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स्नेह राणाः 10 विकेट झटक कर दक्षिण अफ्रीका को मात देने वाली गेंदबाज़
- Author, वर्षा सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, देहरादून से
चेन्नई के एम चिदंबरम स्टेडियम में खेले गए एकमात्र टेस्ट मैच में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने दक्षिण अफ्रीका को 10 विकेट से मात दी.
भारत के लिए इस जीत की हीरो स्पिन गेंदबाज स्नेह राणा रहीं, जिन्होंने मैच में 10 विकेट हासिल किए. स्नेह राणा को उनके इस शानदार प्रदर्शन के लिए प्लेयर ऑफ द मैच का खिताब भी दिया गया.
स्नेह राणा के अलावा शेफाली वर्मा और स्मृति मंधाना ने बल्ले से कमाल का प्रदर्शन करते हुए भारत की जीत में अहम योगदान दिया.
भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया. शेफाली वर्मा और स्मृति मंधाना ने कप्तान हरमनप्रीत कौर के फैसले को सही साबित करते हुए पहले विकेट के लिए 292 रन की साझेदारी की.
स्मृति मंधाना ने 149 रन की पारी खेली. वहीं शेफाली वर्मा ने 205 रन बनाए और वह दोहरा शतक लगाने वाली भारत की दूसरी महिला क्रिकेटर बनीं.
इन दोनों की बेहतरीन पारियों की बदौलत भारत ने 6 विकेट पर 603 रन का स्कोर खड़ा करते हुए पारी घोषित कर दी.
इसके बाद स्नेह राणा ने अपनी गेंदबाजी का कमाल दिखाया और 77 रन खर्च कर 8 विकेट हासिल किए. स्नेह राणा की फिरकी के सामने दक्षिण अफ्रीका की पारी 266 रन पर ही सिमट गई.
भारत को पहली पारी में 337 रन की बढ़त हासिल हुई और उसने दक्षिण अफ्रीका को फॉलोऑन खेलने के लिए मजबूर किया.
दूसरी पारी में भी दक्षिण अफ्रीका 373 पर ऑलआउट हो गया और भारत को जीत के लिए 37 रन का लक्ष्य मिला.
स्मृति मंधाना और शेफाली वर्मा की जोड़ी ने 9.2 ओवर में ही इस लक्ष्य को हासिल कर लिया और भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई.
पहली बार यह कहानी मार्च 2022 में प्रकाशित की गई थी.
5 साल की उम्र से खेल रही हैं क्रिकेट
"बनारस में मैच चल रहा था. 11 साल की स्नेह राणा ग्राउंड के चारों ओर अपने बल्ले से गेंद उड़ा रही थीं. तालियों की गड़गड़ाहट थम ही नहीं रही थी. जिस मैच में 20 साल की लड़कियां भी खेल रही थीं उसमें 11 साल की बच्ची ने अपने बल्ले से तहलका मचा दिया था."
स्नेह राणा के क्रिकेट सफ़र के शुरुआती दिनों को याद करते हुए उनके कोच नरेंद्र शाह ने बीबीसी से ये बात कही.
सिनोला गांव में 5 साल की उम्र से ही गली क्रिकेट खेल रहीं स्नेह राणा में कुछ ख़ास बात थी कि उनके खेल की चर्चा स्थानीय क्रिकेट गुरुओं तक पहुंच गई.
उनके कोच बताते हैं, "स्नेह के पापा ने पहले मना किया कि लड़की क्रिकेट नहीं खेलेगी. लेकिन एक हफ़्ते बाद 9 साल की बच्ची बल्ले के साथ क्रिकेट की बारीकियां सीखने खेल के मैदान में मौजूद थी."
शुरुआती सफ़र
स्नेह के परिवार में अब सिर्फ़ उनकी मां हैं. उनकी शादीशुदा बड़ी बहन ही मां की देखरेख करती हैं. वर्ष 2021 में स्नेह के पिता का निधन हो गया.
मां विमला राणा कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक पहुंचना स्नेह के लिए आसान नहीं था. मेरी दो बेटियां हैं. हमारे परिवार ने कभी बेटियों पर रोकटोक नहीं की. लेकिन पड़ोसी-रिश्तेदार बोलते थे कि लड़की को कहां भेज रहे हो, क्या कर रहे हो? उसे इतना शानदार खेलता हुआ देख आज वही लोग कहते हैं कि वो मेरी भतीजी है, मेरी भांजी है."
विमला राणा ने बेटी के खेल की ख़बर वाले अख़बारों को भी सहेज कर रखा है.
वह बताती हैं, "गांव में लड़के ही क्रिकेट खेलते थे, लड़कियां नहीं. लेकिन स्नेह इतना अच्छा खेलती थी कि लड़के उन्हें अपने साथ क्रिकेट खेलने के लिए ले जाते थे. गांव में हुए एक टूर्नामेंट में वो इतना अच्छा खेली कि उस समय कोच किरण शाह ने कहा कि ये लड़की मुझे ग्राउंड में चाहिए."
कोच नरेंद्र बताते हैं, "उस समय उत्तराखंड का अपना क्रिकेट एसोसिएशन नहीं था. हम उसे खेलने के लिए हरियाणा ले गए. वहां अंडर-19 में उसे ज़्यादा खेलने को नहीं मिला. फिर हमने पंजाब क्रिकेट टीम में बात की."
"वहां अंडर-19 क्रिकेट में उसने जो जलवा दिखाया कि उत्तराखंड की लड़की पंजाब की टीम की कप्तान बन गई. उसके पांव जहां पड़े जीत मिली. सीनियर टीम, रेलवे और भारत-ए की कप्तानी करते हुए उन्होंने कई मैच जीते."
'अ न्यू हीरो फ़ॉर इंडिया'
कोच नरेंद्र बताते हैं, "स्नेह के अंदर क्रिकेट कूट-कूटकर भरा हुआ है. वो 12 साल की थीं. 18-19 साल के लड़के ने क़रीब 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद फेंकी जो उनकी जांघ पर लगी. उनकी आंखों से आंसू निकले मगर वो रोई नहीं. वो निशान आज भी यादगार के तौर पर बना हुआ है."
लेकिन जब श्रीलंका में 2016 में एक मैच के दौरान उनके घुटनों पर चोट लगी तो स्नेह का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर क़रीब 5 साल के लिए ठहर गया. उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते हुए अभी दो साल ही हुए थे.
कोच कहते हैं, "वो उनके लिए बहुत मुश्किल समय था. वो अपना इलाज कराती रहीं और घरेलू क्रिकेट खेलती रहीं. मेहनत करने वालों की हार नहीं होती. स्नेह का फ़ोन आया कि इंग्लैंड जाने वाली टीम में उनका चयन हो गया है. ये उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच था."
इंग्लैंड के साथ खेले गए टेस्ट मैच में स्नेह के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ने "अ न्यू हीरो फ़ॉर इंडिया" शीर्षक से उनके बारे में लिखा.
टीम इंडिया हार की कगार पर पहुंच गई थी और फ़ॉलोऑन खेल रही थी. स्नेह ने 154 बॉल पर नाबाद 80 रन बनाए और मैच ड्रॉ हो गया.
टीम में आठवें स्थान पर बैटिंग करते हुए 50 से अधिक रन बनाने का कारनामा करने का ये वाक्या महिला क्रिकेट में 1998 के बाद दोहराया गया था.
स्नेह राणा पहली बार वर्ल्ड कप में खेल रही हैं. सबकी निगाहें उन पर टिकी हैं. कोच नरेंद्र शाह उनके हर एक मैच को बारीकी से देखते हैं.
6 मार्च को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत के 5 विकेट गिर गए थे. मैच नाज़ुक हो गया था. लेकिन स्नेह एक बार फिर संकटमोचक बनकर आईं. उन्होंने नाबाद 53 रन बनाए और अपनी बल्लेबाज़ी से टीम का स्कोर 255 तक पहुंचाया. फ़िर 2 विकेट भी लिए. इस मैच में जीत के बाद एक बार फिर स्नेह चर्चा में आ गईं.
'कंकड़-पत्थर हटाकर मैदान तैयार करते थे'
स्नेह राणा से 6 साल बड़ी बहन रुचि राणा नेगी कहती हैं, "पहले लोग लड़कों के मैच ही देखते थे. अब लड़कियों के मैच भी देखे जाते हैं. क्रिकेट अब मैन्स वर्ल्ड नहीं रह गया है."
"बैट्समैन ही नहीं अब बैट्सविमेन भी धमाल मचा रही हैं. स्नेह जब घर आती हैं तो लोग अपनी बेटियों को उससे मिलवाने लाते हैं और पूछते हैं कि वे कैसे खेल सकती हैं."
देहरादून में क्रिकेट की प्रैक्टिस कर रही लड़कियां भी स्नेह राणा की तरह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक पहुंचना चाहती हैं.
चमोली से क्रिकेट सीखने देहरादून आई मानसी नेगी बताती हैं, "स्नेह दीदी यहां आती हैं तो हमसे कहती हैं कि हम तो अपने समय में कंकड़-पत्थर हटाकर क्रिकेट खेलने के लिए मैदान तैयार करते थे."
"तुम्हारे सामने प्रैक्टिस के लिए बढ़िया ग्राउंड है, इसमें पसीना बहाना है और ख़ुद में जुनून लाना है." यही स्नेह की जीत का सीक्रेट है.
देहरादून में स्नेह की बचपन की कोच रही किरन शाह कहती हैं, ''क्रिकेट का एक खिलाड़ी तैयार करने में लगन और कई सालों की मेहनत लगती है. क्रिकेट आसान खेल नहीं है. ख़ासतौर पर लड़कियों के लिए. देहरादून में क्रिकेट खेल रही लड़कियां भी अब स्नेह राणा जैसा बनना चाहती हैं.''
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