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अकबर पर क्या रुख़ बदल रही है बीजेपी?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मोदी सरकार ने जी-20 सम्मेलन के लिए जो पत्रिका निकाली थी, उसमें भारत की अब तक की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा की झलकियाँ दिखाई गई हैं.
पत्रिका, 'भारत : मदर ऑफ डेमोक्रेसी' में भारत की प्राचीन सभ्यता, लोकतांत्रिक परंपराओं, धर्मों, संतों, आस्थाओं, महापुरुषों और शासकों का ज़िक्र है.
शासकों में रामायण में वर्णित राम, मगध के अजातशत्रु, मुग़ल बादशाह और भारत की आज़ादी के बाद से लेकर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के बारे में बताया गया है.
पत्रिका में मुग़ल बादशाह अकबर का परिचय देते हुए कहा गया है कि उनकी लोकतांत्रिक सोच बाकियों से हट कर और अपने समय से काफ़ी आगे थी.
पत्रिका में उनके बारे में लिखा गया है,’’अच्छे प्रशासन में सभी का कल्याण निहित होना चाहिए, चाहे वो किसी भी धर्म के मानने वाले क्यों न हों. तीसरे मुग़ल बादशाह अकबर ने ऐसा ही लोकतंत्र अपनाया था. अकबर ने ‘सुलह-ए-कुल’ यानी सार्वभौमिक शांति का सिद्धांत दिया. यह धार्मिक भेदभाव के ख़िलाफ़ बना सिद्धांत था’’
पत्रिका में अकबर की उदारता, धार्मिक सहिष्णुता और उनके शासन के लोकतांत्रिक मिजाज का ज़िक्र किए जाने की काफ़ी चर्चा है.
जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में अकबर के बारे में क्या लिखा है?
जी-20 सम्मेलन के लिए जारी की गई पत्रिका में अकबर को एक लोकतांत्रिक, धार्मिक भेदभाव न करने वाला सहिष्णु बादशाह बताया गया है.
बीजेपी की सरकार का ये क़दम चौंकाने वाला लगता है, ख़ासकर वैसी स्थिति में जब बीजेपी के कई नेता अकबर समेत मुग़ल शासकों की आलोचना करते रहते हैं.
क्या सरकार इससे कोई राजनीतिक मैसेज देना चाहती है.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, '' देखिए चुनाव आ रहे हैं. लिहाजा सरकार अल्पसंख्यकों को एक मैसेज देने की कोशिश कर रही है. ख़ास कर वर्ल्ड लीडर्स के सामने. आप एकदम तो इतिहास नहीं बदल सकते. लिहाजा अकबर को शांति और लोकतंत्र का हिमायती बताया जा रहा है. जी-20 सम्मेलन में तुर्की भी था और कई अफ़्रीकी देश भी,जहाँ इस्लाम मुख्य धर्म है. इसलिए भी पत्रिका में एक मुस्लिम बादशाह की तारीफ़ की गई होगी.’’
भारतीय संसद में पिछले कुछ सालों से बीजेपी की ओर से मुस्लिम प्रतिनिधियों का पहुँचना लगभग बंद हो गया है.
ऐसे में क्या मोदी सरकार विश्व समुदाय के सामने दिखाना चाह रही है कि वो मुसलमानों को नज़रअंदाज़ नहीं कर रही है.
क्या जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में उदार बादशाह के तौर पर अकबर की तारीफ़ इस रणनीति का हिस्सा है?
शरद गुप्ता कहते हैं, ‘’राज्यसभा और लोकसभा में बीजेपी का कोई भी मुस्लिम चेहरा नहीं है. हो सकता है कि वह अगले चुनाव में भी मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट न दे. लेकिन जी-20 एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था. लिहाजा वहाँ अपना समावेशी चेहरा दिखाने की ज़रूरत थी.''
वो कहते हैं, ''इस बीजेपी सरकार की दुनिया में इस बात के लिए आलोचना होती है कि वो अल्पसंख्यकों को सम्मान और स्पेस नहीं देती है. लिहाजा मोदी सरकार ने जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में अकबर की सहिष्णुता के कसीदे काढ़ कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बताने की कोशिश की है कि दुनिया जैसा सोचती है वैसा नहीं है.’’
क्या अकबर को अपवाद की तरह देखा जा रहा है?
चर्चित लेखिका पार्वती शर्मा ‘अकबर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ नाम की किताब लिख चुकी हैं, जिसमें अकबर के तमाम पहलुओं का जिक्र है.
बीबीसी हिंदी ने उनसे पूछा कि जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में अकबर की तारीफ़ के क्या मायने हैं?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ’’बीजेपी मुस्लिम या मुग़ल बादशाहों को इस तरह दिखाती है कि वे विदेशी हमलावर शासक रहे हैं और उनका कोई योगदान भारतीय समाज में नहीं रहा है.ऐसे में अगर सरकार की जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में अकबर की तारीफ़ की गई है, तो ये विरोधाभास तो है ही.’’
भारतीय समाज में पुराने समय से लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने के लिए दूसरे उदाहरण दिए जा सकते थे.
महाजनपदों के समय आम सहमति से राजा का चुनाव से लेकर बाद के राजाओं के लोकतांत्रिक व्यवहारों की चर्चा की जा सकती थी.
लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के बढ़ावा देने के लिए अकबर की ही नजीर क्यों दी गई?
इस सवाल पर पार्वती शर्मा कहती हैं, ‘’ये सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष, विविधता का सम्मान करने वाली और समावेशी बताती है. प्रधानमंत्री या सरकार का कोई भी बड़ा नुमाइंदा इसे ही भारत का अनोखापन बताता है. भारत की विविधता ही इसकी ताक़त है. वो सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं. ये सच भी है कि विविधता में एकता हमारी ख़ासियत है. लेकिन ये बातें सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कही जा रही है. घरेलू राजनीति में बीजेपी की नीतियाँ तो बिल्कुल इसके ख़िलाफ़ जा रही है.’’
पार्वती शर्मा कहती हैं, ‘’अकबर को एक अपवाद की तरह देखा जाता है. इतिहास लेखन और आम लोगों की सोच में भी वो ‘धर्मांध’ मुस्लिम बादशाहों में एक अपवाद की तरह हैं."
उन्होंने कहा- जी-20 सम्मेलन की पत्रिका से भी यही ज़ाहिर होता है कि उन्हें अपवाद की तरह देखा जा रहा है. वरना उनके लिए यहाँ ‘बाकियों से अलग’ या असामान्य शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
पार्वती शर्मा का मानना है कि इस पत्रिका में केवल अकबर के "लोकतंत्र" को बाकियों से अलग बताया गया है. एक तरह से इसे ‘असामान्य’ दिखाने की कोशिश है.
यहाँ ये समझना मुश्किल नहीं है कि कैसे ये अकबर को भारत में सदियों से चले आ रहे लोकतंत्र प्रवाह से ‘अलग’ बता रही है. वो लोकतंत्र जिसका इस पत्रिका में गुणगान हो रहा है.
अकबर का सुलह-ए-कुल का विचार क्या था और कहाँ से आया?
पार्वती शर्मा कहती हैं, ''अकबर ने पचास साल तक शासन किया. उनकी सोच, नीतियाँ और शासन का तरीक़ा धीरे-धीरे समावेशी हो रहा था. उन्हें ये समझ में आने लगा था कि उन्हें हर तबके और हर तरह के लोगों की ज़रूरत है. हिंदुस्तान के साम्राज्य में उन्हें हर धर्म और जातीयता के लोग चाहिए थे. इसलिए सुलह-ए-कुल या धार्मिक सह-अस्तित्व और शांति का विचार सुलह-ए-कुल एक दिन में नहीं पैदा हुआ.''
''इसलिए अकबर ने इबादतखानों से जुड़ी बहसें शुरू कीं, जिसमें हर तरह के धर्म और संप्रदाय के लोगों को बुलाया जाता था. बहस होती थी. शुरू में अकबर के यहाँ ज़्यादातर प्रभावशाली लोग मध्य एशिया के थे. लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने ताक़त का बँटवारा किया.''
बीजेपी नेताओं के मुग़ल विरोधी बयान
जी-20 सम्मेलन की पत्रिका में भले ही अकबर का महिमामंडन किया गया हो लेकिन बीजेपी नेता मुगल बादशाहों पर लगातार हमलावर रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने में मध्य प्रदेश में संत रविदास मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम में कहा,’’ जब हमारी मान्यताओं पर हमला हो रहा था और हमारी पहचान मिटाने के लिए हमारे ऊपर प्रतिबंध लादे जा रहे थे तो संत रविदास डट कर खड़े हो गए थे. और वो जमाना मुगलों के वर्चस्व का था. किसी के आगे हार मार कर समर्पण कर देना सबसे बड़ा पाप है. जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें किसी का सम्मान नहीं मिलता.’’
इसी साल जून में जब महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ था, तो महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के 'औरंगज़ेब की औलाद' वाले बयान पर काफ़ी विवाद हुआ था.
केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने भी एक बार कहा था कि इतिहासकारों ने महाराणा प्रताप के साथ नाइंसाफ़ी की है. उन्होंने कहा था कि अकबर को द ग्रेट कहा जाता है लेकिन महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं कहा जाता है. राजनाथ सिंह ने कहा था कि महाराणा प्रताप राष्ट्रनायक थे.
अकबर के मामले पर एक बार यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अकबर आक्रांता था और असली हीरो महाराणा प्रताप हैं. योगी ने कहा था कि युवा जितनी जल्दी इस सच को स्वीकार कर लेंगे उतनी जल्दी देश को सारी समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा.
योगी आदित्यनाथ ने छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक समारोह की 350वीं जयंती पर भारतीय नौसेना की ओर से शिवाजी के प्रतीक को अपनाने की तारीफ करते हुए कहा था कि भारतीयों का मुगलों से कोई संबंध नहीं हो सकता. इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार ने भारतीय नौसेना के लिए शिवाजी से जुड़ा प्रतीक चुना.
इसी तरह 2020 में योगी आदित्यनाथ ने ताजमहल के नज़दीक बन रहे मुगल म्यूजियम का नाम बदल कर छत्रपति शिवाजी म्यूजियम करने का आदेश दिया था. उस समय उन्हें कहा था,’’ मुगल हमारे नायक कैसे हो सकते हैं. शिवाजी का नाम लोगों में राष्ट्रवाद और आत्मविश्वास का संचार करेगा नए उत्तर प्रदेश में मानसिक गुलामी की कोई जगह नहीं है.
2017 में यूपी के बीजेपी विधायक संगीत सोम ने अकबर और औरंगजेब को ‘गद्दार’ करार दिया था और कहा था कि उनका नाम इतिहास की किताबों से मिटा देना चाहिए.
संगीत सोम ने कहा था कि ताजमहल एक ऐसे बादशाह ने बनवाया था, जिसने अपने ही पिता को जेल में डाल दिया था और हिंदुओं को निशाना बनाया था.
संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर धब्बा बताया था, तो एक बार केंद्रीय मंत्री वीके सिंह अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप करने की मांग कर चुके हैं.
इससे पहले औरंगज़ेब रोड का नाम अब्दुल कलाम रोड किया जा चुका है.
बीजेपी नेता शायना एनसी ने तो एक बार मुग़ल शासक अकबर की तुलना हिटलर से की थी
इतिहास की किताबों से मुगलों से जुड़ा पाठ हटाया
इसी साल (2023 ) के अप्रैल महीने में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने क्लास 12वीं की अपनी इतिहास की किताबों से मुग़ल साम्राज्य से जुड़े पाठ को हटा दिया था.
एनसीईआरटी ने 12 वीं क्लास के लिए इतिहास की किताब को 'थीम्स ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री' (भारतीय इतिहास के कुछ विषय) शीर्षक से तीन हिस्सों में प्रकाशित किया है.
इसके दूसरे हिस्से के पाठ 9- ‘ राजा और इतिहास, मुग़ल दरबार को पुस्तक से हटा दिया गया था.
एनसीईआरटी की वेबसाइट पर डाउनलोड करने के लिए इतिहास की जो नई किताबें उपलब्ध हैं उनसे 28 पन्नों का मुग़ल शासकों पर केंद्रित ये अध्याय ग़ायब हैं.
एनसीईआरटी की भारत के पूर्व मुसलमान शासकों को पाठ्यक्रम से हटाने के इस क़दम को भारतीय इतिहास से मुग़लों को हटाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
वहीं एनसीईआरटी का तर्क है कि ऐसा छात्रों पर पाठ्यक्रम के बोझ को कम करने के लिए किया गया है.
इतिहास की किताब में किए गए बदलाव का बचाव करते हुए मीडिया से बातचीत में एनसीईआरटी के उस समय के प्रमुख दिनेश सकलानी ने कहा था, "मुग़लों के इतिहास को हटाया नहीं गया है बल्कि छात्रों से पाठ्यक्रम के बोझ करके कुछ हिस्सों को कम किया गया है."
एनसीईआरटी की वेबसाइट पर डाउनलोड करने के लिए इतिहास की जो नई किताबें उपलब्ध हैं उनसे 28 पन्नों का मुग़ल शासकों पर केंद्रित ये अध्याय ग़ायब हैं.
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