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उधार के 1100 रुपये, एक सपना और 'आशिकी' की आवाज़: ऐसे कोलकाता का केदार बना कुमार सानू
"मां मुझे गोद में लेकर मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाती थी. जैसे डैडी का गाना, वैसे मां का खाना."
ये कहना है हिंदी गानों की दुनिया के मशहूर गायक कुमार सानू का. कुमार सानू का असली नाम केदारानाथ भट्टाचार्य है.
कुमार सानू का लगभग 40 साल का म्यूज़िक करियर रहा है और उन्होंने करीब 25,000 गाने गाए हैं.
आज भी 'आशिकी', 'साजन', 'बाज़ीगर' जैसी फ़िल्मों में गाए गए उनके गाने लोगों की ज़ुबान पर हैं.
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फ़िल्म 'आशिकी' का गाना "अब तेरे बिन जी लेंगे हम" और फ़िल्म 'दीवाना' का गाना "सोचेंगे तुम्हें प्यार, करें कि नहीं" काफ़ी हिट रहे.
हिंदी भाषा में ही नहीं बल्कि कुमार सानू कई दूसरी भाषाओं में भी गाने गा चुके हैं.
बीबीसी हिंदी के ख़ास शो 'कहानी ज़िंदगी की' में इरफ़ान ने बात की गायक कुमार सानू से.
बचपन से संगीत की ओर था रुझान
कुमार सानू का जन्म और परवरिश पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुई . उनके पिता भी संगीतकार थे. कुमार सानू पांच-भाई बहनों में सबसे छोटे हैं.
कुमार सानू बताते हैं, "मेरे पिता म्यूज़िक के टीचर थे. घर पर ही पिता जी बच्चों को संगीत सिखाते थे. तो हम वही सब देख कर बड़े हुए."
बचपन से संगीत की ओर रुझान होने की वजह से उन्होंने बी.कॉम. की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. अपने शुरुआती करियर में कुमार सानू कोलकाता के होटलों में गाना गाया करते थे. लेकिन संगीत की दुनिया में करियर बनाने के लिए उन्होंने मुंबई जाना ज़रूरी समझा.
उन्होंने कहा, "कलकत्ता में उस समय अच्छा खासा पैसा भी मिलता था. लेकिन मेरा टारगेट यही था कि गाना तो बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री में ही गाना है."
मुंबई जाने से पहले उन्होंने कोलकाता में संगीत की दुनिया में नाम कमाने की कई कोशिश की.
एक समय ऐसा भी था जब कुमार सानू अपने गानों की रिकॉर्डिंग की कैसेट बनाकर बंगाली म्यूज़िक डायरेक्टर को भेजा करते थे. लेकिन जब उन्हें बंगाली म्यूज़िक इंडस्ट्री से निराशा हाथ लगी तो उनके मन में मुंबई जाने का फ़ैसला और भी मज़बूत हो गया.
कुमार सानू कहते हैं, "उस समय मेरे दिमाग में आया कि अगर यही संघर्ष मैं बॉम्बे जाकर करूं और उस समय मुझे बॉम्बे में काफ़ी संभावनाएं नज़र आ रही थीं. मुझे लगा कि मुझे वहां जाकर कोशिश ज़रूर करनी चाहिए."
"बड़े भाई से 1100 रुपये उधार लिया और ट्रेन पकड़कर सीधे बॉम्बे."
मुंबई में कैसे मिली पहली नौकरी
जब कुमार सानू दूसरी बार मुंबई गए, तो महज छह दिन के भीतर ही उन्हें एक होटल में नौकरी मिल गई.
वो रविवार का दिन था, जब कुमार सानू आराधना गेस्ट हाउस गए. वहां पहुंचकर उन्होंने गेस्ट हाउस के मालिक से गाना गाने के लिए पूछा.
कुमार सानू कहते हैं, "वहां जाकर मैंने वहां के मालिक से बोला कि मुझे एक बार गाने का मौका दीजिए. वहां पर मैंने पहला गाना 'हंगामा क्यों हैं बरपा' गाया."
इस गाने के बाद उन्हें 14,000 रुपये की टिप मिली और उसी दिन उन्हें वहीं नौकरी भी मिल गई.
हालांकि, यह नौकरी उनके लिए एक सहारा ज़रूर बनी, लेकिन उनका असली सपना अब भी वही था, बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री में गायक बनने का.
किशोर कुमार की नकल
हर कलाकार का एक प्रेरणास्रोत होता है, जिसे वो शुरू में फॉलो करता है. कुमार सानू के लिए ये प्रेरणा थे गायक किशोर कुमार.
वो कहते हैं, "हम किसी न किसी को फॉलो करते ही हैं. मैंने किशोर दा को फॉलो किया."
लेकिन जब उन्हें ख़ुद को साबित करने का मौका मिला, तो उनके मन में एक विचार साफ़ था. अगर वह केवल 'किशोर कंठी' बनकर रह गए, तो वो भी उन्हीं लोगों में गिने जाएंगे जो आते हैं और गुमनाम होकर चले जाते हैं.
यहीं से उन्होंने अपने अंदर बदलाव लाना शुरू किया. उन्होंने माना कि अपनी एक अलग पहचान होना बेहद ज़रूरी है.
कुमार सानू बताते हैं, "मैं जब किशोर दा के गाने गाता था. तो उसमें थोड़ा- बहुत अपना कुछ भी मिलाता था. उसी चीज़ को मैंने धीरे-धीरे स्थापित किया."
"उस समय मुझे जो भी मौका मिला, मैंने उसमें जी-जान लगा दी."
और फिर जब उन्हें फ़िल्म 'आशिकी' में गाने का मौका मिला, तो उन्हें न केवल पहचान मिली, बल्कि संगीत की दुनिया में वह एक नई आवाज़ बनकर उभरे.
कुमार सानू कहते हैं, "आपको मेरे गानों में किशोर दा की झलक भी मिलेगी और कुमार सानू भी नज़र आएगा."
उनका मानना है कि किसी भी गायक के लिए अपना इनपुट देना बहुत ज़रूरी है. अगर गायक सिर्फ़ दिए गए निर्देशों पर गाता है और उसमें ख़ुद कुछ नहीं जोड़ता, तो वह आगे नहीं बढ़ सकता.
उन्होंने कहा, "मेरे कई गाने हैं जिसमें मैंने अपना इनपुट दिया है. और जिन गानों में मैं अपना इनपुट नहीं दे पाता उन गानों की स्टेज परफ़ॉर्मेंस में अपना सारा इनपुट डाल देता हूं."
कुमार सानू की नज़र से गुलशन कुमार
गुलशन कुमार को याद करते हुए कुमार सानू कहते हैं, "गुलशन कुमार एक ऐसे आदमी थे जिन्होंने म्यूज़िक इंडस्ट्री को उसका हक मांगना सिखाया."
"चाहे म्यूज़िक डायेक्टर हों, गायक हों या गीतकार, गुलशन कुमार ख़ुद भी पैसे देते थे और उन्होंने अपने हक का पैसे लेने की आदत दिलाई थी."
कुमार सानू अपने सफल करियर का श्रेय गुलशन कुमार को देते हैं.
वह बताते हैं, "गुलशन जी ने मुझे 'धीरे-धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना' गाना दिया, जिसकी वजह से मैं आज कुमार सानू हूं."
आशिकी ने बनाया स्टार
फ़िल्म आशिकी ने कुमार सानू को रातोंरात स्टार बना दिया था.
कुमार सानू 90 के दशक के संगीत के बारे में बात करते हुए कहते हैं, "उस समय संगीत की बहुत कीमत थी. फ़िल्म का संगीत बेचकर ही फ़िल्म की आधी शूटिंग हो जाती थी. तब फ़िल्में भी सिल्वर जुबली रहती थीं."
जब फ़िल्म 'आशिकी' रिलीज़ हुई, तो कुमार सानू मुंबई के मशहूर चंदन टॉकीज में फ़िल्म देखने गए.
उस पल को याद करते हुए वो बताते हैं, "वहां जाकर मैंने देखा कि फ़िल्म के हर गाने में लोग पर्दे पर पैसा गिरा रहे हैं. फ़िल्म देखने के बाद सब लोग मेरे बारे में ही बात करते हुए मेरे ही बगल से गुज़र रहे थे."
इस पल के अनुभव के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनकी आवाज़ ने लाखों दिलों को छू लिया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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