोगों का प्यार ही उनकी पूंजी है.
कैसे हुई शादी

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उस्ताद अमजद अली ख़ान ने अंतरधार्मिक विवाह किया. उनकी पत्नी मशहूर भरतनट्यम डांसर शुभलक्ष्मी बरुआ ख़ान हैं.
वह बताते हैं, "कोलकत्ता में उनके भारतनट्यम की परफॉर्मेंस देखते हुए मुझे लगा कि उन्हें खुदा ने मेरे लिए भेजा है. उनकी परफॉर्मेंस के बाद मैं उनसे मिला. मालिक का करम था कि हमारी शादी हो गई और परिवार से आशीर्वाद मिला."
उनके दो बेटे अमान अली बंगश और अयान अली बंगश हैं.
वह आगे कहते हैं, "हर मां-बाप अपने बच्चों की कुंडली बनवाता है और शादी से पहले कुंडली देखी जाती है और साल-भर में कुंडली वाली शादी टूट जाती है. हमारी बगैर कुंडली वाली शादी हुई है."
उस्ताद अमजद अली ख़ान ने समाज के ध्रुवीकरण के बारे में भी बात की और वह मानते हैं कि संगीत का कोई धर्म नहीं होता है.
उन्होंने कहा, "संगीतकार होने के नाते मुझे दुनिया का हर मज़हब सुनना आता है. हर मज़हब ने मुझे सहयोग और आशीर्वाद दिया है और मुझे लगता है कि मैं दुनिया और भारत के हर मज़हब से जुड़ा हुआ हूं. मैं सिर्फ़ सेवा कर रहा हूं. प्यार से लोग मुझे चिट्ठी में पंडित अमजद अली ख़ान भी लिखते हैं."
"कोई भी समय स्थायी नहीं होता. यह दुर्भाग्य की बात है कि राजनीति का जो आधार है वह मज़हब है. ये भी एक दौर है जो निकल जाएगा. लेकिन खुदा का शुक्र है कि हमारे देश में कुछ लोग शांति और प्यार के लिए काम करते हैं और इसी को हिंदुस्तान कहते हैं."
बेगम अख़्तर, ज़ाकिर हुसैन और बिस्मिल्लाह ख़ान पर क्या बोले उस्ताद

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उस्ताद अमजद अली ख़ान ने अपने जीवन में अनेक दिग्गज कलाकारों के साथ समय बिताया है. इतना ही नहीं, उन्होंने 12 संगीतकारों पर एक किताब लिखी है जिसका नाम 'मास्टर ऑन मास्टर्स' है.
बेगम अख़्तर को याद करते हुए ख़ान साहब कहते हैं, "उस समय में बेगम अख़्तर के साथ सारा जमाना चलता था. एक दफ़ा उनका और मेरा कार्यक्रम श्रीनगर में हुआ. उस कार्यक्रम को रेडियो आयोजित कर रहा था. उन्होंने चार खूबसूरत गजलें गाईं और खूबसूरत माहौल बन गया."
वह आगे बताते हैं, "उनके बाद जब मैं स्टेज पर गया और पर्दा खुला तो बेगम अख़्तर सामने बैठी थीं. ये उनकी महानता थी. जब मैंने उनको बैठे हुए देखा तो वह इतनी इज्जत दे चुकी थीं कि मैंने अपना सरोद रख दिया. मैंने कहा कि बेगम साहब, आपने ऐसा गाया कि मैं सब राग-रागिनी भूल गया हूं."

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तबला वादन के उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के बारे में अमजद अली ख़ान कहते हैं, "ज़ाकिर हुसैन को खु़दा ने अपने हाथों से बनाया था. वह एक गिफ्टेड संगीतकार और कलाकार हैं. उन्होंने तबले को एक अलग शिखर तक पहुंचाया."
"लोग घरानों की बात करते थे, वह ख़ुद ही घराना बन गए थे. हिंदुस्तान के लोग हम दोनों को एक साथ देखना चाहते थे. लेकिन जब भी हम लोग बैठते थे तो संगीत का एक अलग ही माहौल बनता था."
शहनाई के जादूगर बिस्मिल्लाह ख़ान साहब को याद करते हुए वह कहते हैं, "एक ज़माना था जब शहनाई वाले को तीसरी मंजिल पर बैठाते थे. लेकिन बिस्मिल्लाह ख़ान साहब शहनाई को स्टेज पर लाए. उन्होंने माइक्रोफ़ोन के सामने शहनाई बजाई. आज भी कहना मुश्किल है कि बिस्मिल्लाह ख़ान के बाद कौन या जाकिर हुसैन के बाद कौन?"
वह आगे कहते हैं, "कुछ बंदे खु़दा ने अपने हाथ से बनाए और दुनिया को उनको देखना नसीब हुआ, सुनना नसीब हुआ. तो ये सिलसिला हमेशा चलता रहेगा. चिराग से चिराग रोशन होता है."
मुंबई की फ़िल्मी दुनिया से दूरी

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हिंदी फ़िल्मों में काम न करने पर बात करते हुए वह बताते हैं कि उन्हें मुंबई की फ़िल्मी दुनिया की जरूरत नहीं पड़ी.
उन्होंने कहा, "मैं बॉम्बे क्लासिकल म्यूजिक के लिए जाता था. लोग मुझे बुलाते थे. मैं प्रोग्राम करके वापस आ जाता था. मैंने वहां कभी कोई काम नहीं मांगा और न ही मेरी ख़्वाहिश थी. मुझे सुनने फ़िल्मी लोग आते थे जैसे संगीत निर्देशक नौशाद साहब, मदन मोहन जी, ओपी नैयर. ख़ुदा का शुक्र है कि मुझे काम मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी."
उनके मुताबिक सरोद एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसके लिए मुंबई का मौसम सही नहीं है.
वह कहते हैं, "बॉम्बे का जो मौसम है वह मेरे वाद्य यंत्र के लिए अनुकूल नहीं था. समुद्री हवा मेरे वाद्य यंत्र के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है. वालिद साहब बुजुर्ग थे, उनकी खिदमत में रहना मुझे ज़्यादा जरूरी लगा."
वह बताते हैं कि गुलज़ार ने उन पर एक घंटे की डॉक्यूमेंट्री बनाई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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