ईरान युद्ध पर 2003 में सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ हुई जंग का साया, क्या पुरानी ग़लतियां दोहराई जा रही हैं?

- Author, गोर्डन कोरेरा
- पदनाम, सुरक्षा विश्लेषक
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
इराक़ की राजधानी बग़दाद के केंद्र में स्थित सद्दाम हुसैन की एक प्रतिमा को 9 अप्रैल 2003 को गिरा दिया गया था.
प्रतिमा की नींव पर लगी धातु की पट्टिका को उखाड़ दिया गया था और संगमरमर के जिस चबूतरे पर यह प्रतिमा खड़ी थी उसे हथौड़ों से तोड़ दिया गया था.
शुरू में, इराक़ी नागरिकों ने इसे गिराने की कोशिश की. इसकी गर्दन में फंदा डालने के लिए वे प्रतिमा पर चढ़ गए, लेकिन इसे हटाने में नाकाम रहे.
आख़िरकार इस विशाल प्रतिमा को गिराने के लिए अमेरिकी सैनिकों को एक बख़्तरबंद वाहन का इस्तेमाल करना पड़ा.
यह एक ऐसा पल था जो इराक़ में सत्ता परिवर्तन का प्रतीक था. अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने केवल 20 दिन पहले इराक़ पर अपना हमला शुरू किया था.
ये हमला तेज़ बमबारी के साथ शुरू हुआ था और इस दौरान इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की हत्या के लिए क्रूज़ मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया था.
सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराये जाने के तीन सप्ताह बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश कैलिफ़ोर्निया के तट पर खड़े एक अमेरिकी विमानवाहक पोत पर "मिशन अकम्प्लिश्ड" (मिशन पूरा हुआ) लिखे बैनर के नीचे खड़े हुए.
लेकिन हक़ीक़त में ये मिशन बिल्कुल अधूरा था. अब उस इराक़ युद्ध की परछाई ईरान के साथ वर्तमान संघर्ष पर मंडरा रही है.
यह एक ऐसा युद्ध था जिसने इराक़ पर ग़हरे निशान छोड़े क्योंकि इसके बाद घटनाओं का ऐसा क्रम शुरू हुआ जिसका किसी ने अनुमान नहीं लगाया था.
इस युद्ध ने मृत्यु और विनाश के निशान छोड़े. अनुमानों के मुताबिक़, साल 2003 से 2011 के बीच इराक़ में 4,61,000 लोग युद्ध की वजह से मारे गए और अमेरिका को इस युद्ध पर तीन ट्रिलियन डॉलर ख़र्च करने पड़े.
युद्ध ने मध्य पूर्व को नया आकार दिया.
आज, अमेरिका ने इस इलाक़े में एक ऐसा युद्ध छेड़ दिया है जिसे बहुत से लोग 'वॉर ऑफ़ चॉइस' यानी मर्ज़ी से शुरू किया गया युद्ध कह रहे हैं.
इस बार ये युद्ध इराक़ के पड़ोसी ईरान के खिलाफ़ छेड़ा गया है. इन दोनों युद्धों के बीच निश्चित रूप से कई समानताएं हैं, लेकिन गहरे मतभेद भी हैं जो हमें बताते हैं कि तब से दुनिया कितनी बदल गई है और इराक़ की नाकामी को फिर से दोहराने से बचा जा सकता है या नहीं.
मक़सद क्या है?

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अमेरिका के लिए इराक़ पर हमला करने के कई ऐसे उद्देश्य थे जो एक दूसरे में समाहित थे. इन उद्देश्यों में से कुछ को उस समय सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया था.
लेकिन मूल में सत्ता परिवर्तन की इच्छा थी. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के इर्द-गिर्द रहने वाले कुछ लोगों को लग रहा था कि 1991 के खाड़ी युद्ध का काम अधूरा रह गया है.
सद्दाम हुसैन को इस युद्ध में कुवैत से तो बाहर निकाल दिया गया था लेकिन वह सत्ता में बने रहे थे.
राष्ट्रपति बुश के लिए यह और भी व्यक्तिगत रहा होगा क्योंकि उनके पिता, राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू बुश ने 1991 के उस अभियान का नेतृत्व किया था और उसके बाद सद्दाम हुसैन ने उन्हें मारने की साज़िश रची थी.
वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे जिनका मानना था कि मानवाधिकारों के आधार पर सत्ता परिवर्तन उचित था.
ऐसा मानने वाले लोग हुसैन का तख़्तापलट चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि सद्दाम हुसैन ने अपने ही लोगों पर भयानक हिंसा की थी. उनका कहना था कि हुसैन ने 1980 के दशक में कुर्द नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल भी किया था.
ब्रिटेन ने 1990 के दशक से टोनी ब्लेयर के शासनकाल में इसका समर्थन किया था. तब ब्रिटेन ने कोसोवो में ख़ूनख़राबा रोकने के लिए बाल्कन क्षेत्र में हस्तक्षेप किया था.
इराक़ के बाहर रह रहे इराक़ के लोग भी सद्दाम हुसैन के शासन से नफ़रत करते थे और अपने देश के भविष्य के लिए एक मौका चाहते थे.
फिर ऐसे 'नव-रूढ़िवादी' भी थे जो मध्य पूर्व को नया आकार देना चाहते थे, इस क्षेत्र में लोकतंत्र लाना चाहते थे और उन तानाशाहों को हटाना चाहते थे जो अमेरिका से दुश्मनी रखते थे.
कुछ ने कहा, पहले बग़दाद, फिर तेहरान. इससे यह भी याद आता है कि ईरान कितने समय से एजेंडे में है.
11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए हमलों में 2977 लोग मारे गए. इसके बाद अमेरिका में कट्टरपंथी लोगों ने अमेरिका की डेटेरेंट पावर (हमले रोकने की क्षमता) को बहाल करने की बात उठाई ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि अमेरिका क्या कर सकता है.
अल क़ायदा के 9/11 को अमेरिका पर हमलों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर ऐसे हमलों में होने वाले विनाश के स्तर के संदर्भ में कैलकुलस (गणना) को बदल दिया था.
इन हमलों के बाद बहुत जल्द ही इराक़ अमेरिका के एजेंडे में शीर्ष पर आ गया, भले ही उन हमलों में उसकी कोई भूमिका नहीं थी.
यही नहीं, 2001 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार के ख़ात्मे ने भी अमेरिका के इस विश्वास को बढ़ा दिया कि वह क्या कर सकता है.
9/11 हमलों के कुछ महीनों के भीतर ही अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था. लेकिन आख़िरकार, इराक़ युद्ध का मक़सद भी किसी और चीज़ के इर्द-गिर्द घूमता रहा.
ये थी इराक़ की कथित सामूहिक विनाश के हथियारों की क्षमताएं, परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों को विकसित करने योजनाएं, साथ ही मिसाइल क्षमताएं.
और जब बात ब्रितानी और अमेरिकी जनता की आई, तो इन हथियारों से उत्पन्न ख़तरे पर ज़ोर देना सैन्य कार्रवाई के लिए सार्वजनिक समर्थन बनाने का सबसे आसान तरीक़ा था.
वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इराक़ के अपने हथियारों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का पालन न करने ने युद्ध के लिए वैधता हासिल करने का एक साधन भी मुहैया करा दिया.
हालांकि हथियार कभी भी असली कारण नहीं थे, जैसा कि उस समय सीआईए के इराक़ ऑपरेशंस ग्रुप के प्रमुख लुइस रुएडा ने बाद में बताया था.
लुइस ने कहा था, "अगर सद्दाम हुसैन के पास रबर बैंड और पेपर क्लिप होता तो भी हम इराक़ पर आक्रमण करते. हम कहते 'ओह, वह आपकी आंख निकाल लेगा, चलो उसे हटा देते हैं'."
ईरान पर हमला क्यों हुआ

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ईरान पर वर्तमान हमला भी कई लक्ष्यों के एक जटिल मिश्रण से निकलता प्रतीत होता है. ईरान की सेना को कमज़ोर करना, सामूहिक विनाश के हथियारों के विकास को रोकना और आम ईरानी लोगों का समर्थन करना जो शासन की तरफ़ से हिंसा झेल रहे हैं.
ट्रंप प्रशासन से जुड़े लोगों ने ईरान हमले के लिए इन सभी कारणों का हवाला दिया है.
कई मायनों में, यह 7 अक्तूबर 2023 को हमास के इसराइल पर किए गए हमले थे जिन्होंने अमेरिका में इस सोच को बदलने की प्रक्रिया शुरू की कि ईरान के साथ क्या किया जा सकता है क्योंकि इसराइल की जोखिम लेने की क्षमता बदल गई थी.
उसने ईरान और उसके प्रॉक्सी समूहों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. इसराइल की इस कार्रवाई ने अमेरिका के लिए रास्ता खोल दिया है.
लेकिन इस बार अमेरिका में, कार्रवाई करने को लेकर कभी कभार रही विरोधाभासी इच्छाओं को सार्वजनिक रूप से हल करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है.
वास्तव में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ख़ुद भी कई बार ईरान को लेकर इन विरोधाभासी इच्छाओं के बीच डगमगाते हुए दिखाई दिए हैं.
हालांकि ये इस पर निर्भर रहा है कि वो किससे बात कर रहे हैं और किस दिन कर रहे हैं.
इस बार अमेरिकी जनता को 'युद्ध बेचने' का भी कोई प्रयास नहीं किया गया है. इराक़ युद्ध के समय यह प्रक्रिया कई महीनों तक चली थी. ईरान पर हमले से पहले संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त करने का भी कोई प्रयास नहीं किया गया है.
हालांकि, 2003 में, इराक़ पर हमले से पहले, इस बात पर अंतहीन चर्चा हुई थी कि कौन से देश सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर सकते हैं.
इस बार, युद्ध का फ़ैसला लेने वालों के लिए संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय क़ानून अप्रासंगिक महसूस हुए हैं.
इस सबसे एक अलग दुनिया दिखाई देती है.
ऐसी दुनिया जिसमें पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था लगभग ध्वस्त हो गई है और जिसमें एक अस्थिर राष्ट्रपति विभिन्न लक्ष्यों को हल करने या अपनी कार्रवाई का एक तर्कसंगत मक़सद देने की ज़रूरत महसूस नहीं करता है.
ब्रिटेन और सहयोगियों की भूमिका

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साल 2003 में, अमेरिका अपने सहयोगियों, ख़ासकर ब्रिटेन के साथ युद्ध में गया था. ब्रिटेने के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर युद्ध की तैयारी के दौरान राष्ट्रपति बुश के साथ खड़े थे. टोनी ब्लेयर 2002 की गर्मियों में उन्हें एक निजी नोट लिखा था जिसमें कहा गया था कि वह अमेरिकी नेता के साथ रहेंगे "चाहे कुछ भी हो". यह नोट बहुत चर्चित हुआ था.
इराक़ पर आक्रमण की 20वीं वर्षगांठ के मौक़े पर मुझे दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया, "जब मैं प्रधानमंत्री था तो इसे लेकर कोई संदेह नहीं था कि सबसे पहले फ़ोन किसे करना है, फिर चाहे राष्ट्रपति क्लिंटन हों या बुश हों."
लेकिन ब्लेयर की प्रतिबद्धता को लेकर उनके सबसे क़रीबी लोगों में से कुछ लोग सावधान थे. उनके तत्कालीन विदेश सचिव जैक स्ट्रॉ ने बाद में बताया कि 'व्हाटएवर नोट' एक अच्छा विचार नहीं था.
और आलोचक ये सवाल भी करते हैं कि बदले में ब्लेयर कितना प्रभाव हासिल करने में कामयाब रहे. ब्लेयर ने इराक़ पर हमले से पहले अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी लेने के रास्ते पर जाने के लिए राज़ी किया.
लेकिन अमेरिका की ओर से यह आधे मन से किया गया था और अंततः ये कोशिश नाकाम साबित हुई. हालांकि, जब पीछे हटने का मौका दिया गया तो ब्लेयर ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह युद्ध में विश्वास करते हैं.
साल 2003 में उन्होंने कहा था, "यह वह जगह है जहाँ आपको उस समय प्रधानमंत्री के रूप में ये निर्णय लेने होते हैं. वे मुझे बाहर निकलने का रास्ता दे रहे थे क्योंकि वे मेरे लिए राजनीतिक रूप से कठिन स्थिति के लिए अफ़सोस महसूस कर रहे थे, लेकिन... इसका संबंधों पर बड़ा प्रभाव पड़ता."
और हक़ीक़त में उनके लिए राजनीतिक क़ीमत बहुत भारी रही क्योंकि जिन महाविनाश के हथियारों पर उन्होंने अपना आधार बनाया था, उनका अस्तित्व ही नहीं था.
इससे सिर्फ़ टोनी ब्लेयर को ही नुक़सान नहीं पहुंचा बल्कि लोगों का उन बातों में विश्वास भी टूट गया जो उन्हें बताई जा रहीं थीं. ब्रिटेन के पूर्व विदेश सचिव जैक स्ट्रॉ ने कहा, "इसने सार्वजनिक जीवन (राजनेताओं) में भरोसे को कम कर दिया. मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है."
राष्ट्रपति ओबामा इस तरह के हस्तक्षेपों में फिर से शामिल न होने के साफ़ इरादों के साथ सत्ता में आए. ये हैरानी की बात है कि, राष्ट्रपति ट्रंप भी ऐसा ही चाहते थे.
इस बार, अमेरिका ने ईरान पर हमला करने के लिए ब्रिटेन या अन्य सहयोगियों के बजाय इसराइल के साथ काम किया है. ब्रितानी प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने अमेरिका से दूरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है.
स्टार्मर ने ईरान पर शुरुआती हमले के दौरान ब्रिटेन के ठिकानों के उपयोग करने देने से इनकार कर दिया. हालांकि, स्टार्मर ने बाद में "रक्षात्मक" उद्देश्यों के लिए ब्रितानी सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति दे दी.
यह एक चोटिल लेबर पार्टी के लिए इराक़ की यादों के कारण हो सकता है लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि स्टार्मर का ट्रंप पर कितना वास्तविक प्रभाव हो सकता है.
एक गहरा सवाल यह है कि ब्रिटेन और अमेरिका एक दूसरे से कितना दूर हो रहे हैं. लेकिन सुरक्षा और ख़ुफ़िया संबंधों पर काम करने वाले अधिकारी मानते हैं कि दोनों देशों के रिश्ते नज़दीकी बने हुए हैं.
पिछले ब्रितानी प्रधानमंत्रियों ने कभी-कभी अमेरिका के युद्धों से अपनी दूरी बनाई रखी है. उदाहरण के लिए वियतनाम युद्ध पर पर हेरोल्ड विल्सन, लेकिन इस बार यह अलग महसूस हो रहा है.
आगे क्या?

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इराक़ की विरासत इसलिए भी बहुत स्पष्ट है क्योंकि अमेरिका के नेता वर्तमान संघर्ष को इराक़ से अलग बताने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ इस बारे में स्पष्ट रहे हैं कि ईरान इराक़ से अलग है और यह संघर्ष "लंबे युद्ध" में नहीं बदलेगा.
इसका एक पहलू यह है कि इस बार अमेरिका सत्ता परिवर्तन की बात कर रहा है, लेकिन उसने अब तक ऐसा करने के लिए ज़मीनी सैनिकों को तैनात नहीं किया है. इराक़ युद्ध के दौरान 2003 में अमेरिका ने लगभग 150,000 सैनिक तैनात किए थे.
लेकिन अमेरिका की इराक़ की तरह सेना तैनात करने की प्रतिबद्धता से बचने की स्पष्ट इच्छा दिखाई दे रही है. इससे विकल्प भी सीमित हुए हैं. हालांकि, ज़मीन पर किसी प्रकार के विद्रोही बल के साथ गठबंधन किए बिना केवल हवा में सत्ता परिवर्तन करना बहुत कठिन है.
ईरानी सरकार से लड़ने के लिए कुर्दों को हथियार देने की बात हो रही है. इन कुर्द बलों ने 2003 में अपनी भूमिका निभाई थी लेकिन उन्होंने ऐसा अमेरिका और उसके सहयोगियों की बहुत बड़ी सेना के साथ ही किया था.
साल 2003 में शुरुआती जीत के बाद एक लंबा और खिंचा हुआ 'कब्ज़ा' आया क्योंकि विद्रोह और गृह युद्ध ने इराक़ में पकड़ बना ली थी.
अमेरिका फिर से उस स्थिति में नहीं फंसना चाहता लेकिन समस्या यह है कि उसके कुछ अधिक विस्तृत उद्देश्यों को गहरी प्रतिबद्धता के बिना साकार करना कठिन हो सकता है.
इराक़ और अब ईरान के बीच एक प्रमुख समानता भविष्य के लिए योजना की कमी प्रतीत होती है. यह इस भ्रम से संबंधित है कि वास्तविक लक्ष्य क्या है.
साल 2003 में इराक़ के मामले में भविष्य के लिए जो अलग-अलग नज़रिए थे वे कभी हल नहीं हुए. सैन्य कार्रवाई पूरी होने के बाद आगे क्या करना है इसे लेकर कोई ठोस योजना नहीं थी.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने दो दशक बाद बताया, "ग़लती इराक़ियों के लिए नई सरकार बनाने की कोशिश करने में हुई थी. हमें इराक़ियों से कहना चाहिए था: 'बधाई हो - अपनी सरकार बनाओ. शुभकामनाएं."
यह उन लोगों के साथ नाइंसाफ़ी थी जो मध्य पूर्व में लोकतंत्र लाना चाहते थे और इराक़ में सबसे पहले लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे.
इराक़ अब युद्ध के तत्काल बाद की तुलना में बहुत बेहतर स्थिति में है और कई लोग सद्दाम हुसैन के जाने के बाद ख़ुश हुए हैं.
लेकिन, जैसा कि कुछ लोगों ने दावा किया था, इसके बाद भी मध्य पूर्व में लोकतंत्र नहीं फैला.
इसके बजाय, आक्रमण के सबसे बड़े विजेताओं में से एक ईरान बना. क्योंकि उसके मुख्य प्रतिद्वंदी सद्दाम हुसैन को हटा दिया गया था.
युद्ध के बाद के सालों में ईरान को इराक़ के भीतर और उससे भी आगे अपने प्रभाव को बढ़ाने का मौक़ा मिला. यही नहीं, उस युद्ध ने ब्रिटेन और व्यापक पश्चिम में आतंकवाद के ख़तरे को और बढ़ा दिया.
युद्धों का अक्सर परिणाम वह नहीं होता जिसकी लोग उम्मीद करते हैं या लोग जैसा चाहते हैं.
कोई सुसंगत योजना नहीं

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इराक़ और ईरान बहुत अलग देश हैं लेकिन क्या सबक़ सीखे जा सकते हैं?
अब तक इस बात का बहुत कम संकेत है कि अमेरिका ईरान में क्या हासिल करना चाहता है या वह देश के लिए किस तरह के भविष्य की कल्पना करता है.
इस बार, कामचलाऊ व्यवस्था एक जानबूझकर की गई रणनीति लगती है क्योंकि यह राष्ट्रपति ट्रंप को अलग-अलग विकल्प देती है. ट्रंप ईरान में अपना ख़ुद का "मिशन अकम्प्लिश्ड" पल बना सकते हैं.
वे बस यह कह सकते थे कि ईरानी मिसाइल और नौसैनिक क्षमता को कम करना पर्याप्त था और सत्ता परिवर्तन हमेशा ईरानी लोगों को ही करना था.
हालांकि, कई बार उन्होंने ख़ुद सत्ता परिवर्तन की बात की है.
अगर ये हुआ तो एक क्षतिग्रस्त लेकिन घायल ईरानी शासन सत्ता में रह जाएगा. ये 1991 के खाड़ी युद्ध के जैसा ही नतीजा होगा जब सद्दाम हुसैन को कुवैत से तो बाहर निकाल दिया गया था लेकिन बग़दाद में सत्ता में छोड़ दिया गया था.
इसके बाद कई सालों तक तनाव चला, रह-रहकर हुई बमबारी हुई, सामूहिक विनाश के हथियारों के विकास की आशंका बनी रही और आख़िरकार 2003 फिर जंग छिड़ गई.
इराक़ का एक सबक यह है कि युद्ध से किसी देश को तोड़ना जंग के बाद किसी देश के निर्माण करने के मुक़ाबले ज़्यादा आसान है.
ये निश्चित है कि ईरानी राज्य के कुछ हिस्से अभी तोड़े जा रहे हैं. मौजूदा युद्ध ने ब्रिटेन और ख़ासकर ईरान के हमलों का सामना कर रहे खाड़ी के अमेरिकी सहयोगी देशों को यह सोचने के लिए मजबूर किया है कि वो वास्तव में कितने सुरक्षित हैं?
और युद्ध शुरू करने वालों के लिए घरेलू राजनीतिक परिणाम, ख़ासकर राष्ट्रपति ट्रंप के लिए, अप्रत्याशित हो सकते हैं क्योंकि जंग से आर्थिक गिरावट आ सकती है.
इस युद्ध का एक संभावित हासिल यह भी हो सकता है कि सैन्य हस्तक्षेप शुरू करते समय विनम्रता से भी काम लिया जा सकता है.
युद्ध स्वाभाविक रूप से अप्रत्याशित होते हैं और उनके नतीजे और उनकी विरासत कई दशकों तक गूंजती रहती है.
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