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मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में कहाँ हैं क्षेत्रीय दल?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
मध्य प्रदेश में आने वाले विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी की ‘एंट्री’ से एक बार फिर क्षेत्रीय दलों और उनके प्रभाव पर बहस छिड़ गई है.
मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की राजनीति में छोटे या क्षेत्रीय दलों का उतना प्रभाव बाक़ी नहीं बचा है जितना किसी समय हुआ करता था.
ऐसे में आम आदमी पार्टी के चुनावी समर में कूदने से क्षेत्रीय दलों के प्रभाव और उनकी प्रासंगिकता को लेकर चर्चा हो रही है.
अब तक जितने क्षेत्रीय दल मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे, उनका प्रभाव अलग-अलग इलाक़ों में सीमित रहा.
जैसे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे इलाक़ों में रहा, जबकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी मूल रूप से आदिवासी बहुल इलाक़ों में सक्रिय रही.
आम आदमी पार्टी ने पूरी की पूरी 230 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को खड़ा करने की घोषणा की है, जबकि उसने 10 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट भी जारी कर दी है.
ये पहला मौक़ा है, जब कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी के अलावा किसी तीसरे राजनीतिक दल ने प्रदेश की सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का ऐलान किया हो.
वर्ष 2018 के चुनावों में ही आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली थी.
लेकिन उसे कोई ख़ास सफलता नहीं मिल पाई थी.
आम आदमी पार्टी का कितना दख़ल?
आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे पंकज सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पिछले विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी का संगठन उतना मज़बूत नहीं था और वो मध्य भारत की राजनीति में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे.
पंकज सिंह फ़िलहाल आम आदमी पार्टी की केंद्रीय कमेटी में संयुक्त सचिव हैं.
वो कहते हैं, “हमने पिछले पाँच सालों में संगठन को मज़बूत करने पर ही फ़ोकस रखा था. इसका हमें फ़ायदा भी हुआ. नगर निकाय चुनाव में हमारे 52 कार्यकर्ता जीतकर आए जबकि 278 सीटों पर आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों ने दूसरा स्थान हासिल किया. ज़िला पंचायत के चुनावों में भी हमारा मत प्रतिशत 6.8 था.”
1990 के दशक से ही मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच मुक़ाबला रहा है. चाहे वो लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभा के.
क्षेत्रीय दलों की झोली में पाँच या छह सीटें ही आती रहीं हैं जबकि निर्दलीय उम्मेदवार भी कुछ एक सीटों पर प्रभावशाली रहे हैं.
हालाँकि इन क्षेत्रीय दलों ने बड़ी पार्टियों के साथ चुनाव से पहले या फिर बाद में तालमेल बैठाए रखा.
आम आदमी पार्टी ने अपना चुनावी प्रचार मार्च महीने से ही शुरू कर दिया था, जब पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी एक सभा में घोषणा की कि अगर मध्य प्रदेश में उनकी पार्टी सत्ता में आई, तो वो मुफ़्त बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य का दिल्ली का मॉडल प्रदेश में भी लागू करेंगे.
पिछले दो महीनों में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के क्षुब्ध नेताओं को अपनी सदस्यता दी है.
इनमे कई ऐसे हैं, जो टिकट के दावेदार हैं. ये तो चुनावी नतीजे ही बताएँगे कि आम आदमी पार्टी इस बार कितना प्रभाव बनाने में कामयाब होगी, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बार आम आदमी पार्टी की मौजूदगी ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की परेशानियाँ बढ़ा दी है.
बसपा और सपा का घटता प्रभाव
भोपाल के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी कहते हैं कि ये बात सही है कि आम आदमी पार्टी चुनावी समर में कूदी ज़रूर है, लेकिन किसी बड़े मुद्दे को लेकर उसने सडकों पर कोई आंदोलन नहीं किया है. इसलिए लोगों के बीच अभी उतनी पैठ उसकी नहीं बन पाई है.
बुंदेलखंड, बघेलखंड और ग्वालियर-चंबल संभाग की कुछ एक सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का असर रहा है.
लेकिन उत्तर प्रदेश में दोनों दलों पर हुए राजनीतिक असर का प्रभाव मध्य प्रदेश में भी देखने को मिला है. जहाँ पिछले चुनावों में बिजावर सीट से जीतने वाले समाजवादी पार्टी के विधायक राजेश शुक्ला ने पिछले ही भाजपा का दमन थाम लिया था.
बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक संजीव कुशवाहा भी भारतीय जानत पार्टी में शामिल हो गए हैं.
वर्ष 2018 के विधानसभा के चुनावों में बसपा को 5.11 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि समाजवादी पार्टी को 6.26 प्रतिशत. वहीं आम आदमी पार्टी को 0.78 प्रतिशत वोट ही मिल पाए थे.
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का खिसकता आधार
क्षेत्रीय दलों की अगर बात होती है, तो बसपा और सपा का राजनीतिक आधार उत्तर प्रदेश ही रहा है, जिस तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रभाव का क्षेत्र है महाराष्ट्र.
लेकिन जिस क्षेत्रीय दल का उदय विशुद्ध रूप से मध्य प्रदेश की राजनीति में हुआ, उसका नाम है गोंडवाना गणतंत्र पार्टी.
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी मध्य प्रदेश के राजनीतिक उतार चढ़ाव में कई बार टूटी और उसके अलग-अलग धड़े बन गए.
आदिवासियों के मुद्दों को लेकर राजनीति करने वाले इस संगठन के नेताओं का आरोप है कि दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने उनके बीच में फूट डालने का काम किया है.
इस पार्टी का गठन अविभाजित मध्य प्रदेश में हुआ था. संगठन ने बस्तर और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय के लोगों के अधिकार के लिए संघर्ष करना शुरू किया और धीरे धीरे उसकी पैठ इन इलाक़ों में बढ़ने लगी.
देखते ही देखते पार्टी के अध्यक्ष हीरासिंह मरकाम मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा नाम बन कर उभरे.
न सिर्फ़ मध्य प्रदेश, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने उत्तर प्रदेश में भी चुनाव लड़ा और वर्ष 2002 के चुनावों में उसने अपने आठ उम्मीदवार खड़े किया.
वर्ष 2003 में मध्य प्रदेश में हुए विधासभा के चुनावों में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के 61 उम्मेदवार चुनावी मैदान में थे. इनमे से तीन चुनकर भी आए.
फिर वर्ष 2004 में हुए लोक सभा के चुनावों में उसने मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र उम्मेदवार उतारे. लेकिन इस पार्टी के कई टुकड़े हो गए. गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से हाल तक जुड़े रहे गुलज़ार सिंह मरकाम ने भी अब क्रांति जनशक्ति पार्टी बना ली है.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि सबसे पहली टूट के बाद राष्ट्रीय गोंडवाना पार्टी का गठन हुआ.
फिर अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी बनी और फिर गोंडवाना मुक्ति सेना का गठन हुआ.
उन्होंने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया कि इन दोनों बड़े दलों ने ‘हर दाँव’ अपनाया ताकि भारत में सबसे ज़्यादा आदिवासियों की जनसंख्या वाले मध्य प्रदेश में आदिवासियों की अपनी कोई पार्टी ना बन सके.
उनका कहना था, “प्रलोभन देकर या मुक़दमे लादकर आदिवासी नेताओं को कमज़ोर किया गया. आदिवासियों की अपनी आवाज़ हमेशा कुचली जाती रही. न कांग्रेस ने आदिवासी नेतृत्व को पनपने दिया और न ही भारतीय जनता पार्टी ने. यही वजह है कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी कई बार टूटी. इस बार हमने भी नई पार्टी बनाई है.”
जय आदिवासी युवा शक्ति
जय आदिवासी युवा शक्ति राजनीतिक दल नहीं है लेकिन आदिवासी इलाक़ों में इसका ख़ासा प्रभाव है.
वर्ष 2013 में गठन के बाद से ही इस संगठन ने सामाजिक स्तर पर आदिवासियों के बीच काम करना शुरू किया और वर्ष 2018 में पहली बार इसने धार ज़िले के मनावर से कांग्रेस के आदिवासीनेता हीरालाल अलावा को समर्थन देने की घोषणा की.
अलावा की जीत हुई. इस बार संगठन ने कुछ सीटों पर आदिवासी उम्मीदवारों को समर्थन देने का संकेत 24 सितंबर को सागर ज़िले में हुई अपनी महापंचायत में दिया.
संगठन के प्रमुख कर्ताधर्ता में से एक नितेश अलावा कहते हैं कि पिछले विधानसभा के चुनावों में उनके संगठन के समर्थन की वजह से कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 30 पर जीत दर्ज की थी.
2013 के विधानसभा के चुनावों में इन सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को भारी सफलता मिली थी.
वो कहते हैं, “47 सीटें आरक्षित हैं लेकिन आदिवासियों का वोट 80 सीटों पर उम्मीदवारों की हार जीत तय करता है. कई ऐसी अनारक्षित सीटें हैं, जहाँ आदिवासियों की बड़ी तादात है, लेकिन दोनों ही राष्ट्रीय दल आदिवासियों को टिकट देने से कतराते हैं. इसका कारण है मज़बूत आदिवासी नेतृत्व का ना होना. लेकिन इस बार हमारे संगठन ने आदिवासियों के बीच जाकर उन्हें गोलबंद करने का काम किया है. अब हम राजनीतिक दलों से मांग कर रहे हैं कि वो आदिवासियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे.”
कभी मज़बूत थे क्षेत्रीय दल
मध्य प्रदेश में सबसे पहली विधानसभा में 337 विधायक थे. ये अंतरिम विधानसभा थी, जिसका गठन 1956 में चार राज्यों को मिलाकर किया गया था.
इसमें पुराने मध्य प्रदेश की 148 विधानसभा की सीटें, मध्य भारत राज्य की 99, भोपाल स्टेट की 30 और विंध्य प्रदेश के 60 सीटों का विलय हो गया था.
हालाँकि इस अंतरिम विधानसभा में कांग्रेस की 258 सीटें थीं, लेकिन सोशलिस्ट पार्टी के 16 विधायक थे.
निर्दलीय विधायकों की संख्या भी 28 थी जबकि हिंदू महासभा के 12, राम राज्य परिषद् के 7 और जनसंघ के 6 विधायक थे.
इस विधानसभा में किसान मज़दूर प्रजा पार्टी के 10 विधायक भी थे. यानी 63 विधायक या तो क्षेत्रीय दलों से थे या फिर निर्दलीय.
भोपाल में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी कहते हैं कि एक दौर था, जब सोशलिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का मध्य प्रदेश के कई इलाक़ों में ख़ासा प्रभाव हुआ करता था.
इसके अलावा पहले हिंदू महासभा और बाद में जनसंघ ने भी राजनीतिक रूप से अपनी पैठ बनाए रखी थी. लेकिन फिर इनका आधार सिमटता चला गया.
उनका कहना था, “लोहियावादियों और समाजवादियों का अच्छा प्रभाव हुआ करता था. लेकिन बाद में नब्बे के दशक या फिर अस्सी के दशक से इनका प्रभाव कम होता चला गया. एक समय आया कि क्षेत्रीय दलों का आधार एक या दो सीटों पर ही रह गया. अब किसी तीसरे राजनीतिक मोर्चे के लिए मध्य प्रदेश में तो कोई गुंज़ाइश नहीं दिखती है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने कुछ इस तरह राजनीति की है कि क्षेत्रीय दल बहुत लंबी पारी नहीं खेल पाते हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि मध्य प्रदेश की सीमा 6 राज्यों से लगी हुई है इसलिए उन राज्यों की राजनीति का कुछ असर सीमा से लगे इलाक़ों में होता है.
लेकिन उनका कहना है कि मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कमोबेश यही स्थिति है, जहाँ दो दलों के बीच ही लड़ाई रही है.
इन दोनों दलों के अलावा किसी तीसरे दल को पाँव जमाने का मौक़ा नहीं मिल पाया.
किदवई कहते हैं, “उत्तर प्रदेश के क्षत्रिय दल जैसे बसपा या सपा के अलावा महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ने वाले अमूमन वो लोग होते हैं, जिन्हें कांग्रेस या भाजपा से टिकट नहीं मिला. यानी जो असंतुष्ट हैं. इसके अलावा इन क्षेत्रीय दलों का कोई दूसरा असर नहीं देखने को मिलता. जब कांशीराम बसपा बना रहे थे तो वो मध्य प्रदेश में चुनाव हार गए थे. उसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीति का आधार बनाया था.”
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