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ट्रंप के पाकिस्तान से दोस्ताना रवैये के बाद क्या भारत और चीन क़रीब आएंगे?
- Author, इशाद्रिता लाहिड़ी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले महीने वाशिंगटन डीसी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की मुलाक़ात ने भारत के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
एक बड़ा सवाल यह है कि पहलगाम में हुए चरमपंथी हमले के बाद अमेरिका और भारत के संबंधों का भविष्य क्या है. भारत ने पहलगाम में हुए हमले के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था.
एक और अहम सवाल यह है कि ट्रंप के चीन समर्थित पाकिस्तान के साथ दोस्ताना व्यवहार से भारत-चीन संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि एक तरह से चीन ही वो गोंद है जो भारत और अमेरिका को एक साथ जोड़े रखता है.
दोनों ही चीन को एक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं और चीन का मुकाबला करने के लिए मिलकर काम करना चाहते हैं.
बीबीसी ने कुछ विदेश नीति विशेषज्ञों से बात की ताकि यह समझा जा सके कि ट्रंप के साथ मुनीर की मुलाक़ात का चीन के प्रति भारत की नीतियों पर क्या असर पड़ेगा.
क्या ट्रंप और मुनीर की मुलाक़ात भारत की चीन नीति को प्रभावित करेगी?
हमने जिन विशेषज्ञों से बात की, उन सभी ने कहा कि भारत सिर्फ़ ट्रंप और मुनीर की मुलाक़ात की वजह से अपनी चीन नीति में बदलाव नहीं कर रहा है.
उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच संबंधों में नरमी ट्रंप के सत्ता में आने से पहले ही शुरू हो गई थी. हालांकि, ये एक ऐसी बात है जो भविष्य में चीन के प्रति भारत की नीतियों को प्रभावित करेगी.
वाशिंगटन डीसी स्थित विल्सन सेंटर के निदेशक माइकल कुगलमैन का कहना है कि ट्रंप और मुनीर की मुलाक़ात को 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच हुए हालिया संघर्ष के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
वे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि भारत ने सिर्फ़ नए ट्रंप प्रशासन में पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों के मद्देनज़र चीन के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने का फैसला किया है. लेकिन यह विशेष रूप से हाल ही में हुए पाकिस्तान-भारत संघर्ष के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जब पाकिस्तान ने पहली बार भारत के ख़िलाफ़ युद्ध में चीनी हथियारों का इस्तेमाल किया था."
उन्होंने कहा, "भारत ट्रंप की अनिश्चितता और इस समय अमेरिका-भारत संबंधों की अनिश्चित दिशा को लेकर चिंतित है. भारत इस बात को लेकर अनिश्चित है कि ट्रंप चीन के साथ संबंधों को कैसे आगे बढ़ाना चाहते हैं. एक ओर, उन्होंने चीन के साथ प्रतिस्पर्धा जारी रखने की बात की है, लेकिन दूसरी ओर, उन्होंने चीन के साथ साझेदारी बढ़ाने की भी बात की है."
"भारत का मानना है कि उसे यह नहीं मान लेना चाहिए कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध होगा. ऐसे समय में, जब इतनी अनिश्चितता है, भारत बिल्कुल नहीं चाहेगा कि चीन के साथ उसके जटिल संबंध बिगड़ें."
भारत-चीन तनाव में नरमी
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने अक्तूबर 2024 से ही चीन के साथ अपने संबंधों को धीरे-धीरे सहज बनाना शुरू कर दिया था, जब भारत-चीन सीमा पर प्रमुख टकराव बिंदुओं पर दोनों देशों के सैनिकों ने पीछे हटना शुरू किया.. इस महीने की शुरुआत में, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एससीओ विदेश मंत्रियों की बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की. यह छह वर्षों में उनकी पहली चीन यात्रा थी. दोनों देश सीधी उड़ानें फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं. 2020 से रुकी हुई कैलाश-मानसरोवर यात्रा भी इस वर्ष फिर से शुरू कर दी गई. नीति आयोग ने बिना मंजूरी के भारतीय फर्मों में 24% तक चीनी इक्विटी की अनुमति देने के लिए प्रतिबंधों में ढील देने का प्रस्ताव दिया है.
पत्रकार और विदेश नीति विशेषज्ञ, इंद्राणी बागची का कहना है कि भारत अब भी चीन के साथ संबंधों को सावधानीपूर्वक सहज बनाएगा, लेकिन अमेरिका की पाकिस्तान के साथ निकटता के आधार पर अपनी चीन नीति को पूरी तरह से नहीं बदलेगा.
वह कहती हैं, "सरकार चीन के साथ अपने रिश्तों में कुछ हद तक स्थिरता लाने की कोशिश कर रही है. हो सकता है कि हमें चीन से और ज़्यादा निवेश देखने को मिले, लेकिन उससे ज़्यादा कुछ नहीं. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका पाकिस्तान के साथ नज़दीकियाँ बढ़ा रहा है.
" हमने अमेरिका और पाकिस्तान के बीच काफ़ी नज़दीकी रिश्ते देखे हैं. इसका असर अमेरिका-भारत संबंधों के विश्वास पर पड़ता है. अगर अमेरिका पाकिस्तान को हथियार और सैन्य उपकरण देना शुरू कर देता है, तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा. भारत ज़्यादा अमेरिकी हथियार ख़रीदने के लिए रूस से दूरी बनाने और विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. अगर अमेरिका चीन तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है, तो भारत को इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा."
चीन क्या सोच रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत चीन की ओर हाथ बढ़ाता है, तो चीन उसे स्वीकार कर लेगा.
पूर्व राजदूत अचल मल्होत्रा का कहना है कि भारत के सभी देशों के साथ संबंध स्वतंत्र आधार पर चलते हैं.
वे कहते हैं, "चीन के साथ भारत के संबंध स्वतंत्र आधार पर हैं. यह गुण-दोष पर आधारित है, लेकिन हम सतर्क हैं. अमेरिका इसे अच्छी तरह समझता है. मुनीर के साथ बातचीत करने के ट्रंप के फैसले को पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया से उसकी निकटता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. भारत को इसकी चिंता नहीं होगी, जब तक कि इससे हमारे सामरिक हितों को नुकसान न पहुंचे."
विदेश नीति विशेषज्ञ ज़ाकिर हुसैन ने कहा, "भारत के प्रति अमेरिकी नीति ही भारत को चीन की ओर धकेलने का मुख्य कारण है. चीन के प्रति भारत की आर्थिक नीति, खासकर निवेश के क्षेत्र में, कुछ कटुता कम कर सकती है, लेकिन चीन पाकिस्तान की कीमत पर भारत के साथ नहीं आएगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित