बिहार चुनाव नतीजे: क्या अब ममता के क़िले को भेद पाएगी बीजेपी

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
14 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के शुरुआती रुझान में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को बढ़त दिखने लगी थी.
इसी दौरान दोपहर 12 बजकर पाँच मिनट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल इकाई ने एक्स पर पोस्ट किया–अब पश्चिम बंगाल.
बिहार के नतीजे साफ़ होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया.
अपने भाषण में उन्होंने कहा, '' गंगा जी, यहाँ बिहार से बहते हुए ही बंगाल तक पहुँचती है. बिहार ने बंगाल में बीजेपी की विजय का रास्ता भी बना दिया है. मैं बंगाल के भाइयों-बहनों को भी आश्वस्त करता हूँ कि अब बीजेपी आपके साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से भी जंगलराज को उखाड़ फेंकेगी.''
ये टिप्पणियाँ राजनीतिक तौर पर अहम मानी जा रही हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. शायद यही वजह है कि बिहार के चुनाव नतीजे के साथ ही पश्चिम बंगाल की चर्चा शुरू हो गई.
भारत के इस पूर्वी राज्य में पिछला चुनाव 2021 की गर्मियों में कोविड-19 की दूसरी और बेहद ख़तरनाक लहर के बीच हुआ था. यहाँ विधानसभा की 294 सीटें हैं.
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बीजेपी को शिकस्त दी थी. टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं. बीजेपी को 77 सीटें मिली थीं. टीएमसी को लगभग 48 फ़ीसदी वोट मिले थे और बीजेपी को 38 फ़ीसदी.
तब सवाल है, बिहार में जहाँ बीजेपी-जेडीयू के नेतृत्व वाले एनडीए ने बड़ी जीत हासिल की है और पश्चिम बंगाल, जहाँ बीजेपी कभी नहीं जीती, राजनीतिक तौर पर इन दोनों राज्यों को कैसे देखा जाए?
यही नहीं, इनमें क्या समानताएँ हैं और क्या फ़र्क़? इस राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार इसे कैसे देखते हैं? हमने यही जानने-समझने की कोशिश की.
पार्टियाँ क्या कह रही हैं?

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बिहार में नतीजों के बाद बीजेपी पश्चिम बंगाल को अपना अगला लक्ष्य बता रही है.
पार्टी के कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि वहाँ पार्टी की जीत होगी. हालाँकि, टीएमसी नेता कुणाल घोष ने दावे को खारिज किया.
कुणाल घोष ने एक पोस्ट में कहा, "बंगाल की राजनीतिक क़िस्मत पटना या दिल्ली में नहीं लिखी जाती. यह यहाँ लिखी जाती है, उन लोगों द्वारा जिन्होंने बार-बार बीजेपी की बाँटने वाली राजनीति को नकारा है और ममता बनर्जी पर भरोसा जताया है… साल 2026 में बीजेपी का वही अंजाम होगा, जो हमेशा बंगाल में होता आया है– नाकामी और अप्रासंगिकता."
एसआईआर की चर्चा क्यों?
बिहार में चुनाव से पहले गहन मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) हुआ था. इस पर काफ़ी विवाद भी हुआ.
बिहार में हार स्वीकार करते हुए भी, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाने की ओर इशारा किया.
भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के अनुसार, बिहार के बाद एसआईआर का दूसरा चरण नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है. इसमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है.
कई विपक्षी पार्टियों ने बिहार की तरह ही इस चरण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया 'एक्स' पर लिखा, "बिहार में जो खेल एसआईआर ने किया है, वो पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, यूपी और बाक़ी जगह पर अब नहीं हो पाएगा क्योंकि इस चुनावी साज़िश का अब भंडाफोड़ हो चुका है. अब आगे हम ये खेल, इनको नहीं खेलने देंगे".
उन्होंने कहा कि विपक्षी दल सतर्क रहेंगे और बीजेपी की मंशा को नाकाम करेंगे.
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रक्रिया को पहले ही "पीछे के दरवाज़े से एनआरसी" लाने की 'चाल' बता चुकी हैं.

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विशेषज्ञों की राय
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत के दौरान 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की पॉलिटिकल एडिटर सुनेत्रा चौधरी कहती हैं, "मैं मानती हूँ कि ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों बिहार चुनाव के नतीजों को बहुत ध्यान से देख रहे होंगे.''
''अखिलेश यादव ने एनडीए की जीत का श्रेय एसआईआर को कहीं न कहीं दिया है. मुझे लगता है ममता भी यही करेंगी. वह शायद चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ और ज़्यादा आक्रामक होंगी.''
सुनेत्रा का कहना है, ''उनके बारे में एक और बात है, वह बहुत जल्दी सीखती हैं. मुझे लगता है कि बिहार में महागठबंधन के मुक़ाबले वह बीजेपी के ख़िलाफ़ ज़्यादा संगठित और मज़बूत लड़ाई लड़ेंगी."
हालाँकि, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में बिज़नेस स्टैंडर्ड की कंसल्टिंग एडिटर अदिति फडणीस मानती हैं कि यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि एसआईआर का पश्चिम बंगाल पर राजनीतिक या प्रशासनिक असर क्या होगा. फिलहाल, एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है और चार दिसंबर 2025 तक जारी रहेगी.

महिलाओं की भूमिका
हालाँकि बिहार के नतीजों के सभी बारीक विवरण अभी आने बाकी हैं, लेकिन यह माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने महिला मतदाताओं को अपनी मुख्य ताक़त के रूप में जोड़ने की कामयाब कोशिश की है.
चुनाव आयोग से मिले आँकड़ों के मुताबिक़, बिहार के इस चुनाव में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही.
भारत में मुख्यमंत्री काफ़ी कम महिलाएँ हुई हैं. ममता बनर्जी इनमें से एक हैं. उन्हें भी अक्सर महिला मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का श्रेय दिया जाता है. उनकी सरकार ने कई योजनाएँ शुरू कीं. इनमें से कुछ सीधे महिलाओं और लड़कियों के लिए हैं. जैसे, लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक मदद और ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीब परिवारों की महिलाओं को संगठित करके रोज़गार के ज़रिए उनकी क्षमता बढ़ाना.
हालाँकि, हाल के समय में राज्य में महिलाओं के साथ यौन हिंसा की कई घटनाएँ हुईं. बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इसके बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अब भी उनकी इस महिला वर्ग पर उतनी ही मज़बूत पकड़ है?

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बिहार और पश्चिम बंगाल - समानताएँ और अंतर
दोनों राज्यों की सीमाएँ पड़ोसी देशों से लगती हैं. बिहार की नेपाल से और पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश और नेपाल से. ये सीमाएँ कई जगह खुली हैं और यहाँ से विदेशी नागरिकों के अनियंत्रित प्रवेश के आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं.
एक और बात- दोनों राज्यों की प्रति व्यक्ति सालाना आय राष्ट्रीय औसत से कम है. लेकिन कई मामलों में दोनों अलग भी हैं.
नीति आयोग के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल की मौजूदा प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 1,54,000 रुपए से अधिक है. यह बिहार के 60,337 रुपए से दोगुनी है.
मतदाताओं की संख्या में भी अंतर है. बिहार में एसआईआर के बाद 7.4 करोड़ से ज़्यादा मतदाता हैं, जबकि चुनाव आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में अक्तूबर 2025 तक 7.6 करोड़ से अधिक मतदाता थे.
अदिति फडणीस बताती हैं, "मैं इन दोनों राज्यों को बिल्कुल अलग मानती हूँ. बिहार में बीजेपी सरकार में थी और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ उसकी मज़बूत मौजूदगी थी. पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है.''
''साथ ही, बिहार में नीतीश कुमार की मौजूदगी से एनडीए को मुस्लिम वोट भी मिला होगा, जो शायद पश्चिम बंगाल में संभव न हो क्योंकि वहाँ लड़ाई ज़्यादा ध्रुवीकृत होगी."

कोलकाता के विश्लेषक सुदीप्त सेनगुप्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "बीजेपी ने बिहार में जीत हासिल की है, लेकिन इससे पश्चिम बंगाल में उनका रास्ता आसान नहीं माना जा सकता. यहाँ की ज़मीनी हक़ीक़त बिहार से बिल्कुल अलग है. पश्चिम बंगाल में एक मज़बूत पार्टी सत्ता में है.''
उनके मुताबिक़, ''आजकल राज्य के चुनाव नेता के चेहरे पर केंद्रित होते हैं. बीजेपी के मुक़ाबले, यह बात टीएमसी को फ़ायदा देती है. ममता बनर्जी की उम्मीदवारी के बारे में कोई शक नहीं है, जबकि बीजेपी के पास अभी ऐसा चेहरा नहीं है.''
''संगठन की ताक़त के मामले में, टीएमसी ने वह आधार संभाल लिया है जो पहले वाम दलों के पास था. दूसरी ओर, बीजेपी विपक्ष में रहते हुए भी अपनी रणनीति मज़बूती से नहीं बना पाई है."
सुदीप्त सेनगुप्ता वेबसाइट 'फोर्थ पिलर वी द पीपल' के मुख्य संपादक भी हैं. हमने उनसे पूछा कि आज पश्चिम बंगाल में बीजेपी जिस हालत में है, उसमें वह किस क़िस्म की रणनीति अपनाएगी?
उनके मुताबिक़, "बीजेपी की रणनीति हिंदुत्व पर केंद्रित है. भले ही पश्चिम बंगाल में यह सबसे बड़ा वोट पाने वाला मुद्दा नहीं रहा है. अब बीजेपी मतुआ समुदाय पर ध्यान दे रही है. जो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों का समूह है.''
''पार्टी जाति के आधार पर यह तर्क दे रही है कि राज्य में हमेशा ऊँची जाति के लोग हावी रहे हैं. वह एक तथाकथित पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार को आगे लाने का प्रयास करेगी. लेकिन देखना होगा कि इस तरह के अभियान को कितनी कामयाबी मिलती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















