पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा जो किसी के लिए थे अक्खड़, तो किसी के लिए शातिर

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

प्रधानमंत्रियों के आसपास रहने वाले कई नौकरशाह स्वाभाविक रूप से बहुत पावरफ़ुल हो जाते हैं, ऐसे कई नाम लिए जा सकते हैं.

ऐसे लोगों की सूची में भी एक नाम इस वजह से ख़ास है क्योंकि वह व्यक्ति प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव और देश का पहला राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दोनों था.

आज अजित डोभाल को देश के सबसे शक्तिशाली लोगों में गिना जाता है लेकिन इस पद की अहमियत को स्थापित करने वाले शख़्स थे ब्रजेश मिश्रा.

ब्रजेश मिश्रा के बाद जेएन दीक्षित, एमके नारायणन और शिवशंकर मेनन जैसे कई नामी लोग राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने लेकिन ब्रजेश मिश्रा कई कारणों से याद किए जाते हैं जिनमें से पोखरण का परमाणु परीक्षण भी है.

परीक्षण का दिन

11 मई,1998, सात रेसकोर्स रोड प्रधानमंत्री आवास के डायनिंग रूम में प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री समेत आला अधिकारी जमा थे.

उस कमरे का माहौल पत्रकार और लेखक राज चेंगप्पा ने अपनी किताब ‘वेपंस ऑफ़ पीस’ में कुछ इस तरह बयान किया है, “कमरे में सभी लोग चुपचाप बैठे हुए थे लेकिन बेचैन ब्रजेश मिश्रा कमरे में चहलक़दमी कर रहे थे. जैसे ही कोई टेलीफ़ोन बजता, वो कॉल उठाने के लिए लपकते. जब 11 बजे फ़ोन आया तो उन्होंने फ़ोन करने वाले को कुछ निर्देश दिए और वाजपेयी की तरफ़ मुड़कर बोले, ‘पोखरण से ख़बर आई है कि मौसम के कारण अभी कुछ और देर होगी'.”

चेंगप्पा लिखते हैं, “ब्रजेश मिश्रा ने पहली घंटी पर फ़ोन उठाया. दूसरे छोर पर एपीजे अब्दुल कलाम थे. कलाम के शब्द थे, ‘सर, वी हैव डन इट.’ मिश्रा चिल्लाए, ‘गॉड ब्लेस यू.’ जब मिश्रा ने वाजपेयी को ख़बर दी तो उनके चेहरे पर अरसे बाद मुस्कान दिखाई दी. वहाँ मौजूद जॉर्ज फ़र्नांडिस और आडवाणी की आँखों में आँसू आ गए.”

इसके बाद वाजपेयी ने 7 रेसकोर्स रोड के लॉन से ऐलान किया, "आज 3 बजकर 45 मिनट पर भारत ने पोखरण रेंज में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए हैं. मैं परीक्षण करने वाले इंजीनियरों को वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई देता हूँ.”

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा के बेटे

ब्रजेश मिश्रा कांग्रेस के बड़े नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डीपी मिश्रा के बेटे थे. जब सन 1951 में उनका भारतीय विदेश सेवा में चयन हुआ तो उनकी उम्र 23 वर्ष थी.

लेखक कल्लोल भट्टाचार्जी अपनी किताब ‘नेहरूज़ फ़र्स्ट रिक्रूट्स’ में लिखते हैं, “ये माना जाता है कि उनके पिता और इंदिरा गाँधी के बीच अस्थिर राजनीतिक रिश्तों का असर ब्रजेश मिश्रा के करियर के एक हिस्से पर पड़ा. ब्रजेश को इसका नुक़सान उठाना पड़ा.”

ब्रजेश मिश्रा को पहले कीनिया और फिर बेल्जियम के भारतीय दूतावासों में तैनात किया गया. फिर उनको न्यूयॉर्क में भारत के स्थायी मिशन में पोस्टिंग मिली.

सन 1968 में जब संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि जी पार्थसारथी दिल्ली में विचार-विमर्श करने के बाद वापस न्यूयॉर्क लौटे तो उन्होंने ब्रजेश मिश्रा से चीन में भारत का प्रतिनिधि बनने की पेशकश की.

चीन में बने भारत के प्रतिनिधि

ये एक चुनौतीपूर्ण तैनाती थी क्योंकि 1962 के युद्ध के बाद भारत-चीन संबंध अपने सबसे ख़राब दौर में पहुंच चुके थे. मिश्रा इस पोस्टिंग के लिए तैयार हो गए.

एक फ़रवरी, 1969 को न्यूयॉर्क छोड़ने से पहले ब्रजेश मिश्रा दिल्ली आए जहाँ प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें मिलने का समय दिया.

ब्रजेश मिश्रा ने इंडियन फॉरेन अफ़ेयर्स जर्नल के अक्तूबर, 2006 के अंक में ‘माओज़ स्माइल रिविज़िटेड’ शीर्षक से दिए इंटरव्यू में कहा, “बातचीत के दौरान इंदिरा गाँधी ने मुझसे कहा चीन के साथ संबंधों में हम गढ़े हुए प्रतिमानों के अंदर चल रहे हैं. मैं इससे बाहर निकलना चाहती हूँ.”

अप्रैल, 1969 में बीजिंग पहुंचकर मिश्रा ने इंदिरा गांधी के निर्देशों का पालन करते हुए दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य बनाने की दिशा में महीने में एक या दो बार चीनी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मिलना शुरू कर दिया.

माओ से ऐतिहासिक मुलाक़ात

1 मई, 1970 को ब्रजेश मिश्रा और उनकी पत्नी पुष्पा मई दिवस समारोह में भाग लेने तियानमेन स्क्वायर गए. वहाँ चीन के सर्वोच्च नेता माओ भी आए हुए थे. उन्होंने सबसे पहले अल्बेनिया के राजदूत को शुभकामनाएं दीं.

ब्रजेश मिश्रा राजदूतों की पंक्ति में सबसे आख़िर में खड़े थे.

ब्रजेश मिश्रा ने लिखा है, “जब वो हमारे पास आए तो उन्होंने मेरी पत्नी के माथे पर लगी बिंदी को नोटिस किया और रुक कर बोले, ‘इंदु.’ शायद उनका ये तात्पर्य था कि उन्होंने उन्हें पहचान लिया है कि वो एक भारतीय महिला हैं. इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, माओ ने कहा, ‘हम कब तक इस तरह लड़ते रहेंगे, अच्छा हो अब हम फिर से दोस्त हो जाएं. भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री गांधी तक मेरा अभिवादन पहुंचा दीजिए'.”

पिछले एक दशक में किसी भारतीय राजनयिक ने चीन के चोटी के नेता से भारत के बारे में इतनी मित्रतापूर्ण बात नहीं सुनी थी.

ये भारत चीन संबंधों का ‘वाटरशेड मोमेंट’ था. मई दिवस का समारोह चलता रहा लेकिन ब्रजेश मिश्रा की कोशिश थी कि माओ का संदेश जितनी जल्दी हो दिल्ली तक पहुंचाया जाए.

उन्होंने फ़ौरन दूतावास पहुंचकर माओ से हुई बातचीत के बारे में दिल्ली तार भेजा.

अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप का समर्थन नहीं

दिलचस्प बात ये थी कि दिल्ली में इस नए घटनाक्रम को बहुत उत्साह से नहीं लिया गया. इंदिरा गाँधी के दो प्रमुख सलाहकार पीएन हक्सर और डीपी धर चीन से संबंध सामान्य करने के प्रति उदासीन थे.

बाद में ब्रजेश मिश्रा ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि संभवतः इसके पीछे वजह ये रही हो कि उस समय भारत और सोवियत संघ के बीच संधि की बात चल रही थी और भारत का नेतृत्व सोवियत संघ को नाराज़ नहीं करना चाहता था.

चीन से संबंध सामान्य करने में भारत को कई साल लग गए. भारत ने छह वर्ष बाद यानी 1976 में केआर नारायणन को अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा.

ब्रजेश मिश्रा एक बार फिर सन 1980 में समाचारों में आए. उस समय वो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के तौर पर तैनात थे.

कैबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव के पद से रिटायर हुए बी रमण ने आउटलुक पत्रिका के 29 सितंबर, 2012 के अंक में लिखा, “मिश्रा के कार्यकाल के दौरान सोवियत संघ की सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान में घुसी थीं. उस समय की चरण सिंह सरकार सोवियत हमले का समर्थन नहीं कर रही थीं लेकिन जनवरी, 1980 में इंदिरा गाँधी दोबारा सत्ता में आ गईं. उन्होंने विदेश मंत्री नरसिम्हा राव को ख़ासतौर से संयुक्त राष्ट्र भेजा ताकि सोवियत हमले का समर्थन किया जा सके.”

ब्रजेश मिश्रा ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने पहले से तैयार भाषण पढ़ा जिसमें सोवियत हमले की आलोचना नहीं की गई थी.

रमण ने लिखा है, “बाद में मिश्रा ने अपने ख़ास दोस्तों को बताया कि उन्होंने दिल्ली के आदेश पर वो भाषण पढ़ तो दिया था लेकिन वो इससे बिल्कुल सहमत नहीं थे.”

वाजपेयी ने अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया

इसके कुछ दिनों बाद ही उन्होंने समय से पहले ही भारतीय विदेश सेवा से रिटायरमेंट ले लिया था और वो संयुक्त राष्ट्र महासचिव के स्टाफ़ में शामिल हो गए थे.

सन 1987 में वो भारत वापस लौटे थे और सन 1991 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली थी.

उनको बीजेपी के विदेश मामलों के सेल का प्रमुख बनाया गया था और उन्होंने बीजेपी को विदेश मामलों पर सलाह देनी शुरू कर दी थी.

इस दौरान मिश्रा और वाजपेयी के रिश्तों में प्रगाढ़ता बढ़ी और जब वाजपेयी 1998 में प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ब्रजेश मिश्रा को अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया.

वैसे वाजपेयी की ब्रजेश मिश्रा से पहली मुलाक़ात सन 1978 में हुई थी जब वाजपेयी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ अमेरिका की यात्रा पर गए थे.

पत्रकार वीर सांघवी अपनी आत्मकथा ‘अ रूड लाइफ़ अ मेमॉएर’ में लिखते हैं, “हर संकोची शख़्स को एक बेबाक शख़्स की ज़रूरत होती है जो ‘बुरे आदमी’ का रोल निभा सके और वक्त आने पर वो चीज़ें कह सके जिसके कहने की ज़रूरत होती है."

"अगर वाजपेयी ने किसी ऐसे शख़्स को चुना होता जो बीजेपी नेतृत्व के नज़दीक होता तो उसकी वफ़ादारी हमेशा आडवाणी के प्रति रहती. वाजपेयी ऐसा नहीं चाहते थे. वो अपना आदमी चाहते थे, ब्रजेश अपने अक्खड़पन और बीजेपी के दूसरे नेताओं के प्रति बेरुख़ी के कारण फिट बैठते थे.”

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की दोहरी ज़िम्मेदारी

परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद केसी पंत की अध्यक्षता में बनाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा कमेटी की सिफ़ारिश पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का नया पद बनाया गया और इसकी ज़िम्मेदारी भी ब्रजेश मिश्रा को दे दी गई.

उस समय भी दो महत्वपूर्ण पदों पर एक व्यक्ति को बिठाने के निर्णय पर सवाल उठाए गए.

पंत कमेटी एक स्वतंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पक्ष में थी. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष सुब्रमणयम ने भी दो अवसरों पर इन दो पदों को जोड़े जाने पर सार्वजनिक रूप से अपनी आशंका ज़ाहिर की थी.

उनका कहना था कि प्रधान सचिव मिश्रा का अधिकतर समय प्रधानमंत्री कार्यालय को चलाने में जाएगा और वो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अपनी भूमिका को पूरा समय नहीं दे पाएंगे.

रमण लिखते हैं, “मिश्रा ने इसका जवाब ये कहकर दिया था कि इन पदों पर रहते हुए वो राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर मिलने वाली परस्पर विरोधी सलाह को प्रधानमंत्री तक पहुँचने में रोक पाएँगे.”

रमण ने लिखा कि ब्रजेश मिश्रा ने उनसे कहा था कि “मैं चाहता हूँ कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हर सलाह इस कार्यालय से होकर ही प्रधानमंत्री तक जाए.”

पोखरण परीक्षण के बाद की चुनौती

पोखरण परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों की ओर से भारत को काफ़ी दबाव का सामना करना पड़ा. अमेरिका के क्लिंटन प्रशासन ने रक्षा और टेक्नॉलोजी के मामले में भारत पर कई सख़्त प्रतिबंध लगा दिए.

बी रमण ने लिखा, “क्लिंटन प्रशासन भारत से बहुत नाराज़ था. चीन भी नाराज़ था. यूरोपीय संघ की सहानुभूति भी भारत के साथ नहीं थी. सिर्फ़ रूस ही भारत का समर्थन कर रहा था. हममें से बहुतों का मानना था कि भारत ‘डिप्लोमैटिक डॉग हाउज़’ की तरफ़ बढ़ रहा है.”

रमण लिखते हैं कि यह बहुत चुनौतीपूर्ण स्थिति थी, जिसे “ब्रजेश मिश्रा ने बहुत काबिलियत के साथ संभाला. ये भी सुनिश्चित किया कि परीक्षण के एक साल के अंदर परमाणु डॉक्टरिन का मसौदा न सिर्फ़ तैयार हो जाए बल्कि उस पर अमल भी शुरू हो जाए.”

आडवाणी से मतभेद

ऐसा नहीं है कि मिश्रा हमेशा कामयाब रहे हों या हर मामले में उनकी तारीफ़ ही हो, कंधार विमान अपहरण कांड में उन्हें काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ा.

उन्होंने शेखर गुप्ता के ‘वॉक द टॉक’ कार्यक्रम में दिए इंटरव्यू में सफ़ाई दी कि उन्होंने अमृतसर में खड़े विमान के टायर बर्स्ट करने के आदेश दे दिए थे लेकिन वहाँ मौजूद लोग ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.

ये भी कहा गया कि आंतरिक सुरक्षा के मामलों में ब्रजेश मिश्रा की उतनी पकड़ नहीं थी जितनी कि विदेशी मामलों में.

गृह मंत्री आडवाणी ‘आंतरिक सुरक्षा’ पर अपनी मज़बूत पकड़ रखना चाहते थे और ब्रजेश मिश्रा की इस मामले में दिलचस्पी को कम-से-कम रखना चाहते थे.

आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ़’ में लिखा भी है, "मेरे विचार से दो महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को एक साथ निभाना शासन के उच्चतम स्तर पर सामंजस्य बैठाने में मददगार साबित नहीं हुआ."

वाजपेयी के विश्वासपात्र

ब्रजेश मिश्रा की नियुक्ति बाद में वाजपेयी और आडवाणी के बीच दूरी की वजह बनी.

विनय सीतापति अपनी किताब ‘जुगलबंदी द बीजेपी बिफ़ोर नरेंद्र मोदी’ में लिखते हैं, “भारत में प्रधानमंत्रियों के प्रधान सचिवों के बड़ी भूमिका निभाने की पुरानी परंपरा रही है. इंदिरा गाँधी के ज़माने में पीएन हक्सर, इंदिरा और राजीव के ज़माने में पीसी एलेक्ज़ेंडर और नरसिम्हा राव के ज़माने में अमरनाथ वर्मा की तूती बोला करती थी."

"ब्रजेश मिश्रा के पक्ष में ये बात जाती थी कि वाजपेयी के दोस्त होने के साथ-साथ उनके ड्रिंकिंग पार्टनर भी थे. सुबह नाश्ते के समय रोज़ ब्रजेश मिश्रा उनकी डायनिंग टेबिल पर मौजूद रहते थे. नाश्ते के दौरान ही वो दिनभर का एजेंडा तय करते थे. ये बैठक दिन की सबसे महत्वपूर्ण बैठक हुआ करती थी.”

जाने-माने पत्रकार शेखर गुप्ता ने ‘द प्रिंट’ के 6 अक्तूबर, 2012 के अंक में ‘वाजपेइज़ अटल’ शीर्षक लेख में लिखा था, “नरसिम्हा राव जितना एएन वर्मा पर विश्वास करते थे उससे कहीं अधिक वाजपेयी ब्रजेश मिश्रा पर विश्वास करते थे. जो फ़ाइलें वर्मा सामने रखते थे राव उन्हें पढ़ते ज़रूर थे. वाजपेयी अक्सर ऐसा नहीं करते थे.”

शेखर लिखते हैं, “सन 1999 का एक दृश्य मैं अभी तक भूला नहीं हूँ. मैं वाजपेयी के साथ बैठा हुआ था. मिश्रा कमरे में ड्रिंक का गिलास पकड़े हुए दाख़िल हुए. वो नंगे पैर थे. उन्होंने वाजपेयी से पूछा क्या आपने फ़लाँ फ़ाइल पर दस्तख़त कर दिए? वाजपेयी का जवाब था, ‘कर दिया, जैसा आपने कहा. लेकिन ध्यान से देख लिया था न आपने? कहीं कुछ गड़बड़ पर हस्ताक्षर हो जाएँ और कल शेखर जी जेल पहुंचा दें.’ ज़ाहिर है, वाजपेयी हम दोनों की टाँग खींच रहे थे लेकिन इससे पता चलता है कि ब्रजेश मिश्रा पर उन्हें कितना विश्वास था.”

वाजपेयी ने शिकायतों को किया नज़रअंदाज़

अक्तूबर, 2000 में वाजपेयी इस बात के साफ़ संकेत देने लगे थे कि आडवाणी को पावरफ़ुल नंबर टू के तौर पर देखना पूरी तरह सही नहीं होगा.

केके कत्याल ने 'द हिंदू' के 10 अक्तूबर, 2000 के अंक में ‘वाई इज़ डेल्ही विदाउट एक्टिंग पीएम’ लेख में लिखा कि जब दक्षिण मुंबई के ब्रीच केंडी अस्पताल में वाजपेयी के घुटनों का ऑपरेशन हुआ तो ब्रजेश मिश्रा के नेतृत्व में पूरा प्रधानमंत्री कार्यालय दिल्ली से मुंबई चला गया और आडवाणी को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया.

अपने कार्यकाल के दौरान ब्रजेश मिश्रा को न सिर्फ़ विपक्ष ने निशाना बनाया, बल्कि सरकार के कुछ लोगों और संघ परिवार ने उनकी खुलकर आलोचना की.

आरएसएस के तत्कालीन प्रमुख केएस सुदर्शन ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री कार्यलय में सक्षम लोगों को नियुक्त किया जाना चाहिए.’

कई कैबिनेट मंत्रियों ने वाजपेयी से मिलकर बिना मिश्रा का नाम लिए पीएम कार्यालय पर एक गंभीर नज़र डालने का अनुरोध किया.

प्रभु चावला ने इंडिया टुडे के 2 अप्रैल, 2001 के अंक में ‘इंपॉर्टेंस ऑफ़ बीइंग ब्रजेश मिश्रा’ शीर्षक लेख में लिखा, “कई शक्तिशाली मंत्रियों जैसे लालकृष्ण आडवाणी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और जॉर्ज फ़र्नांडिस ने समय-समय पर मिश्रा से अपनी नाराज़गी वाजपेयी के सामने व्यक्त की थी. लेकिन वाजपेयी पर इसका कोई असर नहीं हुआ. वाजपेयी ने उन सभी लोगों से कहा कि वो मिश्रा को हटाने के बजाए ख़ुद अपना पद छोड़ना पसंद करेंगे. उन्होंने कहा कि अपने स्टाफ़ को चुनना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता.”

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