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अरविंद केजरीवाल क्या जेल में रहते हुए भी सरकार चला सकते हैं, क्या कहता है क़ानून?
- Author, गुरजोत सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
(ये स्टोरी पहली बार 28 मार्च को प्रकाशित हुई थी. लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तिहाड़ जेल भेजे जाने के बाद हम इस कहानी को अपडेट करके दोबारा प्रकाशित कर रहे हैं.)
दिल्ली सरकार की शराब नीति में कथित घोटाले के मामले में गिरफ़्तार सीएम अरविंद केजरीवाल को कोर्ट ने 15 अप्रैल तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.
दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने ये आदेश दिया है. इससे पहले अरविंद केजरीवाल ईडी की हिरासत में थे.
ईडी का कहना था कि शराब नीति से जुड़े कथित घोटाले के बारे में पूछताछ के वक़्त मुख्यमंत्री का रवैया सहयोग वाला नहीं था.
ईडी के वकील एसवी राजू ने कहा कि केजरीवाल पूछताछ के दौरान सहयोग नहीं कर रहे थे. उन्होंने अपने फ़ोन के पासवर्ड नहीं दिए थे.
आज राउज एवेन्यू कोर्ट आते समय अरविंद केजरीवाल ने कहा,'' पीएम मोदी जो कर रहे हैं वो देश के लिए ठीक नहीं है.''
पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पद से हटाए जाने की मांग को लेकर दायर की गई याचिका खारिज कर दी थी.
दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका कानूनी हलकों में उठ रहे उस सवाल को रेखांकित करती है कि क्या कोई पदासीन मुख्यमंत्री गिरफ़्तार होने के बाद भी सरकार का कामकाज संभाल सकता है या नहीं?
हालांकि दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ये साफ़ कर चुके हैं कि अरविंद केजरीवाल को ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जाएगी.
इस सवाल की वजह भी है. ईडी की हिरासत के दौरान ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो आधिकारिक निर्देश जारी किए थे.
अरविंद केजरीवाल पर आरोप
अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 21 मार्च को ग़िरफ़्तार किया था.
अरविंद केजरीवाल की ग़िरफ़्तारी के बाद दिल्ली सरकार में मंत्री आतिशी ने कहा कि वो दिल्ली के मुख्यमंत्री बने रहेंगे.
वहीं, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 24 मार्च को कहा था कि अगर केजरीवाल को जेल भेजा गया तो वो अदालत से जेल में कार्यालय बनाने की अनुमति मांगेंगे ताकि वह जेल से सरकार चला सकें.
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी लगातार मांग कर रही है कि आरोपों के कारण अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.
दिल्ली आबकारी नीति में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामले में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर इस नीति की आड़ में कुछ शराब व्यापारियों को लाभ पहुंचाने का आरोप है और ईडी की चार्जशीट के मुताबिक़ वो 'इस घोटाले के मुख्य साज़िशकर्ता' हैं.
क्या थे केजरीवाल के दो निर्देश?
आम आदमी पार्टी कहती रही है कि उनके नेताओं पर दर्ज मुकदमों का कोई आधार नहीं है. पिछले साल दिसंबर में आम आदमी पार्टी ने 'मैं भी केजरीवाल' नाम से एक हस्ताक्षर अभियान चलाया था.
जिसमें सवाल पूछा गया था कि क्या केजरीवाल को ग़िरफ़्तारी होने की सूरत में इस्तीफा दे देना चाहिए या जेल से सरकार चलानी चाहिए?
दिल्ली के कैबिनेट मंत्री मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन को भी ईडी ने ग़िरफ़्तार किया था. दोनों पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं. दोनों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
ईडी की हिरासत में अपने पहले निर्देश में अरविंद केजरीवाल ने पानी की कमी के कारण लोगों को हो रही समस्याओं के समाधान के लिए जल संसाधन मंत्रालय मंत्री आतिशी को पत्र लिखा.
आतिशी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि केजरीवाल ने अपने निर्देश में कहा, ''मुझे पता चला है कि लोगों को पानी और सीवेज से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, मैं इसे लेकर चिंतित हूं और मेरे जेल में रहते हुए लोगों को इन समस्याओं का सामना नहीं करना चाहिए."
अपने निर्देश में उन्होंने आवश्यक स्थानों पर पानी के टैंकर भेजने को कहा.
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा था कि अरविंद केजरीवाल ने ईडी की हिरासत से राष्ट्रीय राजधानी में लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर एक आदेश जारी किया है.
भारद्वाज के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने लिखा कि लोगों को मोहल्ला क्लीनिक में जांच कराने में दिक्कत आ रही है, इसका समाधान किया जाना चाहिए.
क्या कोई मुख्यमंत्री जेल से ही सरकार चला सकता है? बीबीसी ने इस बारे में क़ानूनी विशेषज्ञों से बात की.
क़ानूनी बाधाएँ क्या हैं?
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अरविंद केजरीवाल के जेल से सरकार चलाने के क़ानूनी पहलुओं पर बीबीसी से बात की.
वो कहते हैं कि, "अरविंद केजरीवाल को जेल से अपना काम जारी रखने में कोई क़ानूनी बाधा नहीं है."
"हिरासत में व्यक्ति को पद से नहीं हटाया जा सकता लेकिन एक बार अपराध सिद्ध हो जाने पर वो किसी संवैधानिक पद पर बने रहने के लिए अयोग्य घोषित हो जाता है."
हालांकि क़ानून के कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि क़ानून भले ही इस मुद्दे पर ख़ामोश हो लेकिन देश में जेल से सरकार चलाए जाने का कोई पूर्व उदाहरण नहीं और ये मामला नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है.
अतीत में जब भी किसी निर्वाचित सरकार के सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री की गिरफ़्तारी की स्थिति पैदा हुई है, उन्होंने इस्तीफा दिया है. इस सिलसिले में सबसे ताज़ा उदाहरण झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का है.
बीजेपी के नेताओं ने भी यही मुद्दा उठाया है. पार्टी नेता मनोज तिवारी कहते हैं, "सरकार कभी जेल से नहीं चलती. जेल से गैंग चला सकते हो, सरकार नहीं. सरकार तो भारत के संविधान के तहत, एक नियम के तहत चलती है."
नई दिल्ली से बीजेपी उम्मीदवार बांसुरी स्वराज कहती है, "जेल से सरकार चलाने में दिल्ली की जनता का अहित हो रहा है. केजरीवाल जी तो देश के सभी नेताओं को नसीहत देते थे, आपकी आत्मा क्यों सो रही है. आपको नैतिकता पर इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."
क्या केजरीवाल को जेल से सरकार चलाने की सुविधाएं मिल सकती हैं?
इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पहले भी संजय चंद्रा और अजय चंद्रा के मामले के साथ-साथ सुब्रतो रॉय के मामले में भी उन्हें बैठकें करने, वीडियो कॉन्फ्रेंस और अन्य सुविधाएं प्रदान की गईं हैं.
उनका कहना है कि मनीष सिसोदिया को दिल्ली कोर्ट ने भी अपने क्षेत्र के लिए विधायक निधि जारी करने की इजाज़त दी थी.
अरविंद केजरीवाल की क़ानूनी स्थिति के बारे में गोपाल का कहना है कि केजरीवाल की रिमांड और ग़िरफ़्तारी को क़ानूनी चुनौती के मामले लंबित हैं, ऐसे में अरविंद केजरीवाल को जेल से सरकार चलाने में कोई कानूनी बाधा नहीं है.
जेल में रहते हुए केजरीवाल द्वारा जारी निर्देशों के बारे में उनका कहना है कि केजरीवाल को ऐसा करने का अधिकार है.
वो आगे कहते हैं कि यह स्थिति तब बदल सकती है जब उनके पास एक ऐसा महत्वपूर्ण मंत्रालय हो जिसका कामकाज वो जेल में रहते हुए नहीं कर सकते.
उपराज्यपाल क्या कर सकते हैं?
दिल्ली के उप-राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने टाइम्स नाउ समिट में कहा है कि जेल से दिल्ली की सरकार नहीं चलने दी जाएगी.
टाइम्स नाउ की समिट में भी उप-राज्यपाल से यही सवाल पूछा गया कि सरकार क्या जेल से चलाई जाएगी.
इस पर उप-राज्यपाल विनय सक्सेना ने कहा, "मैं दिल्ली की जनता को आश्वस्त कर सकता हूं कि सरकार जेल से नहीं चलेगी."
हालांकि इस बारे में गोपाल कहते हैं कि, "इस मामले में उपराज्यपाल के पास भी बहुत सीमित शक्तियां हैं."
"ऐसी परिस्थितियों में उपराज्यपाल के पास एकमात्र शक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 239 एबी के तहत मिली है. लेकिन इस धारा के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब कोई संवैधानिक संकट पैदा हो गया हो."
'सिसोदिया और जैन की तरह केजरीवाल के इस्तीफे के भी पड़ सकते हैं और दुष्परिणाम'
प्रमुख कानूनी विशेषज्ञ प्रोफेसर जी मोहन गोपाल कहते हैं, "ये तर्क बहुत ख़तरनाक है कि किसी को हिरासत में लेने मात्र से ही उसे पद से हटा देना चाहिए."
उनका कहना है कि ऐसे कई उदाहरण हैं जब निवर्तमान मंत्री ग़िरफ़्तार होने के बाद भी पद पर बने रहते हैं और ऐसे भी उदाहरण हैं जब उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा दे दिया है.
''किसी मामले में आरोप साबित हो जाना एक अलग बात है लेकिन लेकिन इस तरह किसी पर आरोप लगाने मात्र से ही सरकार के रोजमर्रा के कामकाज पर विपरीत असर नहीं पड़ना चाहिए."
उनका कहना है कि केजरीवाल जेल से बिलकुल सरकार चला सकते हैं, हलांकि इस संबंध में कुछ शर्तें लगाई जा सकती हैं ताकि कोर्ट में चल रहे केस को कोई नुकसान न हो.
आम आदमी पार्टी के दो मंत्रियों के इस्तीफ़े के बारे में उनका कहना है, "मनीष सिसौदिया और सत्येन्द्र जैन का इस्तीफ़ा उनका अपना फैसला था ताकि सरकार बिना किसी रुकावट के चल सके, लेकिन मुख्यमंत्री सरकार का मुखिया होता है. इस वजह से शायद पार्टी ने ऐसा निर्णय लियाऔर इसके प्रभाव अलग हो सकते हैं."
नई आबकारी नीति मामले में अब तक क्या हुआ?
दिल्ली में कथित शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जेल में हैं.
दिल्ली की उत्पाद शुल्क नीति में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान सीबीआई ने 26 फरवरी 2023 को मनीष सिसोदिया को ग़िरफ़्तार कर लिया था.
मनीष सिसौदिया के नेतृत्व में नवंबर 2021 में दिल्ली में नई एक्साइज पॉलिसी लाई गई थी.
हालाँकि, अगस्त 2022 में दिल्ली सरकार ने इस नई शराब नीति को रद्द कर दिया.
आरोप हैं कि इस नीति को लागू करने में बड़ा घोटाला हुआ है.
इस नई नीति के तहत दिल्ली सरकार की राज्य में शराब के कारोबार में हिस्सेदारी ख़त्म करनी थी और शराब का कारोबार निजी कंपनियों के हाथों में आना था.
जब नई नीति पेश की गई थी, तो सरकार ने दावा किया था कि इसका उद्देश्य राजस्व बढ़ाना, शराब की कालाबाजारी पर अंकुश लगाना, बिक्री लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाना और शराब खरीदने के अनुभव में सुधार करना है.
इस नई नीति के तहत शराब की होम डिलीवरी जैसे नए उपाय भी शामिल किए गए. इतना ही नहीं, शराब विक्रेताओं को शराब की कीमत पर छूट देने की भी इजाज़त दी गई.
जुलाई 2022 में, दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव नरेश कुमार ने उपराज्यपाल को भेजी एक रिपोर्ट में दावा किया कि इस शराब नीति में कई अनियमितताएं हैं और आरोप लगाया कि मनीष सिसोदिया ने विक्रेताओं को लाइसेंस देने के बदले रिश्वत ली थी.
इस रिपोर्ट के आधार पर उपराज्यपाल ने मामले की जांच सीबीआई से कराने का अनुरोध किया और दिल्ली सरकार को नई शराब नीति वापस लेनी पड़ी.
सीबीआई ने अगस्त 2022 में मनीष सिसौदिया समेत 15 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय अलग से जांच कर रहा है. इस जांच के दौरान ईडी ने कई लोगों को गिरफ्तार भी किया है.
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