भारत के ख़िलाफ़ मैच से हटने का पाकिस्तान के टी-20 वर्ल्ड कप सफ़र पर क्या असर पड़ सकता है?

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- Author, मुनज़्ज़ा अनवार
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
सात फ़रवरी से शुरू होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के भारत के ख़िलाफ़ अपना ग्रुप मैच खेलने से इनकार करने के बाद प्रशंसकों के मन में कई सवाल हैं.
सबसे अहम सवाल ये है कि इस फ़ैसले का पाकिस्तान के वर्ल्ड कप सफ़र पर क्या असर पड़ सकता है?
वे यह भी पूछ रहे हैं कि अगर दोनों टीमें नॉकआउट स्टेज में आमने-सामने होती हैं, तो क्या तब भी पाकिस्तान यही फ़ैसला करेगा?
भारत और पाकिस्तान की टीमों को टी-20 वर्ल्ड कप के शुरुआती मुक़ाबलों के लिए बनाए गए चार ग्रुपों में से ग्रुप 'ए' में रखा गया है.
इन मुक़ाबलों के बाद हर ग्रुप से दो टीमें सुपर-8 के लिए क्वालिफ़ाई करेंगी.
अगर पाकिस्तान और भारत की टीमें सुपर-8 में पहुँचती हैं, तो दोनों अलग-अलग ग्रुप में होंगी.
यानी यह दोनों टीमें शुरुआती चरण के बाद सेमीफ़ाइनल या फ़ाइनल में ही आमने-सामने आ सकती हैं.
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भारत के ख़िलाफ़ मैच न खेलने का असर

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अगर पाकिस्तान टी-20 वर्ल्ड कप में भारत के साथ मैच नहीं खेलता है, तो दोनों टीमों के पॉइंट्स और रन रेट पर पड़ने वाले असर की हर तरफ़ चर्चा है.
सोशल मीडिया यूज़र्स इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इस स्थिति में क्या-क्या नतीजे हो सकते हैं.
पाकिस्तान के हटने का नतीजा इस मैच में भारत की जीत और दो निश्चित पॉइंट्स के रूप में निकलेगा.
जबकि पाकिस्तान को सुपर-8 में जगह बनाने के लिए अपने बाक़ी मैच अच्छे रन रेट के साथ जीतने की ज़रूरत होगी.
अगर बात रन बनाने के औसत या रन रेट की हो, तो आईसीसी की 'प्लेइंग कंडीशंस' की धारा 16.10.7 के अनुसार अगर किसी मैच में एक टीम खेलने से इनकार करे तो हटने वाली टीम का नेट रन रेट कम होगा.
जबकि दूसरी टीम के रन रेट पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यानी मैच खेलने से इनकार करने के नतीजे में इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान के नेट रन रेट पर असर पड़ेगा.
ग्रुप 'ए' में भारत और पाकिस्तान के अलावा अमेरिका, नामीबिया और नीदरलैंड्स की टीमें शामिल हैं.
बीबीसी ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) के प्रवक्ता आमिर मीर से पूछा कि क्या टूर्नामेंट के अगले चरणों के दौरान भी पाकिस्तानी टीम भारत के ख़िलाफ़ मैच का बहिष्कार करेगी, तो उनका कहना था कि इसका फ़ैसला समय आने पर किया जाएगा और यह फ़ैसला "हम (पीसीबी) नहीं, सरकार करेगी."
आईसीसी टूर्नामेंट्स में टीमों के इनकार का इतिहास

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राजनीतिक कारणों से खेलों के बहिष्कार का एक लंबा इतिहास रहा है और आईसीसी टूर्नामेंट्स में भी इसके कई उदाहरण मिलते हैं.
राजनीतिक कारणों से खेलों के बहिष्कार का एक मामला 1979 में हुआ जब श्रीलंका ने आईसीसी ट्रॉफ़ी (वर्ल्ड कप क्वालिफ़ाइंग टूर्नामेंट) में इसराइल के ख़िलाफ़ अपना मैच छोड़ दिया और पॉइंट्स खो दिए.
इस फ़ैसले से श्रीलंका की टीम ने वर्ल्ड कप से बाहर होने का जोखिम भी उठाया, हालाँकि बाद में वह 1979 के वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई करने में कामयाब रही.
1980 और 1990 के दशकों में ऑस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज़, न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड ने राजनीतिक विवाद या वेन्यू के कारणों से कुछ मैचों से नाम वापस लिए.
वेस्टइंडीज़ की महिला टीम को 1982 के महिला वर्ल्ड कप में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, भारत, नीदरलैंड्स और मेज़बान न्यूज़ीलैंड की टीमें शामिल थीं.
लेकिन वेस्टइंडीज़ ने न्यूज़ीलैंड के 1981 के रंगभेद युग के दौरान दक्षिण अफ़्रीका की रग्बी टीम की मेज़बानी करने के विरोध में इसमें हिस्सा नहीं लिया.
नीदरलैंड्स की टीम भी वित्तीय कारणों से शामिल नहीं हो सकी. इन दोनों टीमों की जगह एक 'इंटरनेशनल इलेवन' ने ली, जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, इंग्लैंड और नीदरलैंड्स की खिलाड़ी शामिल थीं.
1986 में भारत ने श्रीलंका में होने वाले एशिया कप में भाग लेने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसे श्रीलंका में तमिलों के साथ किए जा रहे व्यवहार पर आपत्ति थी.
1988 में भारत की महिला टीम ने वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं लिया क्योंकि उनकी एंट्री के लिए रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता पूरी नहीं की गई थी.
यह समस्या 'ब्यूरोक्रेटिक उलझन और राजनीतिक खेल' के कारण पैदा हुई थी.
1990-91 में पाकिस्तान ने 'कश्मीर विवाद' के कारण एशिया कप में हिस्सा नहीं लिया.
1993 का एशिया कप भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों और 1993 के बम धमाकों के बाद रद्द कर दिया गया था.
1996 में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ ने श्रीलंका में होने वाले अपने वर्ल्ड कप मैचों के लिए अपना दौरा रद्द कर दिया. उस समय वहाँ गृहयुद्ध जारी था और कोलंबो में बम धमाका भी हुआ था.
इसके बाद दोनों टीमें ग्रुप मैचों से हट गईं और बाद में श्रीलंका ने लाहौर में फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराकर ख़िताब जीता.
2003 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच खेलने से इनकार कर दिया. इस फ़ैसले का कारण ज़िम्बाब्वे के तत्कालीन राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की सरकार के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों और सुरक्षा चिंताओं को बताया गया.
ब्रिटिश सरकार के ज़िम्बाब्वे में सुरक्षा को लेकर चिंता जताए जाने के बाद इंग्लैंड के खिलाड़ियों को वहाँ खेलने में ख़तरा लग रहा था.
इसकी वजह से इंग्लैंड की टीम ने मैच 'फ़ोरफ़ीट' (छोड़ने) करने का फ़ैसला किया.
इसी टूर्नामेंट में न्यूज़ीलैंड ने भी खिलाड़ियों की सुरक्षा के डर से कीनिया की यात्रा नहीं की और अपना मैच नहीं खेला.
शुरुआत में इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड दोनों ने यह उम्मीद जताई थी कि इन मैचों को यहाँ से हटाकर किसी तीसरे देश, ख़ास तौर पर दक्षिण अफ़्रीका में कराया जाएगा.
हालाँकि ऐसा नहीं हो सका और नियमों के तहत इन मैचों के पॉइंट्स ज़िम्बाब्वे और कीनिया को दे दिए गए.
2009 में ज़िम्बाब्वे ने इंग्लैंड में होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप मैच में हिस्सा नहीं लिया क्योंकि सरकारों के बीच विवाद के कारण खिलाड़ियों को वीज़ा मिलने में समस्या हुई.
उस वक़्त ज़िम्बाब्वे क्रिकेट के अध्यक्ष पीटर चिंगोका ने कहा था कि उन्हें बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार खिलाड़ियों को वीज़ा नहीं दे सकती और ऐसी परिस्थिति में टीम ने हिस्सा न लेने का फैसला किया.
इस टी-20 वर्ल्ड कप में स्कॉटलैंड ने ज़िम्बाब्वे की जगह ली थी.
2016 में जब ढाका में एक इतालवी चैरिटी वर्कर की हत्या कर दी गई तो ऑस्ट्रेलिया की अंडर-19 क्रिकेट टीम ने बांग्लादेश में होने वाले अंडर-19 वर्ल्ड कप के लिए अपना दौरा रद्द कर दिया.
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को सलाह दी कि खिलाड़ियों को न भेजा जाए क्योंकि बांग्लादेश में ऑस्ट्रेलियाई हितों को ख़तरा था.
इसके बाद आयरलैंड को ऑस्ट्रेलिया की जगह आमंत्रित किया गया.
2022 में क्वारंटीन की पाबंदियों की वजह से न्यूज़ीलैंड ने वेस्टइंडीज़ में होने वाले अंडर-19 वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं लिया और स्कॉटलैंड ने उनकी जगह ली.
जब भारतीय टीम को भी अपनी सरकार से इजाज़त नहीं मिली

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2025 की चैंपियंस ट्रॉफ़ी 29 साल बाद पाकिस्तान में आयोजित पहला आईसीसी टूर्नामेंट होने वाला था.
नवंबर 2021 में पाकिस्तान को मेज़बान के रूप में मंज़ूरी मिल चुकी थी.
फिर भी सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या भारत (जिसने 2008 के बाद पाकिस्तान में मैच नहीं खेला था) वहाँ का दौरा करेगा?
इसकी वजह यह थी कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध तनावपूर्ण थे. हालाँकि पाकिस्तान ने 2023 के वनडे वर्ल्ड कप के लिए भारत का दौरा किया था.
आख़िरकार, बीसीसीआई ने कहा कि भारत अपने चैंपियंस ट्रॉफ़ी के मैचों के लिए पाकिस्तान नहीं जाएगा, क्योंकि उन्हें सरकार से इजाज़त नहीं मिली है.
दोनों बोर्डों और आईसीसी के बीच कई बार की बातचीत के बाद 2024-2027 के मैचों के लिए एक समझौता हुआ.
वह समझौता यह था कि किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट में, जो भारत या पाकिस्तान में हो, इन दोनों देशों के मैच न्यूट्रल वेन्यू पर खेले जाएँगे. इसके बाद 2025 की चैंपियंस ट्रॉफ़ी में भारत के मैच दुबई में खेले गए.
इसी दौरान पाकिस्तान ने महिला वर्ल्ड कप में अपने मैच न्यूट्रल वेन्यू पर खेलने का फ़ैसला किया ताकि सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों का हल निकाला जा सके.
भारत ने दुबई में अपना बेस बनाया जबकि पाकिस्तान ने अपने सभी मैच कोलंबो में खेले.
2026 में जब बीसीसीआई ने बांग्लादेश के मुस्तफ़िज़ुर रहमान को आईपीएल खेलने से रोक दिया तो उसके बाद बांग्लादेश ने सुरक्षा चिंता जताकर अपनी टीम को टी-20 वर्ल्ड कप के लिए भारत भेजने से इनकार कर दिया.
आईसीसी ने तर्क दिया कि उसने जो आकलन किया उसके हिसाब से बांग्लादेश की टीम को सुरक्षा के दृष्टिकोण से कोई ख़तरा नहीं है. बाद में बांग्लादेश के इनकार के बाद उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया.
क्रिकेट के वैश्विक टूर्नामेंट्स में ऐसा बार-बार क्यों हुआ?
मशहूर क्रिकेट पत्रकार, कमेंटेटर और विश्लेषक जैरड किम्बर ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया है, जिसमें वह कहते हैं कि यह कहना कि राजनीति क्रिकेट में हस्तक्षेप नहीं करती, सही नहीं है बल्कि राजनीति तो क्रिकेट की ओपनिंग करती है.
"शुरुआत से ही राजनीति ने इस खेल को सीमित रखा है और अब हम ऐसे वर्ल्ड कप के क़रीब हैं जिसमें राजनीति के कारण एक टीम शामिल नहीं है और दूसरी ने एक के ख़िलाफ़ मैच खेलने से इनकार कर दिया है."
जैरड कहते हैं, "क्रिकेट ने राष्ट्रों का निर्माण किया, लेकिन उन्हीं देशों की राजनीति ने अक्सर इस खेल को बाँटने की कोशिश की. राजनीति एक अजीब चीज़ है. सब चाहते हैं कि इसे खेल से अलग रखा जाए लेकिन यह वैसा ही है जैसे पानी से गीलापन अलग करने की कोशिश करना. राजनीति को किसी भी चीज़ से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसकी प्रकृति ही यही है कि वह हर चीज़ से जुड़ जाती है."

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वह 2023 की एशेज़ सिरीज़ में लॉर्ड्स के मैदान पर हुई एक स्टंपिंग की घटना का उदाहरण देते हैं जिस पर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों (इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया) ने टिप्पणी की थी. "यह इसलिए नहीं था कि दोनों खेल से बहुत ज़्यादा प्यार करते थे, बल्कि इसलिए क्योंकि यह लोकप्रियता हासिल करने का एक आसान ज़रिया था."
इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के सैंडपेपर स्कैंडल पर भी एक पूर्व प्रधानमंत्री ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया था.
जैरड कहते हैं कि हाल के वर्षों में दक्षिण अफ़्रीकी सरकार का क्रिकेट प्रशासन में हस्तक्षेप, अमेरिका में टी-20 लीग का राजनीति की चपेट में आना और यह बात कि अभी के आईसीसी चेयरमैन भारत के गृह मंत्री के बेटे हैं.. सभी इस सच्चाई के उदाहरण हैं कि राजनीति क्रिकेट के हर स्तर पर मौजूद है.
"यह खेल हमेशा पैसे और राजनीति के घालमेल से चलता रहा है. वर्ल्ड कप की सोच भी पैसा कमाने के लिए ही सामने आई और वक़्त के साथ हर बदलाव ने क्रिकेट में और अधिक निवेश लाने का रास्ता निकाला."
पहले अगर किसी टीम को किसी देश में खेलने पर आपत्ति होती थी, तो वह मैच न खेलने का फ़ैसला करके पॉइंट्स छोड़ देती थी.
हालाँकि क्रिकेट अब अरबों डॉलर की इंडस्ट्री बन चुका है. ऐसे में भारत का पाकिस्तान में चैंपियंस ट्रॉफ़ी खेलने से इनकार करना केवल 'फोरफ़ीट' तक सीमित नहीं रहा.
मैच चाहे कहीं भी खेला जाए, पाकिस्तान और भारत दोनों ही एक-दूसरे की भागीदारी से पैसों का फ़ायदा उठाते हैं.
जैरड के अनुसार यही वह नुक़्ता है, जहाँ क्रिकेट की कमज़ोर गवर्नेंस उभर कर सामने आती है.
अगर यह खेल मज़बूत मैनेजमेंट से चलता और एक ही बाज़ार पर निर्भरता से आज़ाद होता तो बेहतर फ़ैसले हो सकते थे. लेकिन क्रिकेट हमेशा से परस्पर विरोधी हितों का एक संवेदनशील गठबंधन रहा है.
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