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अंकिता श्रीवास्तव: मां को दिया लिवर फिर बनीं चैंपियन एथलीट, लगाए मेडल के अंबार
समरा फ़ातिमा
बीबीसी उर्दू, लंदन
"जब कभी हम कार में होते थे तो स्पीड ब्रेकर आने पर मेरा लिवर भी ऊपर नीचे होता था. बाईं करवट पर लिवर बाएं और दाईं करवट पर दाएं लुढ़क जाता था क्योंकि जगह बहुत ख़ाली हो गई थी. रात में मुझे केवल सीधा लेट कर सोने की हिदायत दी गई थी."
भोपाल की रहने वाली एथलीट अंकिता श्रीवास्तव ने अपनी अनूठी कहानी बयान करते हुए ये बताया.
अंकिता ने 18 साल की उम्र में अपनी मां को अपने लिवर का 74 प्रतिशत हिस्सा दिया और उसके बाद खेल के मुश्किल मैदान का चुनाव किया और असाधारण सफलता हासिल की.
अंकिता कई स्टार्टअप कंपनियों की मालिक भी हैं. लेकिन यह सब करना इतना आसान नहीं था.
अंकिता उस समय केवल तेरह साल की थीं जब पता चला कि उनकी मां को 'लिवर सिरोसिस' नाम की बीमारी है जिसमें ट्रांसप्लांट ही एक अकेला उपाय रह गया था.
अंकिता के अनुसार उन्हें जब बताया गया कि उनका लिवर उनकी मां से मैच हो गया है तो उन्होंने यह फ़ैसला करने में एक सेकंड भी नहीं लगाया कि वह मां को अपना लिवर देंगी लेकिन उस वक़्त उम्र कम होने की वजह से उनके 18 साल के होने तक इंतज़ार किया गया.
सर्जरी के बाद की दिक्कतें
उम्मीद की जा रही थी कि शायद इस दौरान उन्हें कोई और डोनर मिल जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और 18 साल की होने पर ट्रांसप्लांट के लिए अंकिता की सर्जरी हुई.
अंकिता बताती हैं कि सर्जरी के लिए जिस उत्साह के साथ वो ऑपरेशन थिएटर में दाख़िल हुई थीं, सर्जरी के बाद उनकी हालत उतनी ही ख़राब थी.
उस समय तक लिवर ट्रांसप्लांट के बारे में भारत में अधिक जानकारी नहीं थी, ना ही लोग ये जानते थे कि मरीज़ को ऑपरेशन के बाद की हालत के लिए मानसिक तौर पर किस तरह तैयार करना है.
ट्रांसप्लांट के बाद जब अंकिता को होश आया तो उनके पूरे शरीर से तरह-तरह की छोटी मशीनों के तार लिपटे हुए थे. वह बताती हैं कि उनके हाथ से मॉर्फ़ीन के इंजेक्शन की एक नली जुड़ी हुई थी. जैसे ही उन्हें थोड़ा होश आता तो वो दर्द से कराहने लगतीं, ऐसे में नर्स उस दवा की एक डोज़ रिलीज़ कर देती. कई दिन ऐसे ही चलता रहा.
लिवर का लगभग तीन चौथाई हिस्सा निकल जाने की वजह से पेट के अंदर जो जगह ख़ाली हुई थी उससे उन्हें ज़्यादा हिलने-डुलने में भी तकलीफ़ होती थी.
नहीं बची मां की जान...
अंकिता बताती हैं, "ट्रांसप्लांट के दो से तीन महीने के अंदर ही मेरी मां का देहांत हो गया. एक साथ इतना कुछ हुआ कि मानसिक और शारीरिक तौर पर मेरे लिए यह सब सहना मुश्किल था. मैंने सब कुछ शुरू से सीखा, बैठना कैसे है, खड़े कैसे होना है और चलना कैसे है."
अंकिता के अनुसार उनकी मां की मौत के बाद उनके पिता उनसे और उनकी बहन से अलग हो गए. दोनों बहनें दादा- दादी के साथ रहती थीं और घर का ख़र्च चलाने की ज़िम्मेदारी भी उन पर ही आ गई.
अंकिता ट्रांसप्लांट से पहले स्विमिंग और फ़ुटबॉल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थीं. अंकिता कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह दोबारा खेलों में हिस्सा ले सकेंगी लेकिन सभी मानसिक और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद एक खिलाड़ी होने के जज़्बे ने उन्हें हारने नहीं दिया.
"कामयाबी की कुंजी लगन है"
अंकिता के अनुसार ट्रांसप्लांट पूरा होने पर एहसास हुआ कि ज़िंदगी अचानक कितनी बदल जाती है.
वो कहती हैं, "मुझे ठीक होने में लगभग डेढ़ साल का समय लग गया जिसके बाद मुझे वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के बारे में मालूम हुआ. मैं भारतीय टीम में चुन ली गई."
"फिर इस बात का एहसास हुआ कि किसी स्वस्थ इंसान की तुलना में मेरे लिए वह सब कुछ कितना मुश्किल था लेकिन कामयाबी की कुंजी लगन है. अगर आप लगन से कोई काम करते हैं तो कामयाब हो ही जाते हैं."
अंकिता एक तरफ़ खेलों में वापसी के लिए दोबारा ट्रेनिंग कर रही थीं तो दूसरी तरफ़ नौकरी.
उन्होंने बताया कि वह सुबह कुछ घंटे ट्रेनिंग करके ऑफ़िस चली जातीं और ऑफ़िस से वापस आकर दोबारा ट्रेनिंग करतीं.
ट्रांसप्लांट के बाद अंकिता सन 2019 में ब्रिटेन में हुए वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स और 2023 में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में लॉन्ग जंप और थ्रोबॉल के मुक़ाबलों में तीन गोल्ड और तीन सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं.
खेल और कारोबार
अंकिता आज अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होने के साथ एक मोटिवेशनल स्पीकर और कारोबारी भी हैं.
वह मीडिया और मनोरंजन के उद्योग में स्टार्टअप्स शुरू कर चुकी हैं और भविष्य में और भी बहुत कुछ करना चाहती हैं.
ट्रांसप्लांट के बाद अंकिता की जीवन शैली में कई बड़े बदलाव भी आए. अंकिता के अनुसार ट्रांसप्लांट के बाद से उन्होंने घर के बाहर का कोई खाना, बर्गर व पिज़्ज़ा जैसी चीज़ें नहीं खाई हैं.
जब कभी वह दोस्तों के साथ बाहर जाती हैं तो अपना खाना या ड्राई फ़्रूट्स जैसी चीज़ें साथ रखती हैं लेकिन सभी कठिनाइयों के बावजूद वह जीवन के विभिन्न अनुभवों से गुज़रना चाहती हैं.
पेशेवर खेल हो या एडवेंचर स्पोर्ट्स, जैसे स्काई डाइविंग या डीप सी डाइविंग, अंकिता किसी अनुभव से ख़ुद को दूर नहीं रखतीं.
इसकी वजह बताते हुए वह कहती हैं, "मेरी मां के पास एक काले रंग की डायरी हुआ करती थी जिसमें उन्होंने बहुत सी बातें लिख रखी हैं. जैसे मेरी बहन की शादी करनी है, कौन-कौन लोग मेहमान होंगे, ऑफ़िस में क्या-क्या करना है, किस-किस से मीटिंग करनी है वग़ैरा लेकिन वह सब कुछ एक झटके में ख़त्म हो गया और वह डायरी रह गई."
वह कहती हैं, "मैं हर सुबह उठकर ख़ुद को याद दिलाती हूं कि बहुत से लोगों की नींद में ही मौत हो जाती है. बहुत से लोगों ने सपने देखे होंगे, जो पूरे नहीं हो सके. मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे यह दिन नसीब हुआ है और मैं कोशिश करती हूं कि अपने हर दिन को अधिक से अधिक अनुभवों से भर लूं."
"ऐसा करने से मुझे बहुत से नए अनुभव मिलते हैं जिनमें सफलताओं के साथ विफलता भी होती है और बहुत सी अच्छी चीज़ें भी जीवन में शामिल हो जाती हैं."
"हमें दूसरों को सुनने की आदत डालनी चाहिए"
अंकिता कहती हैं कि जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं और हम सब को चाहिए कि दूसरों के लिए नर्मी और हमदर्दी रखें.
वह कहती हैं, "जब कोई अपनी किसी समस्या के बारे में बात करे तो उसे यह कहना कि उसकी समस्या छोटी है और आपके साथ कुछ उससे भी अधिक बड़ा हुआ है, यह रवैया ग़लत है."
वह कहती हैं कि हमें दूसरों को सुनने की आदत डालनी चाहिए.
अपने आगे के जीवन में वह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई काम करना चाहती हैं. वह कहती हैं लोगों के लिए किसी रोग का इलाज कराना इतना मुश्किल काम नहीं होना चाहिए.
अपने भविष्य के प्रोजेक्ट के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, "हम ऐसे रेडिएशन सेंटर्स बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिन तक आम लोगों की पहुंच आसान हो ताकि कैंसर की पहचान और उसके इलाज के लिए उन्हें बहुत ज़्यादा इंतज़ार न करना पड़े."
अंकिता कहती हैं कि अगर अपनी मां की जान बचाने के लिए उन्हें दोबारा लिवर दान करना पड़ता तो वह दोबारा भी ज़रूर करतीं हालांकि ट्रांसप्लांट के बावजूद वह अपनी मां की जान नहीं बचा सकीं, लेकिन उन्हें इस फ़ैसले पर कोई पछतावा नहीं.
वह अभी जीवन में बहुत कुछ और भी करना चाहती हैं और कहती हैं, "अगर मैं कारोबार कर रही हूं तो क्या खेल नहीं सकती? या खेल के साथ क्या अपनी मां की जान नहीं बचा सकती? मैं करना चाहूं तो सब कुछ कर सकती हूं. मेरे जीवन का दर्शन यही है और मैं उम्मीद करती हूं कि कुछ लोग मेरे इस विचार से ज़रूर प्रभावित होंगे."
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