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ट्रंप के परमाणु पनडुब्बी भेजने के फ़ैसले पर रूस अभी तक चुप क्यों है?
- Author, स्टीव रोज़नबर्ग
- पदनाम, रूस संपादक, मॉस्को
क्या यह पहली बार होगा जब सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस परमाणु तनाव तक पहुंच सकती है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव की सोशल मीडिया पोस्ट से नाराज़ होकर कहते हैं कि उन्होंने दो परमाणु पनडुब्बियों को रूस के पास तैनात करने का आदेश दिया है.
अब सवाल यह है कि रूस इसका कैसे जवाब देगा? क्या अमेरिका और रूस परमाणु टकराव की ओर बढ़ रहे हैं? क्या यह इंटरनेट युग में 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट जैसा नया रूप है?
शुरुआती प्रतिक्रियाओं को देखकर लगता है कि रूस में इस टकराव को ऐसा नहीं माना जा रहा है.
रूसी मीडिया ने ट्रंप की घोषणा को ख़ास गंभीरता से नहीं लिया है.
ट्रंप के बयान पर रूसी मीडिया में कैसी चर्चा?
मॉस्कोव्स्की कोम्सोमोलेट्स अख़बार से बात करते हुए एक सैन्य टिप्पणीकार ने कहा कि ट्रंप बस 'ग़ुस्से का नाटक' कर रहे हैं.
कोमर्सांट अख़बार से बात करते हुए एक रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल ने ट्रंप के पनडुब्बियों वाले बयान को 'बेमतलब की बकवास' बताया. उन्होंने कहा, "यही तरीक़ा है जिससे वह मज़ा लेते हैं."
इसी अख़बार से बात करते हुए एक रूसी सुरक्षा विशेषज्ञ ने कहा, "मुझे यक़ीन है कि ट्रंप ने पनडुब्बियों के बारे में सच में कोई आदेश नहीं दिया है."
कोमर्सांट ने यह भी याद दिलाया कि 2017 में ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने उत्तर कोरिया को चेतावनी देने के लिए दो परमाणु पनडुब्बियां कोरियाई प्रायद्वीप पर भेजी थीं. लेकिन जल्द ही उन्होंने उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से मुलाक़ात की थी.
तो क्या यह माना जाए कि ट्रंप की ताज़ा पनडुब्बी तैनाती भी अमेरिका-रूस बैठक की तैयारी है? मैं फ़िलहाल इतनी दूर की नहीं सोचूंगा.
लेकिन रूसी अधिकारियों की चुप्पी काफ़ी दिलचस्प है. इस वक़्त तक न रूसी राष्ट्रपति कार्यालय, न रूसी विदेश मंत्रालय और न ही रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई है.
रूसी परमाणु पनडुब्बियों को अमेरिका के क़रीब तैनात करने की कोई घोषणा भी नहीं हुई है.
इसका मतलब हो सकता है कि या तो रूस अभी हालात का आकलन कर रहा है और सोच रहा है कि आगे क्या करना है, या फिर उसे इस पर प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत ही नहीं लगती.
रूसी मीडिया की प्रतिक्रिया, जिसका ज़िक्र पहले किया गया है, उसको देखते हुए लगता है कि मामला कुछ और है.
ट्रंप और मेदवेदेव क्यों आए आमने-सामने?
ट्रंप और मेदवेदेव के बीच कई दिनों से सोशल मीडिया पर तनातनी चल रही थी.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने जब रूस को यूक्रेन में युद्ध ख़त्म करने की अपनी 50 दिन की समयसीमा घटाकर दो हफ़्ते से भी कम कर दी थी, तो मेदवेदेव ने पोस्ट किया कि ट्रंप 'रूस के साथ अल्टीमेटम का खेल खेल रहे हैं… हर नया अल्टीमेटम एक धमकी और युद्ध की तरफ़ बढ़ता क़दम है.'
ट्रंप ने जवाब दिया, "मेदवेदेव से कहो कि बोलते समय सावधान रहें. वह नाकाम पूर्व रूसी राष्ट्रपति अब भी सोचते हैं कि सत्ता में हैं. वह बहुत ख़तरनाक इलाक़े में क़दम रख रहे हैं."
इसके बाद मेदवेदेव की अगली पोस्ट में 'डेड हैंड' का ज़िक्र था, जो सोवियत दौर में विकसित एक स्वचालित परमाणु जवाबी हमला प्रणाली है.
ये बात साफ़ तौर पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अच्छी नहीं लगी.
2008 से 2012 तक रूस के राष्ट्रपति रहते हुए मेदवेदेव को अपेक्षाकृत उदार नेता माना जाता था. उनका मशहूर बयान था, "आज़ादी ग़ुलामी से बेहतर है."
लेकिन समय के साथ उनका रवैया काफ़ी सख़्त होता गया. रूस के यूक्रेन पर पूरी तरह से आक्रमण के बाद से वह अपने तीखे और पश्चिम विरोधी सोशल मीडिया पोस्ट के लिए मशहूर हो गए हैं.
इनमें से ज़्यादातर पोस्ट पर ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि उन्हें रूस की आधिकारिक आवाज़ नहीं माना जाता.
लेकिन अब अमेरिका के राष्ट्रपति का उन पर ध्यान गया है और सिर्फ़ ध्यान ही नहीं गया, बल्कि उन्होंने ट्रंप को काफ़ी नाराज़ कर दिया.
सोशल मीडिया पोस्ट पसंद न आना अलग बात है. लेकिन उसे इतना नापसंद करना कि परमाणु पनडुब्बियां तैनात करने की घोषणा की जाए, यह बहुत बड़ी बात है.
ट्रंप ने ऐसा क्यों किया?
ट्रंप ने न्यूज़मैक्स को दिए इंटरव्यू में कहा, "मेदवेदेव ने परमाणु हथियारों के बारे में बहुत बुरी बातें कहीं. जब कोई 'परमाणु' शब्द का ज़िक्र करता है, तो मेरी आंखें चौकन्नी हो जाती हैं और मैं कहता हूं कि हमें सावधान रहना चाहिए, क्योंकि यह अंतिम ख़तरा है."
हालांकि मेदवेदेव पर लंबे समय से सोशल मीडिया पर परमाणु धमकी भरे बयान देने के आरोप लगते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है.
स्पष्ट है कि ट्रंप ने मेदवेदेव की ताज़ा पोस्ट को बहुत निजी तौर पर लिया और उसी हिसाब से प्रतिक्रिया दी.
क्या इसमें कोई रणनीति भी हो सकती है? ट्रंप के काम करने के तरीक़े में अप्रत्याशित क़दम उठाना हमेशा अहम रहा है, चाहे व्यापार हो या राजनीति. ऐसे फ़ैसले जो विरोधियों को बातचीत से पहले या बातचीत के दौरान असंतुलित कर दें.
यूक्रेन युद्ध ख़त्म करने के मुद्दे पर भी यही रणनीति हो सकती है. संभव है कि पनडुब्बियों की यह अचानक तैनाती भी उसी श्रेणी में आती हो.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित