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पाकिस्तानी ड्रामा इंडस्ट्री के कलाकारों को नहीं मिलता है मेहनताना, क्या हैं हालात
- Author, बुराक़ शब्बीर
- पदनाम, पत्रकार
पाकिस्तानी ड्रामा इंडस्ट्री दुनिया भर में धूम मचा रही है लेकिन यहां काम करने वाले कलाकारों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
कुछ समय पहले निर्देशक मेहरीन जब्बार, अभिनेता और लेखक सैयद मोहम्मद अहमद, अभिनेत्री सहीफ़ा जब्बार ख़टक, अलीज़े शाह और फ़ैज़ान ख़्वाजा ने सोशल मीडिया पर कुछ समस्याओं के बारे में चर्चा की, जिनमें काम के पैसे मिलने में देरी की समस्या भी शामिल थी.
इससे पहले रम्शा ख़ान और ख़ुशहाल ख़ान भी अपने इंटरव्यू में पेमेंट की समस्याओं पर बात कर चुके हैं, लेकिन समस्याएं केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं.
इन शिकायतों के बारे में हमने पाकिस्तान की ड्रामा इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों से बातचीत की और यह समझना चाहा कि इंडस्ट्री के हालात अनुकूल क्यों नहीं हैं.
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'सब एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं'
ड्रामा 'मैं मंटो नहीं हूं' में काम करने वाले अदाकार सैयद मोहम्मद अहमद का कहना है कि उनकी उम्र इस बात की इजाज़त नहीं देती कि वह एक साथ एक से ज़्यादा ड्रामा में काम करें. लेकिन वह ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उम्मीद होती है कि एक से नहीं तो दूसरे ड्रामे से पेमेंट आ जाएगी.
सैयद मोहम्मद अहमद का कहना है कि चेक आने में कम से कम छह से सात महीने लग जाते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उस वक़्त होती है, जब वह आपको जवाब ना दें.
उन्होंने कहा, "फिर आप धीरे-धीरे उनसे अनुरोध करते हैं. फिर अपने घर के हालात बताते हैं. इसके बाद कहीं जाकर आपको एक चेक मिलता है."
मोहम्मद अहमद कहते हैं कि एक अदाकार को पूरा भुगतान लगभग तीन से चार बार में किया जाता है.
कनाडा से ऑनलाइन इंटरव्यू में अभिनेत्री सहीफ़ा जब्बार ख़टक ने बीबीसी को बताया कि प्रोजेक्ट साइन करने के बाद "जो पहला चेक मिलना होता है वह केवल कॉन्ट्रैक्ट ही होता है. कोई चेक नहीं मिलता."
इस बारे में जब डायरेक्टर मेहरीन जब्बार से बात की गई तो उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में पेमेंट के मामले में हर कोई दूसरे पर आरोप लगा देता है.
"प्रोडक्शन हाउस कहते हैं कि उन्हें चैनल की तरफ से पैसे नहीं मिले. चैनल वाले कहते हैं कि एडवरटाइज़र्स उन्हें देर से पैसे देते हैं. कोई प्रोफ़ेशनल सिस्टम नहीं है."
'अस्पताल ले जाने की बजाय कहा गया कैमरा चलाते रहें'
भुगतान में देरी के अलावा कलाकारों की सुरक्षा के बारे में कोई ख़ास व्यवस्था नहीं किए जाने की शिकायतें भी मिलती हैं.
सहीफ़ा ने बीबीसी को बताया कि एक ड्रामे के सेट पर होने वाली घटना पर उन्हें एफ़आईआर करवानी पड़ी थी क्योंकि उनके प्रोड्यूसर बहुत ग़ुस्से वाले थे और सेट पर बंदूक़ लेकर आ गए थे.
उनका कहना है कि ऐसे मामलों के लिए एक आर्टिस्ट के पास कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है.
अभिनेत्री हाजरा यामीन इस समय ड्रामा 'मैं मंटो नहीं हूं' में नज़र आ रही हैं. उन्होंने बताया कि कॉन्ट्रैक्ट में कोई भी बात कलाकार के हित की नहीं होती.
उन्होंने बताया कि कई बार जब वह सेट पर घायल हुईं तो उनके इलाज की व्यवस्था करने की जगह उन्हें घर भेज दिया गया.
मोहम्मद अहमद ने बताया कि एक बार जब सेट पर उनकी आंख में कांच चुभ गया तो उन्हें अस्पताल ले जाने की बजाय यह कहा गया कि कैमरा रोल करते रहें, "यह शूट में काम आएगा."
"यही घटना अगर आपके किसी लीड एक्टर के साथ होती और ख़ून बह रहा होता तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता."
इसी तरह की बात अभिनेता फ़ैसल क़ुरैशी ने भी की. उन्होंने बीबीसी को बताया "मेन लीड के अलावा हमारे यहां अगर कोई एक्टर सेट पर बीमार हो जाए या उसे कोई चोट लग जाए तो प्रोडक्शन हाउस उसका कोई ख़ास ध्यान नहीं रखता."
डायरेक्टर मेहरीन जब्बार के अनुसार ड्रामा इंडस्ट्री की एक और बहुत बड़ी समस्या 'टाइमिंग' की है. "कुछ अदाकार वक़्त पर नहीं आते और उनकी वजह से वक़्त पर आने वाले अदाकारों को परेशानी होती है."
ड्रामा इंडस्ट्री की समस्याएं कैसे हल की जाएं?
बाबर जावेद ने प्रोड्यूसर के तौर पर सैकड़ों ड्रामे बनाएं हैं. उनका कहना है कि 80 से 90 फ़ीसदी समस्याओं की वजह पहली पंक्ति के कलाकार हैं. क्योंकि अगर वह कॉन्ट्रैक्ट साइन करके ग़ायब हो जाएं तो कोई कुछ नहीं कर सकता. "वह अक्सर शूट की तारीख़ें भी आठ से दस महीने तक आगे बढ़ा देते हैं."
उन्होंने बीबीसी के साथ बातचीत में बताया कि इस वक़्त 90 फ़ीसदी प्रोडक्शन हाउस के अपने टीवी चैनल्स हैं तो असली समस्या प्रोड्यूसर की नहीं, चैनलों की है जो पैसे नहीं दे रहे.
उन्होंने कहा कि कुछ शोज़ के कॉन्ट्रैक्ट्स में साफ़-साफ़ लिखा होता है कि पैसे 90 दिनों में मिलेंगे मगर पैसे डेढ़ सौ या 160 दिन तक में आते हैं लेकिन कलाकार फिर भी बार-बार उसी शो में जाते हैं.
यही बात जब अदाकारों से पूछी गई तो उनका कहना है कि वह काम करना तो नहीं छोड़ सकते.
हाजरा यामीन का कहना है कि प्रोडक्शन हाउस हैं ही कितने? "काम तो करना है ना? वह तो नहीं रुक सकता."
"इस इंडस्ट्री की इतनी खुली सोच नहीं है कि यह एक एक्टर की तरफ़ से इनकार सुन सके. ऐसा भी होता है कि अगर आपने किसी प्रोडक्शन हाउस को इनकार किया है तो वह लंबे समय तक आपको काम नहीं देंगे."
दूसरी तरफ़ सहीफ़ा जब्बार का कहना है, "हमारे प्रोड्यूसर्स उन आर्टिस्ट्स के साथ बार-बार काम करते हैं जिनकी वजह से सेट पर समस्याएं होती हैं क्योंकि उनकी वजह से लोकप्रिय ड्रामे मिले होते हैं. इसके बाद प्रोड्यूसर्स शिकायत करने का हक़ खो देते हैं."
'प्रोड्यूसर से उम्मीद नहीं, आर्टिस्ट से है'
अदाकारों ने हमें बताया कि अपने बुरे अनुभवों के बाद उन्होंने कई दूसरे रास्ते अपनाए.
जहां सैयद मोहम्मद अहमद ने आवाज़ उठानी शुरू की तो वहीं सहीफ़ा अपने कॉन्ट्रैक्ट में लिखवाने लगीं कि अगर इन शर्तों को पूरा नहीं किया जाता, तो वह सेट पर जाना छोड़ सकती हैं.
अगर कोई प्रोड्यूसर उनके पैसों में से टैक्स काट रहा है तो हाजरा टैक्स की रसीद देने पर ज़ोर देती हैं और अपने साथी अदाकारों को ऐसा ही करने को कहती हैं.
हाजरा यामीन ने कहा, "प्रोड्यूसर्स से तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है लेकिन आर्टिस्ट कम्यूनिटी से है. हम एक दूसरे का सपोर्ट सिस्टम बन सकते हैं."
मेहरीन जब्बार का कहना है कि प्रोडक्शन हाउस को चाहिए कि वह सेट पर उसी वक़्त जाए जब उन्हें पता हो कि उसके पास अपने ख़र्चे के लिए पैसे हैं. इस बारे में बाबर जावेद का कहना है कि चैनलों को ही लीड लेकर इंडस्ट्री में सुधार लाना होगा.
उन्होंने कहा कि चैनलों को चाहिए कि वह आर्टिस्ट्स की हेल्थ इंश्योरेंस करवाएं क्योंकि असल कर्ता-धर्ता वही हैं.
क़ानूनी तौर पर देखा जाए तो परफ़ॉर्मिंग आर्टिस्ट के लिए कोई खास लेबर क़ानून नहीं है, जिसके तहत वह अपना मुक़दमा लड़ सकें.
इस बारे में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अताउल्लाह कंडी ने बीबीसी को बताया कि अदाकार किसी भी कॉन्ट्रैक्ट या समझौते की शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में सिविल कोर्ट जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि आमतौर पर ऐसे मुक़दमों में देर होती है लेकिन वह अपनी रक़म वसूल करने के लिए अपील कर सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.