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मांजरेकर के कमेंट से क्यों छिड़ी महिला सशक्तिकरण की बहस?
- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
महिलाओं से जुड़े मुद्दे क्या गंभीर नहीं होते? क्या उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए? या ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं होती?
क्या उनसे जुड़ी बातों को टाल देना चाहिए या टरका देना चाहिए?
क्या उनकी बातों को हल्के में लेना चाहिए?
ये सारे सवाल अचानक से एक बार चर्चा में आ गए हैं और इसके केंद्र में क्रिकेट कमेंटेटर संजय मांजरेकर.
इन दिनों चल रही आईपीएल में सोमवार को राजस्थान रॉयल्स और रॉयल चैलेंजर्स बेंगुलरू के बीच हुए मैच में टॉस से पहले की बात है.
क्रिकेट और महिला सशक्तीकरण
राजस्थान रॉयल्स ने ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण से जुड़ा एक अभियान शुरू किया है.
इसके तहत वे महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों के लिए आर्थिक सहायता देंगे. उन्हें प्रोत्साहन देंगे. ग्रामीण इलाके को सूरज की ऊर्जा से रोशन करने के लिए मदद देंगे. इसे उन्होंने ‘पिंक प्रॉमिस’ कहा है.
मैच से पहले उसी कार्यक्रम के तहत एक महिला भँवरी देवी ने दोनों टीम के कप्तानों को सौर ऊर्जा से चलने वाला एक लैम्प और सौर पैनल उपहार में दिया.
क्रिकेट का गंभीर काम
इस वक्त मैदान पर माइक भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी संजय मांजरेकर के हाथ में था. संजय ही बता रहे थे कि क्या हो रहा है. यह कार्यक्रम क्या है. जैसे ही महिलाओं से जुड़ा चंद मिनटों का यह संक्षिप्त सा कार्यक्रम पूरा हुआ संजय मांजरेकर ने कहा कि अब ‘सीरियस बिजनेस’ की तरफ़ वापस लौटते हैं.
‘सीरियस बिजनेस’यानी गंभीर काम. संजय किसे गंभीर बता रहे थे और किसे हल्का-फुल्का काम? संजय जिस गंभीर काम की ओर वापस चलने की बात कर रहे थे, वह एक क्रिकेट मैच था. एक तरह से वे राजस्थान रॉयल्स की महिला सशक्तीकरण की कोशिश को हल्का-फुल्का काम बता रहे थे.
इसे मैदान में मौजूद हज़ारों लोगों ने इसे देखा-सुना. लाखों लोगों ने मैदान के बाहर देखा-सुना. देखने सुनने वालों को संजय मांजरेकर की एक वाक्य की यह टिप्पणी पसंद नहीं आई. उनका जो अंदाज़-ए-बयाँ था, वह पसंद आती भी कैसे?
इसीलिए इसके बाद अनेक लोग सोशल मीडिया पर उनकी काफ़ी आलोचना करने लगे. उनकी बातों से ऐसा लगा कि कहाँ आईपीएल के मैच के बीच में यह सब चीज़ें हो रही हैं. यानी क्रिकेट जैसी अहम चीज़ के बीच में महिलाओं की बातें क्यों हो रही हैं? महिलाओं से जुड़ी बातें कब से गंभीर होने लगीं?
भारी पड़ गया एक शब्द
राजस्थान रॉयल्स की तरफ़ से महिला सशक्तीकरण के लिए की जाने वाली कोशिश सराहनीय क़दम है. मगर जिस तरह से संजय मांजरेकर ने उसे पेश किया और एक जुमला इस्तेमाल किया, वह उस कोशिश की सारी गंभीरता को ख़त्म कर देता है.
एक बेहतर काम का असर कम हो जाता है जब उसकी प्रस्तुति हल्के तरीक़े से की जाती है. संजय मांजरेकर ने यही किया. ऐसा लगा कि यह मैच के बीच एक ग़ैरज़रूरी काम हो रहा था.
अब वह काम ख़त्म हुआ और असली ज़रूरी काम शुरू हुआ. एक शब्द का ग़लत इस्तेमाल किस तरह एक अच्छे काम पर पानी फेर सकता है, इसका यह जीता-जागता नमूना है. बोलने से पहले सोचना कितना ज़रूरी काम है- इस घटना से यह भी पता चलता है.
राजस्थान जैसे राज्य में जहाँ महिलाओं के बीच में काम करने की बेहद ज़रूरत है, वहाँ राजस्थान रॉयल्स या किसी का भी ऐसा कोई कदम काफ़ी अहम है. मगर एक वाक्य ने पूरा ध्यान एक अच्छे काम से हटा दिया. बात कुछ और होनी चाहिए थी तो बहस कुछ और होने लगी.
मर्दों में ऐसी सोच आती कहाँ से है
अगर महिला सशक्तीकरण के लिए किए जाने वाले काम ‘गंभीर’ नहीं हैं, तो क्या चीज़ ‘गंभीर’हैं? आख़िर ऐसी सोच आती कहाँ से है? मर्द बिरादरी में संजय अकेले शख़्स नहीं होंगे जो इस तरह सोचते हैं.
मर्द बिरादरी में अच्छी-ख़ासी संख्या ऐसे लोगों की है जो महिलाओं और महिलाओं से जुड़े किसी काम को गंभीरता से नहीं लेते. हल्के में लेते हैं. महिलाओं का, उनकी बातों का, उनके काम का मज़ाक उड़ाते हैं. पुरुषों को ऐसा लगता है कि गंभीरता से सिर्फ़ उन्हें लिया जाना चाहिए. वे ही गंभीर हो सकते हैं. उनके काम ही महत्वपूर्ण होते हैं.
वैसे, घर या समाज में तो यही बताया और सिखाया जाता है कि महिलाओं और उनसे जुड़ी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए.
मर्दाना सत्ता यानी पितृसत्ता में पुरुष ही सब कुछ है और स्त्रियाँ गौण हैं. कुछ नहीं हैं. वे पुरुषों की सेवा के लिए हैं. उनकी अपनी शख़्सियत नहीं है. आख़िर कौन सी मानसिकता है जो स्त्रियों के बारे में ऐसी राय रखती है?
दिमाग़ का जाला साफ़ करने की ज़रूरत
यह दिलचस्प है कि स्त्रियों के बारे में ऐसी राय रखने वाले हमारे समाज में हैं. वे न सिर्फ़ बेबाकी से अपनी राय रखते हैं बल्कि उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता है कि उनकी बातों में ग़लत क्या है? उन्हें ये बातें सामान्य लगती हैं.
मर्दों को अपने किए हुए काम पर भी ग़ौर करना चाहिए. तब ही उन्हें पता चल सकता है कि गड़बड़ी कहाँ है. इस संसार के अधिकांश काम मर्दों के मन मिजाज से चलते हैं. अधिकांश कामों में उनकी सोच हावी रहती है.
वे सब ‘गंभीर’काम समाज को कहाँ ले जाकर खड़ा करते हैं, यह छिपी बात नहीं है. उनके ही ‘गंभीर कामों’ की वजह से आज हमें महिला सशक्तीकरण के कामों की ज़रूरत पड़ी है. मर्दों को थोड़ा ठहरकर सोचने की ज़रूरत है. तब ही उन्हें यह समझ में आएगा कि ऐसे जुमले ग़ैरज़रूरी ही नहीं बल्कि ग़लत हैं.
मुमकिन है, संजय ने यह बात ग़ैर इरादतन कही हो. मगर यह बात उनकी ज़बान से निकली कैसे? दिमाग़ के किसी कोने में यह बात बैठी होगी, तब ही बाहर आई.
इसलिए मर्दों को अपने दिमाग़ में पड़े जाले को साफ़ करने की ज़रूरत है. तब ही उन्हें ऐसे काम गंभीर और ज़रूरी नज़र आएँगे. तब उनकी ज़बान से ऐसे शब्द बाहर नहीं आएँगे जो ऐसे कामों की अहमियत कम करते हैं.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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