पंडित हरि प्रसाद चौरसिया: पहलवान का बेटा कैसे बना बांसुरी का जादूगर

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पंडित हरि प्रसाद चौरसिया: पहलवान का बेटा कैसे बना बांसुरी का जादूगर
    • Author, इरफ़ान

मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया को फ़िल्म संगीत प्रेमी भले ही तब जान पाए हों, जब उन्होंने सिलसिला और चांदनी जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया और उनके कम्पोज़ किए हुए गाने चार्टबस्टर बने, लेकिन तब तक हरि प्रसाद चौरसिया हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बांसुरी के एक सम्मानित वादक बन चुके थे.

मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको कभी कहीं से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव नहीं आया? क्योंकि जब कोई व्यक्ति बहुत प्रसिद्ध हो जाता है तो राजनीतिक पार्टियां उसकी लोकप्रियता के ज़रिए चुनाव में जनाधार बढ़ाना चाहती हैं.

इस पर वे तपाक से बोले, "वो लोग कुछ बजा या गा नहीं सकते, वहां बस लंबी लंबी होती बातें हैं."

पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के जीवंत प्रतीक हैं. वे आज 87 साल की उम्र में भी अपने बांसुरी वादन से लाखों दिलों को मोह लेते हैं. उनकी जीवन यात्रा संगीत और समर्पण की अनूठी मिसाल है, जो इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) की गलियों से शुरू होकर वैश्विक मंचों तक पहुंची.

कैसा बीता बचपन?

हरि प्रसाद का जन्म इलाहाबाद में हुआ. उनके पिता एक पहलवान थे और उनकी इच्छा थी कि बेटा भी अखाड़े में कुश्ती के दांव आज़माए. लेकिन हरि प्रसाद का मन तो बचपन से ही संगीत की स्वरलहरियों में रमता था.

वे बताते हैं, "अखाड़े में तो कोई इसको गिरा रहा है, कोई उसको पटक रहा है. यह मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं अखाड़े में जाता, पर मेरा ध्यान राग-रंगों पर रहता."

संगीत के प्रति यह दीवानगी उन्हें घर से बाहर ले गई. उन्होंने टाइपिस्ट की नौकरी की लेकिन बांसुरी की पुकार ने उन्हें कटक (ओडिशा) आकाशवाणी के संगीत विभाग तक पहुंचाया, जहां वे बांसुरी वादक के रूप में नियुक्त हुए. यह वह दौर था जब बांसुरी को शास्त्रीय संगीत में गंभीरता से लेना अभी बाक़ी था.

इसके बाद भुवनेश्वर से मुंबई की यात्रा ने उनके जीवन को नया मोड़ दिया. मुंबई में उन्होंने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई. संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ बनाई गई उनकी जोड़ी 'शिव-हरि' ने हिंदी सिनेमा को सिलसिला, चांदनी और लम्हे जैसी फ़िल्मों में मधुर और कालजयी संगीत दिया लेकिन स्वतंत्र रूप से वे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित फ़िल्म 27, डाउन में संगीत दे चुके थे.

पंडित हरि प्रसाद चौरसिया
इमेज कैप्शन, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया को भारत के सर्वोच्च सम्मानों जैसे संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से नवाज़ा जा चुका है

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी बांसुरी से जीता दिल

पंडित हरि प्रसाद चौरसिया की बांसुरी ने ना सिर्फ़ भारतीय श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्हें ख्याति दिलाई. पश्चिमी संगीतकारों जैसे जॉन मैक्लूहिन और यान गार्बरेक के साथ उनके कोलैबोरेशन ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय और जैज़ संगीत का अनोखा संगम पेश किया. उनके रिकॉर्ड्स आज भी विश्व संगीत के अनुपम ख़ज़ाने हैं.

पंडित चौरसिया को भारत के सर्वोच्च सम्मानों जैसे संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से नवाज़ा जा चुका है.

विदेशों में भी उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं. लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है बांसुरी को वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र और सशक्त वाद्य के रूप में स्थापित करना. एक साधारण सी बांस की नली को उन्होंने अपनी साधना से ऐसा मुक़ाम दिला दिया कि उससे निकलने वाले स्वरों को करोड़ों दिलों में उतरते देखा जा सकता है.

कई पीढ़ियों से पान बेच रहा परिवार

हरि प्रसाद का परिवार कई पीढ़ियों से पान बेचने का काम करता रहा है. इलाहाबाद की सड़कों और चौराहों पर पान की दुकानों की संस्कृति को उनके परिवार ने नया आयाम दिया.

पान, जो पहले घरों और महफिलों तक सीमित था, उनके बुज़ुर्गों की बदौलत नुक्कड़ों की शान बन गया. इस सांस्कृतिक योगदान के साथ-साथ हरि प्रसाद ने संगीत को अपनी कर्मभूमि बनाया और उसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई.

आज हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बुज़ुर्ग पीढ़ी में पंडित चौरसिया लगभग आख़िरी बचे दिग्गजों में से हैं. उनकी बांसुरी अब भी युवा संगीतकारों को प्रेरित करती है. "संगीत साधना है, यह दिल से दिल तक जाता है." उनकी यह बात उनकी जीवन यात्रा को सही मायने में दर्शाती है.

एक साधारण परिवार से निकलकर, कुश्ती के अखाड़े से संगीत के मंच तक, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया ने साबित किया कि सच्ची लगन और प्रतिभा किसी भी साधारण वस्तु को असाधारण बना सकती है. उनकी बांसुरी आज भी विश्व भर में भारतीय संगीत की आत्मा में गूंजती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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