टी20 वर्ल्ड कप में जीत के बाद टीम इंडिया ने 4 घंटे स्टेडियम में ही क्यों बिताए?

    • Author, विमल कुमार
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, ब्रिजटाउन के केसिंग्टन ओवल से

मुंबई इंडियंस की कप्तानी करते हुए रोहित शर्मा ने पांच बार ट्रॉफ़ी जीती है और उन्हें बेहद दबाव वाले लम्हों में हारी बाज़ी पलटने का अनुभव रहा है.

अक्सर असंभव को संभव कराने वाले किरदार ज़्यादातर मौकों पर जसप्रीत बुमराह ही रहे हैं. कुछ मौकों पर हार्दिक पांड्या भी.

शनिवार को केंसिंग्टन ओवल में साउथ अफ़्रीका के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त संघर्ष करने के बावजूद टीम इंडिया आखिरी के पांच ओवर में एक निश्चित हार की तरफ़ बढ़ती दिख रही थी.

आखिरी 30 गेंद में साउथ अफ्रीका को पहली बार वर्ल्ड कप ख़िताब हासिल करने के लिए सिर्फ़ 30 रन की ज़रूरत थी और उनके हाथ में 6 विकेट बचे हुए थे.

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प्रेस बॉक्स में बैठे दर्जन से भी ज़्यादा पत्रकार अपनी रिपोर्ट में टीम इंडिया की हार का विश्लेषण करना शुरू कर चुके थे.

तभी हर किसी को ध्यान में आया कि आखिर रोहित शर्मा ने बुमराह के दो ओवर क्यों बचा कर रखे हैं?

मौके पर बुमराह का इस्तेमाल

बुमराह को रोहित ने 19वें या 20वें ओवर के लिए नहीं बल्कि उनका इस्तेमाल 16वें और 18वें ओवर में कर डाला, क्योंकि 19वें ओवर के लिए उनके पास भरोसेमंद अर्शदीप सिंह थे तो 20वें ओवर में दिलेर हार्दिक पांड्या.

इस तिकड़ी ने मिलकर टीम इंडिया को एकदम हारे से मैच में जीत दिला दी.

सात रनों की इस जीत में कप्तान रोहित शर्मा के अनुभव का योगदान ज़बरदस्त रहा.

लेकिन, गेंदबाज़ों को अगर लड़ने की ताक़त दी तो वो थी विराट कोहली की शानदार अर्धशतकीय पारी.

जिस कोहली के लिए पूरा वर्ल्ड कप किसी बुरे सपने से कम नहीं था उसी कोहली ने अपने करियर की सबसे यादगार पारियों में से एक खेलने के लिए वर्ल्ड कप के फ़ाइनल को चुना.

इत्तेफाक है कि कोहली और रोहित के करियर का ये आख़िरी टी-20 मुकाबला भी साबित हुआ.

अक्षर पटेल की अहम पारी

भारत ने बल्लेबाज़ी करते हुए एक समय महज़ 24 रन के स्कोर पर रोहित, ऋषभ पंत और सूर्यकुमार यादव के विकेट खो दिए थे और वह काफी दबाव में आ चुकी थी.

यहीं से रोहित ने एक और शानादर चाल चलते हुए बाएं हाथ के अक्षर पटेल को कोहली के साथ साझेदारी करने के लिए ऊपर भेज दिया.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अक्षर ने एक छोटी सी पारी खेली थी लेकिन यहां फ़ाइनल में जब तक वो खेले, कोहली जैसे दिग्गज को भी अपनी हिटिंग के सामने साधारण साबित करते दिखे.

पटेल भले ही तीन रनों के चलते अर्धशतक पूरा करने से चूक गए लेकिन निश्चित तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ये उनके करियर की सबसे अहम पारी साबित हुई.

पटेल के अलावा शिवम दुबे ने भी 16 गेंदों पर 27 रन बनाकर भारत को ऐसा स्कोर बनाने में मदद की जहां से वो लड़ाई लड़ने के बारे में गंभीरता से सोच सकते थे.

साउथ अफ्रीका के लिए 177 रनों का स्कोर उस समय पहाड़ जैसा दिखने लगा जब उनके पहले दो विकेट महज़ 20 रनों पर गिर गए.

लेकिन, इसके बाद क्विंटन डि कॉक, ट्रिस्टन स्टब्स और हेनरिक्स क्लासेन ने भारतीय गेंदबाज़ों की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि अधिकांश भारतीय दर्शकों को बैठे-बैठे तारे नज़र आने लगे.

रवींद्र जडेजा, कुलदीप यादव और अक्षर की तिकड़ी

महज़ 9 ओवर की गेंदबाज़ी में रवींद्र जडेजा, कुलदीप यादव और अक्षर की तिकड़ी को 106 रन पड़ चुके थे और ये अफ़्रीकी टीम की निर्ममता और दृढ़ता को दिखाने के लिए काफ़ी था.

क्लासेन तो मानो ऐसे खेल रहे थे जैसे मैच को 17वें-18वें ओवर में ही ख़त्म करना चाहते हों, लेकिन, बुमराह-पांड्या-अर्शदीप की तिकड़ी ने मिलकर 12 ओवर में 57 रन देकर 7 विकेट झटके और दिखाया कि इस पिच पर उनसे ज़्यादा कौशल वाला गेंदबाज़ कोई और नहीं.

बहरहाल, जीत के बाद रोहित शर्मा और उनके साथियों ने अगले 4 घंटे स्टेडियम में ही बिताए.

विराट कोहली ने मुझसे कहा कि 'यादगार लम्हा' है तो रोहित ने कहा कि 'बारबडोस को अलविदा कहने का वक्त आ गया है दोस्त.'

लेकिन, असली भावुक लम्हा उस समय आया जब राहुल द्रविड़ को ज़बरदस्ती हम जैसे कुछ सीनियर पत्रकारों ने गुज़ारिश करके बातचीत के लिए बुलाया.

मैंने द्रविड़ से पूछा कि उनके लिए रोहित क्या मायने रखते हैं?

द्रविड़ का जवाब था, "इंसान के तौर पर उनका जवाब नहीं है. मुझे लगता है कि मेरी दोस्ती उनसे बरक़रार रहेगी. पिछले तीन सालों में जिस तरह से हमने शानदार लम्हें बिताए हैं, उसके लिए मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूं."

पिछले दो सालों में मैंने बेहद नज़दीक से रोहित-राहुल की जोड़ी को मिशन वर्ल्ड कप पर काम करते देखा है, ख़ासतौर पर पिछले साल के कैरेबियाई दौरे पर.

'मैन ऑफ द टूर्नामेंट'

द्रविड़ पूरे करियर में एक खिलाड़ी के तौर पर कभी भी वर्ल्ड कप नहीं जीत पाए. उन्हें उनकी इस टीम ने करियर का शायद सबसे बड़ा तोहफा दिया.

'चक दे इंडिया' की फ़िल्मी कहानी को अगर टीम इंडिया ने हकीक़त में बदल दिया कहें तो शायद यह ग़लत नहीं होगा.

लेकिन इस जीत में हार्दिक पांड्या का भी बड़ा योगदान रहा. मैच के आख़िरी ओवर में 16 रन पांड्या को डिफ़ेंड करने थे और आख़िरी दो गेंदों पर 9 रन.

बेहद मुमकिन था कि दो शॉट में ही मैच का नतीजा बदल सकता था.

लेकिन, पांड्या ने खुद की काबिलियत पर भरोसा बनाए रखा और उसके बाद उनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

मैच के बाद जब मैंने उनसे पूछा कि वो उन आलोचकों को क्या कहना चाहेंगे जो चंद महीने पहले ही आईपीएल के दौरान उनकी धज्जियां उड़ा रहे थे.

पांड्या ने शब्दों से जवाब देने के बावजूद गरिमा का परिचय दिया. जीत किस तरीके से इंसान को विनम्र बनाती है उसकी मिसाल हैं पांड्या.

जसप्रीत बुमराह को 'मैन ऑफ द टूर्नामेंट' चुना गया लेकिन अगर ये ख़िताब अक्षर या हार्दिक को भी मिलता तब भी कोई शिकायत नहीं करता. रोहित भी इसके दावेदार थे.

लेकिन, सही मायनों में 'मैन ऑफ द टूर्नामेंट' इस टीम की आपसी एकता, एकजुटता, भाईचारा और एक बेहद खुशनुमा ड्रेसिंग रूम रहा, जिसे तैयार करने में द्रविड़-रोहित की जोड़ी ने करीब 36 महीने अपना क़ीमती वक़्त दिया.

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