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पश्चिम बंगाल का यौन हिंसा के ख़िलाफ़ अपराजिता बिल कितना कारगर होगा?
- Author, सुशीला सिंह और उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बंगाल के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के मामले के एक महीने के भीतर राज्य सरकार नया विधेयक लेकर आई है.
विधानसभा में सर्वसम्मति से अपराजिता महिला और बाल (पश्चिम बंगाल आपराधिक क़ानून संशोधन) विधेयक, 2024 पारित भी कर दिया गया है.
इस विधेयक में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को लेकर भारतीय न्याय संहिता, 2023, (बीएनएस) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) और बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बने पॉक्सो क़ानून, 2012 में संशोधन किए गए हैं.
राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित क़ानून एक ऐतिहासिक क़ानून है जिससे सर्वाइवर को जल्द न्याय मिलेगा.
हालांकि, क़ानून के जानकारों का कहना है कि ये एक जल्दबाज़ी में लाया गया विधेयक है जिसमें इंसाफ़ होने साथ-साथ अन्याय का भी डर है.
प्रस्तावित क़ानून में क्या-क्या है?
बीएनएस ,बीएनएसएस और पॉक्सो में बदलाव करने के बाद राज्य सरकार के अपराजिता महिला और बाल विधेयक 2024 में ये प्रावधान किए गए हैं:
- चार्जशीट दाख़िल होने के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट में 30 दिन में यौन उत्पीड़न के मामलों का निपटारा हो. बीएनएसएस में यह अवधि 60 दिन की है.
- अपराध की पहली रिपोर्ट दर्ज होने के 21 दिन के भीतर जांच पूरी होनी चाहिए. बीएनएसएस में यह अवधि 60 दिन की है.
- इस तरह का अपराध करने के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड और जुर्माना – साथ ही दोनों के प्रावधान किए गए हैं.
- सर्वाइवर की पहचान सार्वजनिक करने पर सख़्त क़ानून का प्रावधान किया गया है.
- अगर कोई बिना अनुमति के मुकदमे से जुड़ा विवरण या जानकारी सार्वजनिक करता है तो उसको तीन से पांच साल की सज़ा का प्रावधान.
- इससे पहले बलात्कार करने पर दस साल की सज़ा, गैंगरेप मामले में 20 साल की सज़ा का प्रावधान था लेकिन अब इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास की सज़ा कर दिया गया है.
- नाबालिग के साथ बलात्कार मामले में पहले न्यूनतम दस साल की सज़ा थी लेकिन इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया गया.
- बलात्कार और चोट पहुंचाने के मामले में, जिससे महिला की मौत हो जाए या वो वेजिटेटिव अवस्था में चली जाती है तो ऐसी स्थिति में मौत की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है. इससे पहले न्यूनतम 20 साल की सज़ा का प्रावधान था.
- अगर कोई व्यक्ति बार-बार बलात्कार करता है तो ऐसी स्थिति में आजीवन कारावास या मृत्युदंड के साथ जुर्माना शामिल है.
- इन मामलों के लिए स्पेशल टास्क फ़ोर्स बनाने का प्रावधान है और जब संभव हो मुख्य जांच अधिकारी महिला होने की बात कही गई है.
सरकार और विपक्ष की दलील
राज्य सरकार का कहना है कि इस विधेयक को लाने का मकसद पीड़ितों को जल्द से जल्द इंसाफ़ दिलाना है.
वहीं राज्य में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि बीएनएस में बलात्कार और यौन उत्पीड़न को लेकर कड़े प्रावधान किए गए हैं. वहीं बलात्कार के बाद मौत होने के मामले में मौत की सज़ा का भी प्रावधान है.
राज्य सरकार इस विधेयक को जल्दबाज़ी में लेकर आई है और अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश कर रही है
सीपीआई(एम) के सांसद और आरजी कर मामले में मृतका के वकील बिकास रंजन का कहना है कि सरकार के पास विधेयक लाने का अधिकार है लेकिन इसके कोई मायने नहीं हैं.
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, ‘’कोई भी एजेंसी तय समय में जांच पूरी कर के उसका ट्रायल शुरू करे और उसे पूरा भी करे, ये संभव नहीं है."
क़ानून लागू कैसे होगा?
संविधान के अनुसार आपराधिक क़ानून केंद्र और राज्यों दोनों के अंतर्गत आता है और कई राज्य इसमें अपने मुताबिक संशोधन करते रहते हैं.
फ़िलहाल, पश्चिम बंगाल की विधानसभा ने इस क़ानून को पारित कर लिया है.
अब ये विधेयक राज्यपाल के पास से होते हुए राष्ट्रपति तक पहुंचा है.
ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि राज्यपाल की मंज़ूरी के बाद क्या राष्ट्रपति इस विधेयक को हरी झंडी दिखाएंगी.
2019 में आंध्र प्रदेश और 2020 में महाराष्ट्र ने भी ऐसे क़ानून पारित किए थे जिसमें बलात्कार के मामलों में सज़ा को बढ़ाया गया था और ये दोनों क़ानून अभी भी राष्ट्रपति के पास लंबित हैं.
अगर पश्चिम बंगाल के इस क़ानून को राष्ट्रपति से अनुमति मिल जाती है तो राज्य में हो रहे बलात्कार के मामलों पर ये संशोधित क़ानून लागू हो जाएगा.
क़ानून के जानकार क्या कहते हैं?
वहीं क़ानून को समझने वाले जानकारों का कहना है कि ये क़ानून जल्दबाज़ी में लाया गया है तो कुछ का कहना है कि ये व्यावहारिक नहीं है.
कोलकाता हाई कोर्ट में वकील अचिंत्य बनर्जी का कहना है कि ये विधेयक समय की मांग थी और केंद्र सरकार इस विधेयक को एक प्रस्ताव के तौर पर देख सकती है.
वो कहते हैं कि उनकी निजी राय है कि आजीवन कारावास एक अच्छा प्रावधान है.
निर्भया मामले में वकील रह चुकीं सीमा कुशवाहा का कहना है कि ऐसे मामलों में न्याय देने की प्रक्रिया फास्ट ट्रैक पर होनी चाहिए लेकिन जहां तक इस विधेयक की बात है तो ये व्यावहारिक नहीं है.
उनके अनुसार 30 दिन में ट्रायल तभी संभव हो सकता है जब एफ़आईआर जल्द हो और फिर कार्रवाई तेज़ी से हो.
इस विधेयक को लेकर जो बात समझ में आती है कि आजीवन कारावास का मतलब ये होगा कि जब तक उस व्यक्ति की मौत प्राकृतिक तौर पर नहीं हो जाती है वो जेल में बंद रहेगा.
वो उदाहरण देते हुए कहती है कि कई मामलों में कैदी के अच्छे आचरण के कारण राज्य सरकार ऐसे कैदियों को छोड़ने का फ़ैसला ले सकती है लेकिन जो समझ आता है कि उस हिसाब से इस विधेयक में ये प्रावधान नहीं दिया गया है.
वहीं दिल्ली स्थित प्रोजेक्ट 39A में वकील नीतिका विश्वनाथ का कहना है कि अगर जांच और सुनवाई की अवधि छोटी रखी जाती है ये हो सकता है कि पुलिस मामलों को निपटाने में शॉर्टकट अपनाए, इससे अभियुक्त की निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर भी असर पड़ सकता है और निर्दोष को भी सज़ा हो सकती है.
सीमा कुशवाहा कहती हैं कि प्रगतिशील क़ानून होने चाहिए जो किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोके लेकिन मृत्युदंड पर वे आपत्ति जताती हैं.
अचिंत्य बनर्जी का कहना है कि मृत्युदंड का जो प्रावधान किया गया वो इसलिए है ताकि कोई भी व्यक्ति ऐसा कृत्य करने से पहले सज़ा के नाम से ही डर जाए.
हालांकि, इस विचार से कई क़ानून के जानकार सहमत नहीं दिखते हैं.
कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकील और महिलाओं से संबंधित क़ानून की जानकार झूमा सेन कहती हैं, “इस बात का कोई सबूत नहीं हैं कि सज़ा कड़ी करने से महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध कम होते हैं.”
वो कहती हैं, “औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा तबतक ख़त्म नहीं होगी जब तक क़ानूनी प्रक्रियाओं को मज़बूत नहीं किया जाता.’’
नीतिका विश्वनाथ कहती हैं कि कड़ी सज़ा से अपराध नहीं रुकता.
उनके अनुसार, ‘’भारत में बलात्कार में कन्विक्शन या सज़ा की दर काफ़ी कम रही है. इसके कई कारण हैं, जैसे पुलिस जांच ठीक से ना होना और डीएनए का सही से कलेक्शन और इस्तेमाल ना होना.”
झूमा सेन का मानना है कि पश्चिम बंगाल के क़ानून से सज़ा देना और मुश्किल हो जाएगा.
वो अपना तर्क देते हुए कहती हैं, ''इस मामले में कई शोध हुए हैं और वकील भी जानते हैं कि जब मामलों में सज़ा ज़्यादा दी जाती है तो उन मामलों में न्याय सुनाने से पहले सोच विचार ज़्यादा होता है. ऐसे में सज़ा की दर भी कम होती जाती है.’’
नीतिका विश्वनाथ ये भी कहती हैं कि महिलाओं को ऐसे मामले दर्ज कराने में भी दिक्कतें आती हैं और ये बात भी शोध में सामने आई है.
उनका मानना था कि पहले इन सबको मज़बूत करने की ज़रूरत है.
क्या दिक़्क़तें आ सकती हैं?
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मौत की सज़ा अनिवार्य करना ग़ैर-क़ानूनी है.
साथ ही उनका कहना है कि 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मौत की सज़ा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही दी जाती है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है.
साथ ही क़ानून के जानकार मानते हैं कि ऐसे स्पेशल कोर्ट या टास्क फोर्स तब तक सफल नहीं कहे जाएंगे जब तक वे सुचारू रूप से काम न करें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित