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कबीर बेदी: रिलेशनशिप्स से लेकर जेम्स बॉन्ड तक- कहानी ज़िंदगी की
- Author, इरफ़ान
मैं जब छोटा था, फिल्मी पत्रिकाओं के कवर और अख़बारों के पिन अप पोस्टर्स अक्सर उनकी दिलफरेब अदाओं से भरे मिलते थे. कंजी आँखें, सुतवां नाक, चौड़े जबड़े और मज़बूत कंधों वाला एक कद्दावर इंसान और उसके चेहरे पर लगी एक ख़ास दाढ़ी. ये सब मन पर अमिट छाप छोड़ जाता था.
फिर कुछ हिंदी फ़िल्में आईं और कई इश्तेहार और ऐड फ़िल्में जिनमें कबीर बेदी को देखो तो देखते रह जाओ. और फिर एक लंबा अरसा ऐसा गुज़रा कि उन्होंने भारत से ज़्यादा यूरोप में शोहरत की बुलंदियां छुईं.
पिछले दस बरसों में कबीर बेदी से हुई मुलाक़ातें इस मिथ से पर्दा हटाती गईं हैं कि वो बड़े रंगीन और छलिया क़िस्म के इंसान हैं.
मैंने उनसे उनकी इस छवि के बारे में पूछा तो बोले "अगर मैं अपने रिलेशंस को देखूं तो वो कोई 'वन नाइट स्टैंड' नहीं थे. पहली शादी सात साल की थी. दूसरी शादी भी कोई सात आठ साल की थी. तीसरी शादी पंद्रह साल की थी. अब जो शादी मैंने की है परवीन दोसांज के साथ, हम उन्नीस साल से साथ हैं."
1970 में शुरू हुआ सफ़र
अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि उन्हें लोगों के बीच रहना पसंद है. वो कोई अनुभव, कोई नई बात हमेशा चाहते हैं कि कोई हो, जिससे वो शेयर करें. "मुझे अपने आसपास कोई चाहिए. मेरे जितने भी रिश्ते हुए सब एक मुकाम तक पहुंचे और उसके बाद भी हम अच्छे दोस्त बने रहे."
कबीर बेदी एक ब्रॉडकास्टर, ऐड फिल्ममेकर, वॉयस ओवर आर्टिस्ट, एक्टर और ऑथर हैं.
जनवरी 2025 में मुझे एक बार फिर मौका मिला कबीर बेदी से बात करने का. 'कहानी ज़िंदगी की' में उन्होंने अपनी ज़िंदगी और सफ़र के बारे में दिल खोलकर बातें कीं. बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड और इटली के सिनेमा तक, कबीर बेदी का सफ़र एक मिसाल है वर्सेटिलिटी, हिम्मत और जुनून का.
कबीर बेदी लाहौर में पैदा हुए, जो उस वक्त ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था. उनके पिता, बाबा प्यारे लाल बेदी, एक ट्रेड यूनियन लीडर, दार्शनिक और लेखक थे. उनकी माँ, फ्रेडा बेदी, ब्रिटिश महिला थीं, जो बाद में बौद्ध नन बनीं. इस अनोखे परिवार ने कबीर बेदी के विचारों और जीवन को विशिष्ट बनाया, जिससे उनमें एक खुला और जिज्ञासा भरा दृष्टिकोण पनपा.
उनका सफ़र 1970 के दशक में शुरू हुआ, जब उन्होंने इंडियन थिएटर और फ़िल्मों में कदम रखा. उनकी धमाकेदार आवाज़ और शख़्सियत ने उन्हें बॉलीवुड में जल्दी ही अलग पहचान दी.
'खून भरी मांग' (1988) और 'मैं हूँ ना' (2004) जैसी फ़िल्मों में उनके दमदार रोल से उन्हें घर-घर में पहचाना गया. लेकिन असली शोहरत उन्हें तब मिली जब इटली की टीवी सीरीज़ सैंडोकन (1976) में पाइरेट के रोल ने उन्हें वहाँ का सुपरस्टार बना दिया.
हमारी बातचीत में उन्होंने इस सफलता को याद किया और बताया कि अलग-अलग देशों के सिनेमा के साथ काम करना कितना दिलचस्प और चैलेंजिंग था. हॉलीवुड में उन्होंने जेम्स बॉन्ड फ़िल्म 'ऑक्टोपसी' (1983) में जो किरदार निभाया, उससे वो बने एक इंटरनेशनल स्टार.
ये एक बड़ा अचीवमेंट था, क्योंकि उस वक्त इंडियन एक्टर्स का हॉलीवुड में यूं चमकना सपने जैसा था. 2020 में कबीर बेदी ने अपने जीवन के विभिन्न पक्षों को उजागर करते हुए किताब लिखी 'स्टोरीज़ आई मस्ट टेल' जिसके आज कई भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं.
कबीर बेदी की किताब से भी ज़ाहिर होता है कि स्क्रीन से हटकर, उनका जीवन भी उतना ही रोचक है. इंटरव्यू में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव, परिवार, शादियों, और बच्चों के साथ रिश्ते के बारे में खुलकर बात की.
उनकी माँ के आध्यात्मिक जीवन का भी उन पर गहरा असर रहा, जो उनके विचारों में झलकता है.
पाँच दशक का करियर
पाँच दशकों से ज़्यादा के करियर में, कबीर बेदी आज भी नई चुनौतियों के लिए तैयार रहते हैं. चाहे वो इंडियन टीवी हो, इंटरनेशनल फ़िल्म्स, या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स, वो हमेशा नए रास्ते ढूंढते हैं.
रूमी की कविताओं की मंचीय प्रस्तुति में पिछले महीने खचाखच भरे हाल में दर्शक उनके इस नए अवतार से भी मंत्रमुग्ध दिखे. हमारी बातचीत में उनकी गर्मजोशी और ज़िंदादिली साफ दिखाई दी, जो उन्हें एक सच्चा कलाकार बनाती है.
पूरा इंटरव्यू देखिए और सुनिए कबीर बेदी को, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी की कहानी अपनी ही ज़ुबानी, ईमानदारी, विट और यादों के साथ बयान की है.
ये एक ऐसा सफ़र है जो आपको देश और दुनिया के उन विभिन्न दौरों से रूबरू कराएगा, जिनमें कबीर बेदी जीत और हार के साहसिक अभियान पर हैं.
कहानी ज़िंदगी के पिछले एपिसोड देखने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक कर सकते हैं.
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