बांग्लादेश: बीएनपी की वापसी का भारत के साथ संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

शुक्रवार 13 फ़रवरी को मतगणना पूरी होने के बाद यह साफ़ हो गया कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) बांग्लादेश में अगली सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है.

पार्टी ने इस ऐतिहासिक चुनाव में संसद की दो-तिहाई से ज़्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है.

बीएनपी के नेता तारिक़ रहमान, पिछले 17 वर्षों से लंदन में स्वैच्छिक निर्वासन में थे और हाल ही में बांग्लादेश लौटे हैं. उनका देश का अगला प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है.

इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी दूसरे स्थान पर रही. इसके साथ ही बांग्लादेशी मतदाताओं ने आम चुनाव के साथ कराए गए जनमत संग्रह में व्यापक संवैधानिक सुधारों को भी मंज़ूरी दी है.

साल 2024 में हुए छात्र प्रदर्शनों के बाद बांग्लादेश का ये पहला चुनाव है.

उन प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को पद छोड़ना पड़ा था और उन्होंने भारत में शरण ली थी.

हसीना को शरण दिए जाने को लेकर भारत और बांग्लादेश के संबंधों में पिछले कुछ महीनों से तनाव बना हुआ है. लेकिन तनाव और तल्ख़ी की कई वजहें और भी हैं.

क़रीब दो दशक बाद बीएनपी के सत्ता में लौटने को बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है.

साथ ही ये भी माना जा रहा है कि इस बदलाव का सीधा असर भारत–बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकता है.

चुनाव नतीजों पर भारत की प्रतिक्रिया

शुक्रवार सुबह जब चुनाव नतीजे आ ही रहे थे तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क़रीब नौ बजे एक सोशल मीडिया पोस्ट में तारिक़ रहमान को बधाई दी.

मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, "मैं श्री तारिक़ रहमान को बांग्लादेश में हुए संसदीय चुनावों में बीएनपी को शानदार और निर्णायक जीत दिलाने के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ. यह जीत दिखाती है कि बांग्लादेश की जनता को आपके नेतृत्व पर भरोसा है."

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, "भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सबको साथ लेकर चलने वाले बांग्लादेश का समर्थन करता रहेगा. मैं हमारे बहुआयामी संबंधों को और मज़बूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ काम करने की उम्मीद करता हूँ."

इस संदेश के क़रीब साढ़े छह घंटे बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक और पोस्ट में बताया कि उन्होंने बीएनपी नेता तारिक़ रहमान से बात की.

उन्होंने लिखा, "श्री तारिक़ रहमान से बात करके मुझे बहुत खुशी हुई. मैंने उन्हें बांग्लादेश चुनावों में मिली बड़ी जीत पर बधाई दी. मैंने बांग्लादेश के लोगों की उम्मीदों को पूरा करने के उनके प्रयासों के लिए अपनी शुभकामनाएँ और समर्थन भी दिया. दो क़रीबी पड़ोसी देशों के रूप में, जिनके बीच गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं, मैंने शांति, तरक़्क़ी और दोनों देशों की खुशहाली के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई."

पिछली बीएनपी सरकारों के भारत से कैसे संबंध थे?

अतीत पर नज़र डालें तो भारत बांग्लादेश संबंधों में बीएनपी के शासनकाल को अक़्सर तनाव और अविश्वास की नज़र से देखा गया है.

ख़ालिदा ज़िया के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार के पहले कार्यकाल (1991–96) में दोनों देशों के बीच कई अहम मसलों पर टकराव दिखाई दिया. ख़ासकर सीमा से जुड़े मुद्दों, जल बंटवारे और व्यापार असंतुलन के मुद्दों पर. इन सभी मसलों की वजह से दोनों देशों के बीच रिश्ते सहज नहीं रह पाए.

साल 2001 से 2006 तक बीएनपी जमात गठबंधन की सरकार के वक़्त बांग्लादेश और भारत के द्विपक्षीय संबंधों को सबसे निचले स्तर पर माना जाता है.

इस दौरान भारत ने बीएनपी सरकार पर पूर्वोत्तर के उग्रवादी समूहों को शरण देने और सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए. सीमा विवाद, तस्करी और सीमा पर होने वाली नागरिक मौतों जैसे मुद्दों ने भी दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ाया.

इसी दौर में बांग्लादेश पर पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा जिससे द्विपक्षीय समीकरण और जटिल हो गए.

कुल मिलाकर बीएनपी के शासनकाल को भारत बांग्लादेश संबंधों के लिए चुनौतीपूर्ण समय माना जाता है जहाँ सहयोग की तुलना में संदेह और तनाव ज्यादा दिखा.

दोनों देशों में अब किन मुद्दों पर रही है तल्ख़ी

जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन और सत्ता परिवर्तन के बाद भारत–बांग्लादेश संबंधों में उल्लेखनीय तनाव देखने को मिला.

इस राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान शेख़ हसीना के देश छोड़कर भारत आ जाने ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया.

ढाका की नई सत्ता संरचना हसीना पर राजनीतिक अपराधों के आरोप लगाकर उनके प्रत्यर्पण की मांग करती रही जबकि भारत ने इसे 'राजनीतिक प्रकृति' का मामला बताते हुए ठुकरा दिया.

इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश के अंदर बढ़ती विरोध लहर भारत को एक बाहरी हस्तक्षेपकर्ता के रूप में पेश करती दिखी.

भारतीय उच्चायोग की ओर बढ़ते विरोध मार्च और कुछ बांग्लादेशी नेताओं के विवादास्पद बयान भी दिखे. इनमें भारत के पूर्वोत्तर को अस्थिर करने की धमकी तक शामिल थी. इसने हालात को और पेचीदा बनाया.

राजनीति के इस नए समीकरण में दोनों देशों के बीच पुराने भरोसे की बुनियाद कमजोर पड़ती दिखाई दी.

शेख़ हसीना के पतन के बाद बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में उभरते नए शक्ति-संतुलन ने भी भारत के साथ रिश्तों को तनावपूर्ण बनाया.

हत्या, दंगों और अल्पसंख्यकों पर हमलों जैसे घटनाक्रमों ने भारत में चिंता बढ़ाई, ख़ासकर तब जब हिंदू नागरिकों पर हिंसा की खबरें उभरने लगीं जिनके ख़िलाफ़ भारत में कई शहरों में प्रदर्शन हुए.

बांग्लादेश सरकार का कहना था कि आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा था जबकि भारत ऐसे मामलों को सुरक्षा और मानवाधिकार से जुड़ा मुद्दा मानता रहा.

बांग्लादेश और भारत के रिश्ते हाल के महीनों में कई वजहों से बिगड़ने लगे.

सिर्फ़ दोनों देशों की अंदरूनी राजनीति ही नहीं बल्कि बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थितियों ने भी तनाव बढ़ाया.

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से फिर नज़दीकी बढ़ाई जिससे भारत की रणनीति को नई चुनौतियाँ मिलीं.

भारत ने अपने बजट में बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक मदद कम कर दी.

ढाका ने इसे भारत की दबाव बनाने वाली नीति के रूप में देखा.

इधर भारत सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और चरमपंथी गतिविधियों को लेकर ज़्यादा चिंतित हो गया. क्योंकि नए राजनीतिक माहौल में ऐसे समूह मज़बूत होते दिख रहे थे जो भारत के ख़िलाफ़ रुख़ रखते हैं.

हाल के संघर्ष, हत्याएँ और बढ़ते अविश्वास से साफ़ हो गया कि दोनों देशों के रिश्ते अब सिर्फ घरेलू राजनीति से नहीं बल्कि बदलते क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन से भी प्रभावित हो रहे हैं.

इन्हीं सब वजहों से साल 2024 के बाद का समय भारत–बांग्लादेश संबंधों के लिए सबसे मुश्किल दौरों में से एक बन गया.

अब भारत पर क्या असर होगा?

प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि मौजूदा हालात को देखते हुए और पिछले डेढ़ साल में भारत–बांग्लादेश संबंधों में आई गिरावट के संदर्भ में यह एक ऐसा नतीजा है जिससे भारत को राहत मिलनी चाहिए. बांग्लादेश की एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी ने जीत हासिल की है और वह भी निर्णायक रूप से. इस मायने में मुझे लगता है कि बांग्लादेश में इस्लामीकरण की ताक़तें भी कुछ हद तक अप्रभावी हुई हैं. और यह आने वाले सालों के लिए अच्छा संकेत है ख़ासकर हाल के समय में भारत–बांग्लादेश संबंधों में जो गिरावट आई थी उसे स्थिर करने के लिहाज़ से."

अपनी बात जारी रखते हुए प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "मुद्दा यह होगा कि बीएनपी भारत की चिंताओं और अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाएगी? और क्या भारत को बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में निशाना बनाया जाता रहेगा, जैसा पहले होता रहा है, जब इस्लामवादी शक्तियाँ और राजनीतिक दल इस विचार के इर्द-गिर्द एकजुट हो जाते थे कि भारत ही बांग्लादेश की मुख्य समस्या है. इसलिए मुझे लगता है कि अगर बीएनपी पिछली नाराज़गियों से आगे बढ़ सके और अगर वह भारत के साथ संबंधों के प्रति एक आगे की सोच वाला दृष्टिकोण विकसित कर सके तो यह एक बहुत ज़रूरी "रीसेट" की शुरुआत हो सकती है."

प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं ख़ासकर उन भू-राजनीतिक बदलावों के संदर्भ में जो आज दुनिया में देखे जा रहे हैं.

वे कहते हैं, "दक्षिण एशिया के लिए यह अहम है कि भारत और बांग्लादेश मिलकर उन कई पहलों पर आगे बढ़ें जो शेख़ हसीना के हटने के बाद अटक गई थीं. मुझे लगता है कि भारत नई सरकार से आने वाले संकेतों को ध्यान से देखेगा और यह उम्मीद करेगा कि यह दिल्ली–ढाका संबंधों के एक नए चरण की शुरुआत हो. शेख़ हसीना के प्रधानमंत्री कार्यकाल में जो व्यावहारिक सहयोग शुरू हुआ था वह दोनों देशों के लिए फ़ायदेमंद था. और ऐसी कोई वजह नहीं कि ढाका की कोई भी सरकार, यहाँ तक कि बीएनपी सरकार भी उन पहलों से पीछे हटे."

पंत के मुताबिक़ व्यापार, कनेक्टिविटी, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय सहयोग- ये वे मुद्दे हैं जिन पर दोनों देशों के बीच समानता है जिसे और मज़बूत किए जाने की ज़रूरत है. और अगर बीएनपी सरकार एक ज़्यादा व्यावहारिक और आगे की सोच वाली नीति अपनाती है, तो निश्चित रूप से यह उस ज़रूरी रीसेट की शुरुआत हो सकती है."

श्रीराधा दत्ता ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों की प्रोफ़ेसर हैं.

वे कहती हैं कि भले ही भारत के लिए ये चुनाव उतने समावेशी न रहे हों लेकिन इससे ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि बाक़ी दुनिया ने इन चुनावों को स्वीकार किया है.

वे कहती हैं, "सब मानते हैं कि यह चुनाव बहुत अच्छे से संपन्न हुए. बिल्कुल स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण. इसलिए यह एक अच्छा चुनाव था और भारत को इसके नतीजों को स्वीकार करना चाहिए."

प्रोफ़ेसर दत्ता के मुताबिक़ अब अगला कदम यह है कि दोनों पक्ष किस तरह आगे मिलकर काम करते हैं.

वे कहती हैं, "यह दोबारा से शुरुआत करने का समय है.रीबूट का, रिफ्रेश का, रीसेट का. चुनाव हो गए, अब भावनात्मक अतीत और ऐतिहासिक बोझ को पीछे छोड़ देना चाहिए. दोनों देशों को एक साथ मिलकर काम करने पर सहमत होना चाहिए ताकि दोनों तरफ के लोग इस रिश्ते से लाभ उठा सकें."

वे कहती हैं, "ये साज़िश वाली थ्योरियाँ, एक-दूसरे के ख़िलाफ़ काम करना, सुरक्षा हितों का डर.अब इन बातों का असर नहीं होता. लोग इन खेलों को समझ चुके हैं.''

''और साल 2001 में बीएनपी का अनुभव बिल्कुल साफ़ कर देता है कि जनता इस तरह की राजनीति नहीं चाहती, क्योंकि अगली बार उन्हें बहुत बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था."

प्रोफ़ेसर दत्ता कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि बीएनपी अपनी बातों पर कायम रहेगी.

वो कहती हैं, "उन्होंने भारत के प्रति सकारात्मक बातें कही हैं. वे बातचीत करना चाहते हैं, काम करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भी यही किया है. मेरी यही उम्मीद है कि यह सिर्फ़ बयानबाज़ी न हो. बल्कि दोनों तरफ वाक़ई में साथ मिलकर आगे बढ़ने की नीयत और इच्छा हो. मुझे उम्मीद है कि चीजें बदलेंगी और हम अतीत की छाया से बाहर निकल पाएंगे."

क्या शेख़ हसीना को लेकर तनाव जारी होगा?

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण (एक्सट्राडिशन) का मुद्दा दोनों देशों के बीच बातचीत का हिस्सा बना रहेगा.

वे कहते है, "लेकिन इसका असर इस पर निर्भर करेगा कि नई सरकार भारत के साथ अपने रिश्ते को किस तरह परिभाषित करना चाहती है. अगर यह सरकार इस एक मुद्दे को एजेंडे पर हावी होने दे देती है. जैसा कि कुछ हद तक यूनुस सरकार ने करने की कोशिश की तो फिर मेरे विचार से दोनों देशों के संबंधों में अस्थिरता देखने को मिल सकती है. लेकिन अगर यह सरकार इसे केवल एक मुद्दे के रूप में लेती है यानी इस पर बात जारी रखती है, भारत के साथ बातचीत और मोलभाव करती है, जबकि बाक़ी पहलुओं पर बात को आगे बढ़ने देती है तो संबंधों के भविष्य को लेकर आशावाद की गुंजाइश बनी रहेगी."

पंत के मुताबिक़ यह मुद्दा महत्वपूर्ण तो रहेगा लेकिन बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि नई सरकार का रवैया क्या होता है और भारत किस तरह उन चिंताओं को दूर कर पाता है जो ढाका की नई सरकार के मन में हो सकती हैं.

प्रोफ़ेसर श्रीराधा दत्ता कहती हैं, "सरकारी स्तर पर तो वे (बांग्लादेश) निश्चित रूप से प्रत्यर्पण की माँग करेंगे. लेकिन मेरा मानना है कि बीएनपी भी यह समझती है कि इसकी सीमाएँ हैं और कई कारण हैं जिनकी वजह से शेख़ हसीना को बांग्लादेश को सौंपना भारत के लिए मुश्क़िल है."

प्रोफ़ेसर दत्ता के मुताबिक़ शेख़ हसीना से ज़्यादा पेचीदा मुद्दा अवामी लीग का है और ये भी कि वो बांग्लादेश में दोबारा कैसे अपनी स्थिति मज़बूत करेगी.

वे कहती है, "अवामी लीग बांग्लादेश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी है इसलिए इसे राजनीतिक परिदृश्य से पूरी तरह बाहर रखना मुश्किल है. लेकिन ज़िम्मेदारी पूरी तरह अवामी लीग नेतृत्व पर ही है. क्या शेख़ हसीना कोई पश्चाताप व्यक्त करती हैं, क्या वे पद छोड़ती हैं और अवामी लीग एक नए रूप, नए अवतार में उभरती है ? ये एक कठिन प्रक्रिया होगी क्योंकि अवामी लीग के हज़ारों सदस्य भारत में और अन्य जगहों पर मौजूद हैं. उनके सामने अपना भविष्य है. उनके क़ारोबार ठप पड़े हैं, उनके परिवार बिखर गए हैं. तो यह उनके लिए आसान नहीं रहा है. और वे कब तक शेख़ हसीना का इंतज़ार करते रहेंगे?"

अपनी बात जारी रखते हुए प्रोफ़ेसर दत्ता कहती हैं, "मेरा मानना है कि चुनाव और उसमें हुआ मतदान प्रतिशत यह दर्शाता है कि लोग अवामी लीग के बिना भी वोट देने को तैयार हैं. यह एक बहुत स्पष्ट संदेश है. इसलिए अवामी लीग को अपनी नीतियों और रणनीतियों पर दोबारा गंभीरता से विचार करना होगा. और मेरा मानना है कि भारत को भी किसी न किसी रूप में उस प्रक्रिया का हिस्सा होना ही पड़ेगा."

'बांग्लादेश फर्स्ट' के भारत के लिए क्या मायने?

चुनाव अभियान में बीएनपी ने लगातार 'बांग्लादेश फर्स्ट' की बात की जिसका मतलब ये है कि सत्ता में आने पर वो बांग्लादेश के हितों को सबसे पहले देखेगी.

अब चूंकि बीएनपी की सरकार बनना तय है तो 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति के भारत के लिए क्या मायने हैं?

वीना सीकरी बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रही हैं.

वे कहती हैं, "देखिए उन्होंने 'बांग्लादेश फर्स्ट' ज़रूर कहा है लेकिन मुझे लगता है कि अगर वो वाक़ई इसके बारे में गंभीर हैं तो वो भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहेंगे. वह भारत के साथ मज़बूत आर्थिक सहयोग चाहेंगे नहीं तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बहाल नहीं किया जा सकता."

वीना सीकरी के मुताबिक़ शेख़ हसीना के वक़्त में भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग ऐसी ऊंचाइयों पर पहुंचा था जिसमें बांग्लादेश को 6.5 से सात फ़ीसदी का विकास दर मिल रहा था लेकिन 18 महीनों में जमात ने भारत विरोधी भावना थोप दी और उन्होंने भारत के साथ कुछ भी आगे बात बढ़ने नहीं दी और नकारात्मक कार्रवाई की और भारत के साथ सहयोग के ढांचे को ख़त्म कर दिया.

वो कहती हैं, "इसका नतीजा ये हुआ कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था संकट में डूब गई. उनकी विकास दर 6-7 फ़ीसदी से 2-3 फ़ीसदी हो गई. महंगाई और बेरोज़गारी बढ़ गई. और लोग ये सब देख रहे थे."

अपनी बात को जारी रखते हुए वे कहती हैं, "तो इसलिए मैं समझती हूँ कि जो जीत हुई है बीएनपी की इसमें बांग्लादेश की अवाम को मुबारक़बाद देनी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपना मन पूरी तरह से कट्टरता के ख़िलाफ़ दिखाया है. बांग्लादेश की जनता धार्मिक है लेकिन कट्टरपंथी नहीं है. उन्होंने अपना रुख़ कट्टरता के ख़िलाफ़ दिखाया है और कहा है कि वो कट्टरपंथी इस्लाम को नहीं क़ुबूल करेंगे. इन चुनावों से यही ज़रूरी संदेश मिला है. और ये भारत के लिए ज़रूरी है."

वीना सीकरी कहती हैं, "हम भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग को फिर से जीवित करने और जो अच्छा संबंध रहा है उसे बहाल करने की उम्मीद कर रहे हैं. ताकि बांग्लादेश के लोगों को उसका फ़ायदा मिल सके. और मेरा मानना है कि अर्थव्यवस्था तारिक़ रहमान के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होगी. आप भारत और बांग्लादेश के रिश्ते में एक बड़ी बहाली देखेंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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