ट्रंप की जीत के साथ ही ईरान का रियाल हुआ बेहाल, क्या कह रहे हैं ईरानी?

इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जीत मिली तो इसका सीधा असर ईरान पर पड़ा. बुधवार को ईरानी मुद्रा रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया.
कहा जा रहा है कि ये इसके संकेत हैं कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद ईरान की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. ईरान पहले से ही मध्य-पूर्व में कई मोर्चों पर उलझा हुआ है और भयानक आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है.
बुधवार को एक डॉलर के मुक़ाबले रियाल 703,000 पर पहुँच गया था. यह अपने आप में रियाल के गिरने का रिकॉर्ड है.
हालांकि बाद में थोड़ी स्थिति सुधरी और एक डॉलर के मुक़ाबले रियाल 696,150 पर पहुँचा. ईरान के केंद्रीय बैंक ने रेट को नियंत्रण में रखने के लिए मार्केट में पहले से ही ज़्यादा पैसे डाल दिए थे.

ईरानी मुद्रा पहले से ही दबाव में है. लेकिन ट्रंप के आने से मुश्किलें और बढ़ने की बात कही जा रही है.
समाचार एजेंसी एपी से ईरान के एक 22 साल के स्टूडेंट आमिर अगहाइन ने कहा,''यह सौ फ़ीसदी सच है कि ईरान पर ट्रंप प्रतिबंध और बढ़ाएंगे. जो चीज़ें हमारे पक्ष में नहीं हैं, उनका और बुरा हाल होगा. हमारी आर्थिक और सामाजिक स्थिति निश्चित तौर पर और बदहाल होगी. मुझे लग रहा है कि हमारे मुल्क को और गहरा झटका लगने जा रहा है.''
बदहाल ईरानी मुद्रा

इमेज स्रोत, Getty Images
2015 में अमेरिका से जब ईरान का परमाणु समझौता हुआ था तो एक डॉलर की क़ीमत 32 हज़ार रियाल थी.
इसी साल जुलाई में जब ईरान के सुधारवादी राष्ट्रपति मसूद पेज़श्कियान ने शपथ ली थी तब एक डॉलर की क़ीमत 584,000 रियाल थी.
2018 में ट्रंप ने एकतरफ़ा फ़ैसला लेते हुए ईरान से परमाणु समझौता तोड़ दिया था और तब से ईरान से तनाव कायम है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से माली हालत में है. ईरान ने परमाणु समझौते तोड़े जाने के बाद अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से आगे बढ़ाने की घोषणा कर दी थी.
ईरान दिखाने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिकी चुनावी नतीजे का कोई भी नकारात्मक असर उस पर नहीं पड़ा है.
पेज़श्कियान सरकार की प्रवक्ता फ़तेमह मोहजेरानी ने कहा, ''अमेरिकी चुनाव का असर ईरान पर कोई अलग से नहीं पड़ा है. ईरान और अमेरिकी नीतियों में निरंतरता है. ये नीतियां किसी के आने या जाने से बदलती नहीं हैं. हमने पहले से इनसे निपटने की तैयारी कर ली थी.''
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के 45 सालों बाद भी अमेरिका से संबंध सामान्य नहीं हो पाए हैं. ईरान में इस्लामिक क्रांति के पहले एक डॉलर के बदले महज़ 70 रियाल देने होते थे.
आशा और निराशा के बीच ईरानी लोग

इमेज स्रोत, Getty Images
ईरान के आम लोगों को भी अंदाज़ा है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से उनकी मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं.
लेकिन कई लोग उम्मीद भी जता रहे हैं कि देश में परिवर्तन होगा.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स से तेहरान में 42 साल की हाउस वाइफ ज़ोहरा ने कहा, ''मुझे ख़ुशी है कि ट्रंप की जीत हुई. मैं उम्मीद करती हूँ कि वह इस्लामिक रिपब्लिक पर अधिकतम दबाव डालेंगे और इस सरकार को सत्ता से हटने पर मजबूर करेंगे.''
ईरान के एक रिटायर टीचर हामिदरज़ा को लगता है कि ट्रंप की जीत से हालात और बिगड़ेंगे.
उन्होंने रॉयटर्स से कहा, ''ट्रंप की जीत से मैं निराश हूँ. उनकी जीत का मतलब है कि ईरान में और आर्थिक संकट बढ़ेगा. इसराल के साथ टकराव की आशंका और प्रबल होगी. मैं बहुत चिंतित हूँ.''
ट्रंप जब राष्ट्रपति थे तब भी और राष्ट्रपति नहीं थे तब भी ईरान को लेकर काफ़ी आक्रामक रहे हैं.
ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए ईरान पर कड़े से कड़े प्रतिबंध लगाए थे और ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी को भी अमेरिकी बलों ने ट्रंप के कार्यकाल में ही मारा था.
पिछले महीने अपने चुनावी कैंपेन में ट्रंप ने कहा था, ''जब मैं राष्ट्रपति था तो ईरान पूरी तरह से काबू में था. ईरान के पास पैसे नहीं थे और अमेरिका के साथ समझौते के लिए परेशान था.''
ईरान और अमेरिका की दुश्मनी

इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिका के साथ ईरान की दुश्मनी का पहला बीज 1953 में पड़ा जब अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान में तख़्तापलट करवा दिया.
निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक़ को सत्ता से हटाकर अमेरिका ने ईरान के शाह रज़ा पहलवी के हाथ में सत्ता सौंप दी थी.
इसकी मुख्य वजह थी तेल. धर्मनिरपेक्ष नीतियों में विश्वास रखने वाले ईरानी प्रधानमंत्री ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे. वो ईरानी शाह की ताक़त पर भी लगाम लगाना चाहते थे.
ये पहला मौक़ा था, जब अमरीका ने शांति के दौर में किसी विदेशी नेता को अपदस्थ किया था. कहा जाता है कि इस घटना के बाद एक तरह से तख़्तापलट अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमेरिका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा थी 1979 की ईरानी क्रांति.
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले ख़ुमैनी तुर्की, इराक़ और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे. ख़ुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमरीका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे.
ईरान में इस्लामिक क्रांति के परिणामों के तत्काल बाद ईरान और अमेरिका के राजनयिक संबंध ख़त्म हो गए थे.
तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह ने अमेरिकी दूतावास को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था.
कहा जाता है कि इसमें ख़ुमैनी का भी मौन समर्थन था. अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से इनकी मांग थी कि शाह को वापस भेजें. शाह न्यूयॉर्क में कैंसर का इलाज कराने गए थे.
बंधकों को तब तक रिहा नहीं किया गया जब तक रोनल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बन गए. आख़िरकार पहलवी की मिस्र में मौत हो गई और ख़ुमैनी ने अपनी ताक़त को और धर्म केंद्रित किया.
इन सबके बीच सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला बोल दिया.
ईरान और इराक़ के बीच आठ सालों तक ख़ूनी युद्ध चला. इस युद्ध में अमेरिका सद्दाम हुसैन के साथ था. यहां तक कि सोवियत यूनियन ने भी सद्दाम हुसैन की मदद की थी.
बाद में अमेरिका भी सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ हुआ और तब ईरान को यह अच्छा लगा था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















