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न्यूयॉर्क में गूंजे नेहरू के बोल, ज़ोहरान ममदानी ने याद दिलाया मशहूर भाषण
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बुधवार को न्यूयॉर्क में एक उत्साहित भीड़ को संबोधित करते हुए नवनिर्वाचित मेयर ज़ोहरान ममदानी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि भारत की आज़ादी के मौक़े पर दिए गए भाषण का हवाला दिया.
ममदानी ने नेहरू के शब्दों को दोहराया, "इतिहास में ऐसा क्षण बहुत कम आता है जब हम पुराने से नए की ओर क़दम बढ़ाते हैं."
"जब एक युग समाप्त होता है और एक राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है. आज रात हम पुराने से नए की ओर क़दम बढ़ा रहे हैं."
जैसे ही ममदानी ने अपना भाषण ख़त्म किया, 2004 की बॉलीवुड हिट फ़िल्म 'धूम' का शीर्षक गीत पूरे हॉल में गूंज उठा. इसके बाद जे-ज़ी और एलिसिया कीज़ का 'एम्पायर स्टेट ऑफ़ माइंड' बजने लगा.
यह गीत अब नए अर्थों के साथ गूंज रहा था. न्यूयॉर्क के पहले भारतीय मूल के मेयर ने इतिहास रच दिया था.
कुछ महीने पहले, ममदानी ने बॉलीवुड को अपने चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाया था. ममदानी के लिए यह उनकी दक्षिण एशियाई जड़ों का प्रतीक था.
ज़ोहरान ममदानी की माँ फिल्म निर्माता मीरा नायर हैं, और उनके पिता महमूद ममदानी, युगांडा में जन्मे भारतीय मूल के विद्वान हैं.
इंस्टाग्राम पर उन्होंने हिंदी में रिकॉर्ड कई संदेश जारी किए, इनमें से अधिकतर में चर्चित बॉलीवुड फ़िल्मों के मज़ेदार दृश्यों और डायलॉग का इस्तेमाल किया गया है.
बुधवार को जीत के बाद दिए अपने भाषण में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का हवाला देना इस कड़ी का हिस्सा था.
ममदानी ने नेहरू की जिन पंक्तियों को उधार लिया, वे ऐतिहासिक हैं. दिल्ली के संविधान सभा हॉल में नेहरू ने भाषण की शुरुआत में जो शब्द बोले थे, वे कालजयी हैं.
"बहुत साल पहले हमने नियति से वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपने इस वादे को पूरा करें, पूरी तरह से या संपूर्ण रूप से नहीं, बल्कि बहुत हद तक निश्चित रूप से."
"आधी रात को, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के साथ जागेगा."
15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि से ठीक पहले, भारत दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के बाद आज़ाद होने वाला था.
जवाहरलाल नेहरू के इन शब्दों में उत्साह और गंभीरता दोनों थीं. इनमें ज़िम्मेदारी का वादा और एक राष्ट्र के अपनी आवाज़ पाने का एहसास भी शामिल था.
कई लोगों का मानना है कि नेहरू के भाषण से सहमति जताने के ज़रिए ममदानी ने यह संकेत दिया कि न्यूयॉर्क में कुछ नया और संभावित रूप से परिवर्तन लाने वाला काम शुरू हो गया है.
दशकों पहले, नेहरू अपने भाषण में एक राष्ट्र के पुनर्जन्म जैसी बड़ी घटना की ओर इशारा कर रहे थे.
नेहरू ने अपने भाषण में आगे कहा था कि आज़ादी अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत है. यह 'आराम या विश्राम की नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास की' शुरुआत है.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत की सेवा का अर्थ है ऐसे लाखों लोगों की सेवा करना जो पीड़ित हैं. इसका अर्थ है 'ग़रीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता' को समाप्त करना.
उन्होंने प्रतिज्ञा की कि भारत का कार्य तब तक पूरा नहीं होगा जब तक आँसू और पीड़ा बनी रहेगी.
उन्होंने 'छोटी-मोटी आलोचना' की जगह एकजुटता का आह्वान किया ताकि 'स्वतंत्र भारत के उस महान भवन का निर्माण किया जा सके जिसमें भारत के सभी बच्चे फल-फूल सकें.'
भारत के पहले प्रधानमंत्री का लगभग 1,600 शब्दों का यह भाषण इतिहास के सबसे प्रसिद्ध भाषणों में से एक माना जाता है.
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने उस समय लिखा था कि नेहरू ने 'अपने देशवासियों को अपनी वाक्पटुता से रोमांचित कर दिया था.'
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इसे 'भावनाओं और वाक्पटुता से भरपूर' भाषण बताया.
इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने एक साक्षात्कार में कहा कि 'यह भाषण आज भी भारत में गूंजता है क्योंकि इसने उस क्षण को उसी तरह व्यक्त किया था जैसे महान भाषणों में होता है.'
1947 की उस रात तीन मुख्य वक्ता थे.
पहले नेहरू ख़ुद थे, दूसरे चौधरी खलीक़ुज़्ज़मान और तीसरे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे.
लेकिन उस रात के सितारे बेशक नेहरू ही थे.
नेहरू के भाषण की पृष्ठभूमि बेहद दिलचस्प थी. टाइम पत्रिका ने बताया कि भारतीय नेता आधी रात से एक घंटा पहले संविधान सभा हॉल में इकट्ठा हुए थे.
सभा कक्ष 'भारत के नए तिरंगे झंडे के रंगों से जगमगा रहा था.'
टाइम पत्रिका ने नेहरू के भाषण को 'प्रेरणादायक' बताया. इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास का अद्भुत नाट्य मंचन था.
पत्रिका ने लिखा था, 'और जैसे ही आधी रात की बारहवीं घंटी बजी, भोर के पारंपरिक घोष की प्रतीक शंखध्वनि पूरे सदन में गूंज उठी. संविधान सभा के सदस्य खड़े हो गए. इस पवित्र क्षण में उन्होंने एक साथ भारत और उसके लोगों की सेवा का संकल्प लिया.'
संविधान सभा के हॉल के बाहर भारतीय ख़ुशी में झूम रहे थे.
अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में इतिहासकार रामचंद्र गुहा एक अमेरिकी पत्रकार की रिपोर्ट का हवाला देते हैं:
'हिंदू, मुसलमान और सिख एक साथ ख़ुशी से जश्न मना रहे थे... यह नए साल की पूर्व संध्या पर टाइम्स स्क्वायर जैसा नज़ारा था. भीड़ किसी से भी ज़्यादा नेहरू को चाहती थी.'
लेकिन आज़ादी के इस उत्साह के बीच अराजकता और हिंसा पहले से ही भड़क चुकी थी. पूरे उपमहाद्वीप में दंगे फैल गए थे.
दो दिन बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सरहदें तय कर दी गईं. इससे इतिहास के सबसे बड़े और रक्तरंजित पलायन की शुरुआत हुई.
डेढ़ करोड़ लोग नई सरहद के आर-पार चले गए. एक अनुमान के अनुसार, इनमें से दस लाख से अधिक लोग हिंसा में मारे गए.
उथल-पुथल के उस दौर में नेहरू के शब्द गूंज उठे — भारत के अधूरे वादे की याद दिलाते हुए और उस नेता की भी, जिसकी भाषा पर पकड़ उस लम्हे की अहमियत के अनुरूप थी.
नेहरू एक प्रखर वक्ता के रूप में पहले ही ख्याति प्राप्त कर चुके थे. वे राजनीति, विज्ञान, कला और नैतिकता जैसे विविध विषयों पर सहजता से भाषण देते थे.
ऑस्ट्रेलियाई राजनयिक वाल्टर क्रोकर ने कहा था कि नेहरू के भाषणों की व्यापकता और सहजता अद्वितीय थी.
अगस्त 1947 के अपने उस ऐतिहासिक भाषण को समाप्त करते हुए नेहरू ने कहा था:
"हमें आगे कड़ी मेहनत करनी है. हम तब तक आराम नहीं करेंगे जब तक हम अपना वचन पूरा नहीं कर लेते, जब तक हम हर भारतीय नागरिक को उस मुकाम तक नहीं पहुंचा देते, जहां पहुंचाने का इरादा नियति ने किया है."
सात दशक बाद, न्यूयॉर्क में ममदानी के सामने अपनी अलग चुनौतियां खड़ी हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.