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चीन से रिश्ते, ट्रंप का टैरिफ़ और बांग्लादेश-नेपाल के चुनाव: भारत के लिए क्या है चुनौती?
बीते साल वैश्विक राजनीति में एक ऐसे बदलाव के संकेत मिले, जिसने चली आ रही विश्व व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया. ऐसा महसूस हुआ कि दुनिया किसी नए अध्याय की ओर बढ़ रही है और नई संरचना गढ़ने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं.
ऐसे समय में भारत के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि बदलती दुनिया में उसकी भूमिका क्या है. क्या भारत केवल परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने वाला देश है, या फिर वह वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाला एक प्रभावशाली और सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है?
अगर भारत के पड़ोस से शुरुआत करें, तो 2026 में बांग्लादेश और नेपाल में होने वाले चुनाव महज़ आंतरिक राजनीति की घटनाएँ नहीं हैं. ये चुनाव दक्षिण एशिया की स्थिरता, भारत की सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से गहराई से जुड़े हुए हैं.
बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अपने पड़ोस में भरोसे, सहयोग और साझेदारी की नीति को मज़बूती से आगे बढ़ा पाएगा?
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दूसरी ओर यूक्रेन–रूस युद्ध अब केवल यूरोप तक सीमित संघर्ष नहीं रह गया है. यह युद्ध वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नैतिक मूल्यों की गंभीर परीक्षा बन चुका है.
भारत अब तक संवाद, संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चलता रहा है. लेकिन क्या यह संतुलन लंबे समय तक टिकाऊ साबित होगा, या किसी निर्णायक मोड़ पर भारत को स्पष्ट रूप से पक्ष चुनना पड़ेगा?
भारत एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करता रहा है यानी ऐसी दुनिया, जहाँ शक्ति कुछ गिने-चुने देशों के हाथों में सिमटी न रहे. लेकिन क्या बहुध्रुवीय विश्व केवल एक विचार है, या यह सचमुच हक़ीक़त का रूप ले सकता है?
इसी बहस के केंद्र में भारत–चीन संबंध भी हैं. एक ओर दोनों देशों के बीच गहरी आर्थिक परस्पर निर्भरता है, तो दूसरी ओर सीमा पर जारी तनाव और बढ़ता रणनीतिक अविश्वास. बातचीत के रास्ते खुले हैं, लेकिन भरोसे की कमी अब भी साफ़ दिखाई देती है.
आर्थिक मोर्चे पर भी भारत की विदेश नीति एक नए चरण में दाख़िल हो चुकी है. कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की पहल हो रही है. वहीं अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध संभावनाओं से भरे होने के बावजूद लगातार चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा की.
इन सवालों पर चर्चा के लिए इंडियन काउंसिल फ़ॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन्स की प्रोफ़ेसर अर्पिता मुखर्जी और लंदन से वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद शामिल हुए.
भारत और अमेरिका के रिश्ते
बीते साल की शुरुआत में जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर अपना दूसरा कार्यकाल संभाला, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे मुलाक़ात करने वाले शुरुआती चार वैश्विक नेताओं में शामिल थे. इस मुलाक़ात के दौरान ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना 'महान दोस्त' बताया था.
हालाँकि, बीते कुछ महीनों में राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नज़र नहीं आई है, जो ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अक्सर दिखाई देती थी.
इस बदले हुए माहौल के बीच ट्रंप प्रशासन ने भारत पर दो तरह के टैरिफ़ लगाए हैं. पहला व्यापारिक कारणों से और दूसरा रूस से तेल ख़रीदने को लेकर.
अमेरिका ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत का टैरिफ़ लगाया है, जो एशियाई क्षेत्र में किसी भी देश पर लगाया गया सबसे ऊँचा अमेरिकी टैरिफ़ है.
इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत का टैरिफ़ लगाया था. इसके बाद रूस से तेल ख़रीद जारी रखने पर नाराज़गी जताते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की घोषणा कर दी.
इसी पर इंडियन काउंसिल फ़ॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन्स की प्रोफ़ेसर अर्पिता मुखर्जी का कहना है कि इस साल सबसे अहम सवाल यही है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ते हैं.
वह कहती हैं, "इस साल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और अमेरिका का रिश्ता कैसे बनता है."
उनके मुताबिक़, भारत का यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता काफ़ी आगे बढ़ चुका है.
उन्होंने कहा, "ऑस्ट्रेलिया के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है, न्यूज़ीलैंड और ओमान के साथ समझौते हो चुके हैं और ब्रिटेन के साथ भी समझौता तय हो गया है"
प्रोफ़ेसर मुखर्जी का मानना है कि अगर ब्रिटेन के बाद यूरोपीय संघ और फिर अमेरिका के साथ भी व्यापार समझौता हो जाता है, तो इससे भारत को काफ़ी राहत मिल सकती है.
उनका कहना है, "अगर यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ ट्रेड एग्रीमेंट हो जाता है, तो इससे भारत के लिए थोड़ी स्थिरता आएगी."
प्रोफ़ेसर मुखर्जी ने कहा, "भारत के लिए जनवरी काफ़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दौरान यूरोपीय संघ का दौरा प्रस्तावित है. अगर उस वक्त कोई ट्रेड एग्रीमेंट आगे बढ़ता है, तो 2026 की शुरुआत अच्छी मानी जाएगी."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद का कहना है कि 2026 में राजनीतिक दृष्टि से भारत को सबसे ज़्यादा ध्यान अमेरिका के साथ अपने रिश्तों पर देना होगा.
उनके मुताबिक़, "रूस से तेल ख़रीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के रिश्तों में तनाव दिखा है."
इसके अलावा, वह भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "जब दोनों देशों के बीच कुछ दिनों का संघर्ष हुआ, तो भारत चाहता था कि उसके दोस्त खुलकर उसके साथ खड़े हों, लेकिन उस वक्त ऐसा नहीं हुआ."
ज़ुबैर अहमद का कहना है कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
उन्होंने कहा, "अगर भारत को अपने व्यापार को और बढ़ाना है, तो अमेरिका का साथ होना बेहद ज़रूरी है."
बांग्लादेश और नेपाल के चुनाव
नेपाल में आम चुनाव 5 मार्च 2026 को होने हैं, जबकि बांग्लादेश में आम चुनाव 12 फ़रवरी 2026 को कराए जाएंगे. दोनों ही देश भारत के पड़ोसी हैं और भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम माने जाते हैं.
हाल के वर्षों में इन दोनों देशों के साथ भारत के रिश्तों में पहले जैसी सहजता नहीं रही है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि चुनावों के बाद नेपाल और बांग्लादेश में नई सरकारें बनती हैं, तो क्या यह भारत के लिए अपने रिश्तों को नए सिरे से आगे बढ़ाने का मौक़ा साबित होगा?
और क्या भारत इन राजनीतिक बदलावों का इस्तेमाल करके भरोसा बहाल कर पाएगा और अपने पड़ोस के साथ संबंधों को फिर से मज़बूत कर सकेगा?
साथ ही पाकिस्तान के साथ हुए सैन्य संघर्ष के बाद क्या भारत के रिश्ते इस साल सुधर सकते हैं?
इस पर वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद का कहना है कि 2026 में पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद कम ही है.
उन्होंने कहा, "अगर पाकिस्तान के साथ 2026 में रिश्तों के सुधरने की बात करें, तो उसके कोई ख़ास आसार नहीं दिखते. जैसा ठंडा रिश्ता अभी है, वही आगे भी चलता रहेगा."
उनका कहना है कि इस मोर्चे पर भारत के लिए किसी नई पहल की ज़रूरत भी नहीं दिखती.
हालांकि ज़ुबैर अहमद के मुताबिक़, भारत के लिए बांग्लादेश में होने वाले चुनाव कहीं ज़्यादा अहम हैं. वह कहते हैं, "भारत के लिए बांग्लादेश का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है, ख़ास तौर पर वहां अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो रही घटनाओं को देखते हुए."
उनका मानना है कि चुनाव के बाद जो भी नई सरकार बने, भारत को उसके साथ रिश्ते मज़बूत करने की कोशिश करनी चाहिए.
शेख़ हसीना सरकार के दौर का ज़िक्र करते हुए ज़ुबैर अहमद कहते हैं कि उस समय दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी मज़बूत थे. लेकिन वह यह भी मानते हैं कि भारत से एक बड़ी रणनीतिक चूक हुई.
वह कहते हैं, "शेख़ हसीना के सत्ता में रहते हुए रिश्ते बहुत अच्छे थे, लेकिन हमारी ग़लती यह रही कि बीएनपी और विपक्षी दलों से हमने रिश्ते बनाने की कोशिश नहीं की.
उनके मुताबिक़, "बांग्लादेश जो कभी हमारा अच्छा पड़ोसी और दोस्त था, उसे हम कहीं न कहीं खो चुके हैं और अब उसे वापस लाना बहुत ज़रूरी है."
नेपाल के संदर्भ में ज़ुबैर अहमद का कहना है कि भारत-नेपाल संबंध हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं.
उनका कहना है कि नेपाल के साथ हमारे रिश्ते कभी अच्छे होते हैं और कभी बिगड़ जाते हैं.
उनका मानना है कि नेपाल की जनता के बीच भारत के ख़िलाफ़ जो असंतोष या नकारात्मक भावना है, उसे दूर करने की ज़िम्मेदारी भारत की है.
ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "भारत को कोशिश करनी चाहिए कि नेपाल में उसके ख़िलाफ़ जो हवा बनती रही है, उसे ख़त्म किया जाए."
भारत की रणनीति
प्रोफ़ेसर अर्पिता मुखर्जी का कहना है कि वैश्विक हालात चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति काफ़ी हद तक मज़बूत बनी हुई है.
वह कहती हैं, "इतने बुरे वैश्विक हालात के बावजूद भारत की ग्रोथ रेट अच्छी है, प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है और हम एक बहुत बड़ा बाज़ार हैं."
हालांकि, वह कहती हैं, "चीन की तरह हमारे पास सप्लाई चेन पर नियंत्रण नहीं है. हमारे पास ऐसा कोई हथियार नहीं है जिसे ट्रेड के ज़रिए इस्तेमाल किया जा सके. हाल में चीन ने अमेरिका के साथ जो किया, वैसा भारत नहीं कर सकता."
प्रोफ़ेसर मुखर्जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि भारत को अपनी विदेश और व्यापार नीति में विविधता बनाए रखनी होगी.
उन्होंने कहा, "हमें कई देशों के साथ रिश्ते बनाए रखने होंगे, ताकि किसी एक चीज़ के लिए हम किसी एक देश पर निर्भर न हों. अगर हम किसी एक देश पर निर्भर हो जाते हैं, तो वह हमारे लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है."
उनके मुताबिक़ भारत की कूटनीति की ताक़त उसके संतुलन में रही है.
वह बताती हैं, "भारत का रूस के साथ लंबे समय से अच्छा रिश्ता रहा है. साथ ही अमेरिका और चीन के साथ भी हमारे संबंध रहे हैं."
चीन को लेकर प्रोफ़ेसर मुखर्जी चेताती हैं कि उसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं है. वह कहती हैं, "चीन वैश्विक स्तर पर एक सुपरपावर बनता जा रहा है. क्रिटिकल मिनरल्स और हथियारों के क्षेत्र में उसकी भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता."
दक्षिण एशिया की स्थिरता पर बात करते हुए वह चीन की मौजूदगी को एक बड़ी चुनौती मानती हैं. उनका कहना है,"अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिरता देखें, तो चारों ओर चीन की मौजूदगी है. यही स्थिति हमें अस्थिर करती है."
रूस और अमेरिका के बीच संतुलन को लेकर उनका कहना है कि भारत के पास किसी एक को लेकर चलने का विकल्प नहीं है.
वह कहती हैं, "रूस और अमेरिका के मामले में ऐसा नहीं है कि भारत किसी एक तरफ़ पूरी तरह झुक सकता है."
अमेरिका की व्यापार नीति पर टिप्पणी करते हुए प्रोफ़ेसर मुखर्जी कहती हैं, "अगर अमेरिका के एजेंडे को देखें, तो वह 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' यानी 'मागा' है. इसी एजेंडे के तहत उसने लगभग सभी देशों पर टैरिफ़ लगाए."
उनके मुताबिक़, जब अमेरिका ने टैरिफ़ लगाए, तो उसने यह नहीं देखा कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन.
ट्रेड एग्रीमेंट के मौजूदा हालात पर बात करते हुए वह कहती हैं, "अगर अगस्त से पहले ट्रेड एग्रीमेंट हो जाता, तो शायद वह बहुत फायदेमंद नहीं होता, लेकिन डील फिर भी अच्छी होती."
वह कहती हैं, "अभी की स्थिति में हमारे एक्सपोर्टर्स को बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ है. लेकिन मार्च से पहले अमेरिका के साथ बातचीत करके टैरिफ़ कम कराना भारत के लिए काफ़ी ज़रूरी है."
भारत–चीन संबंध और ट्रंप का टैरिफ़
वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद का कहना है कि भारत को चीन के साथ अपने रिश्ते लंबे समय में मज़बूत और स्थिर बनाए रखने चाहिए.
वह कहते हैं, "भारत को चीन के साथ हमेशा अच्छे और मज़बूत रिश्ते रखने चाहिए. समस्या सिर्फ़ यह है कि ट्रेड बैलेंस हमारे ख़िलाफ़ जाता है." उनके मुताबिक़ भारत को इस दिशा में ज़्यादा सक्रिय होने की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "भारत को चीन से ज़्यादा मार्केट एक्सेस की मांग करनी चाहिए. अगर हमें बेहतर एक्सेस मिलेगा, तो इससे हमारे कारोबारियों को फ़ायदा होगा."
ज़ुबैर अहमद का मानना है कि भारत, चीन और रूस- तीनों बड़े वैश्विक खिलाड़ी हैं. वह कहते हैं, "अगर इसमें रूस भी शामिल हो जाए, तो जिस मल्टीपोलर वर्ल्ड की बात होती है, उसकी शुरुआत यहीं से हो सकती है."
हालांकि ज़ुबैर अहमद का कहना है कि मौजूदा दौर में किसी भी देश की विदेश नीति का एक बड़ा इम्तिहान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटने में है.
उनके कहना, "चाहे आप किसी भी साल की बात करें या कितनी भी नीतियाँ बना लें, इस वक्त आपको डोनाल्ड ट्रंप को मैनेज करना पड़ेगा. अगर आप उन्हें मैनेज नहीं कर पाए, तो आपकी विदेश नीति मुश्किल में पड़ सकती है."
उनके मुताबिक़, "अमेरिका की मौजूदा विदेश नीति पूरी तरह पर्सनैलिटी-ड्रिवन है."
वह याद दिलाते हैं कि जो बाइडन के राष्ट्रपति रहते हुए अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आगे बढ़ रहा था.
वह कहते हैं कि उस दौर में भारत भी उन देशों में शामिल था जो चीन के ख़िलाफ़ एक साझा मोर्चे का हिस्सा थे. इसमें यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत शामिल थे.
ज़ुबैर अहमद का कहना है, "जिस अमेरिका–पाकिस्तान रिश्ते को पहले बेहद ठंडा माना जाता था, वह अब बेहतर होता दिख रहा है. पाकिस्तानी सेना के फ़ील्ड मार्शल और प्रधानमंत्री को व्हाइट हाउस में जिस तरह से स्वागत मिला, उसने इस बदलाव के संकेत दिए हैं."
हालांकि वह यह भी साफ़ करते हैं कि यह स्थिति स्थायी नहीं है.
ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "यह सब अस्थायी है और सिर्फ़ तब तक रहेगा, जब तक ट्रंप सत्ता में हैं. उसके बाद इसकी कोई गारंटी नहीं है."
भारत की स्थिति को लेकर वह कहते हैं, "भारत अमेरिका का सहयोगी देश नहीं है, हमारा कोई औपचारिक अलायंस नहीं है. रूस के साथ भी हमारा अलायंस नहीं है. हम स्ट्रैटेजिक पार्टनर ज़रूर हैं." उनके मुताबिक़ यह रणनीतिक साझेदारी बाइडन के दौर में काफ़ी मज़बूत नज़र आई.
वह याद दिलाते हैं, "2023 में राष्ट्रपति बाइडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्टेट विज़िट का न्योता दिया था, जो बहुत कम वैश्विक नेताओं को मिलता है."
ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "चाहे प्रधानमंत्री मोदी हों या राष्ट्रपति शी जिनपिंग, सबके अपने ईगो हैं. लेकिन सबसे बड़ा ईगो राष्ट्रपति ट्रंप का है. सवाल यही है कि उस ईगो को कौन और कैसे मैनेज करता है. ब्रिटेन यह कर पाया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.