सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी क़ब्रगाह, कभी हटेगा रहस्य से पर्दा?

खटिया गांव से 300 मीटर की दूरी पर है प्राचीन क़ब्रगाह

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वैज्ञानिकों ने भारत में एक ऐसी क़ब्रगाह का पता लगाया है, जो दुनिया की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक है. बीबीसी के संवाददाता सौतिक विश्वास ने इस क़ब्रगाह से मिले ऐसे सुरागों की पड़ताल की है, जिससे पता चलता है उस जमाने में प्राचीन भारतवासी किस तरह की ज़िन्दगी जीते थे और उनकी मौत कैसे होती थी.

वो साल था 2019 और इलाक़ा था गुजरात के कच्छ का. शहरी आबादी से दूर बेहद कम आबादी वाले इस गांव में जब वैज्ञानिक खुदाई के लिए पहुंचे, तब उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था यहां उन्हें ऐसी चीज़ मिलेगी, जो प्राचीन सभ्यता के बारे में सोचने का उनका नज़रिया बदल देगी.

वैज्ञानिकों के इस दल की अगुवाई कर रहे थे राजेश एस.वी, जो केरल यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद हैं. राजेश बताते हैं, "जब हम खुदाई कर रहे थे, तब हमें लगा था, कि ये कोई प्राचीन बस्ती है. एक सप्ताह बाद हमें पता चला- ये तो क़ब्रगाह है."

तब से लेकर अब तक कच्छ के इस गांव में खुदाई के तीन चरण पूरे हो चुके हैं. क़रीब 40 एकड़ के इलाक़े में हुई इस खुदाई में देश-विदेश के 150 से ज़्यादा वैज्ञानिक शामिल हुए. शोधकर्ताओं का मानना है कि यहां क़ब्रगाहों की तादाद 500 के क़रीब है, जिनमें से अब तक 200 की खुदाई हो चुकी है. इन क़ब्रगाहों का संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है.

दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से इस सभ्यता को हम हड़प्पा सभ्यता के नाम से जानते हैं. ये नाम सिंधु घाटी के पहले शहर हड़प्पा के नाम पर रखा गया था.

5300 साल पुरानी इस सभ्यता में मूल तौर पर किसान और कारोबारी हुआ करते थे. यहां के लोग चारदीवारी के बीच पक्की ईंटो से बने शहर में रहते थे. इस सभ्यता का मूल स्थान भारत के उत्तरी पश्चिमी हिस्से में है, जिसका कुछ हिस्सा अब पाकिस्तान में आता है.

हड़प्पा की पहली खुदाई से लेकर अब तक वैज्ञानिक भारत और पाकिस्तान में 2000 से ज़्यादा जगहों का पता लगा चुके हैं, जिनका संबंध इस सभ्यता से है.

खुदाई में मिला मानव कंकाल

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5200 साल पुरानी क़ब्रगाह का रहस्य

वैज्ञानिकों को गुजरात के खटिया गांव में जिस पैमाने पर क़ब्रगाहों का पता चला है, वो हड़प्पा सभ्यता का सबसे पुराना और सबसे बड़ा क़ब्रिस्तान साबित हो सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इनका इस्तेमाल 3200 ईसापूर्व से 2600 ईसापूर्व तक के बीच 500 साल तक हुआ. इस लिहाज़ से ये क़ब्रगाह 5200 साल पुरानी हुई.

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अब तक की खुदाई में यहां एक ऐसा मानव कंकाल मिला है, जो पूरी तरह जुड़ा हुआ है. इसमें कहीं कोई बिखराव नहीं. वैज्ञानिकों को इसके साथ संरक्षित की हुई मानव खोपड़ी भी मिली, जिसमें सिर की हड्डियां और दांत जस की तस हैं.

इन कंकालों के साथ वैज्ञानिकों को और भी कई हैरान करने वाली चीज़ें मिली, जिनका इस्तेमाल लोगों के दफ़नाने के वक्त किया जाता था. जैसे क़ब्रगाहों से मिली 100 से ज्यादा चूड़ियां, शंख से बने 27 मोती. इसके अलावा चीनी मिट्टी के बर्तन, थाली, कटोरी, घड़े, मिट्टी के बर्तन, पानी के गिलास , बोतल और जार भी यहां की खुदाई में मिले हैं.

खुदाई में जो खज़ाने मिले उसमें कीमती पत्थर माने जाने वाले ‘लैपिस लेजुली’ से बने मोती शामिल हैं.

इन क़ब्रगाहों की और भी ख़ासियतें हैं. जैसे बलुआ पत्थर से बने दफ़नाने वाले गड्ढे, जो अलग-अलग दिशाओं की तरफ संकेत करते हैं. इनमें कुछ की आकृति अंडाकार है तो कुछ की आयताकार.

यहां कुछ छोटी-छोटी क़ब्रें भी मिली, जिनमें बच्चों को दफ़नाया जाता था. तक़रीबन सारे शवों को लेटी हुई अवस्था में दफ़नाया जाता था. ज़्यादातर शवों की हड्डियां अम्लीय मिट्टी होने के कारण घुल चुकी हैं.

गुजरात के कच्छ जिले में रहस्यमयी 500 कब्रगाहें

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कितनी अहम है प्राचीन क़ब्रिस्तान की खोज?

इस खोज को ऑल्बियन कॉलेज, मिशिगन में मानवशास्त्र के प्रोफ़ेसर चेज़ ’बेहद अहम’ बताते हैं.

प्रोफ़ेसर चेज़ कहते हैं, "पूर्व-शहरी सभ्यता के क़ब्रगाह गुजरात में पहले भी मिले हैं, लेकिन ये उन सबके मुक़ाबले काफी बड़ा है. इसलिए इसमें उस दौर के क़ब्रों की विविधता को सामने लाने की ज्यादा संभावना है. इससे पुरातत्वशास्त्रियों को क्षेत्र के पूर्व-शहरी सभ्यता को पूरी तरह समझने में मदद मिलेगी. साथ ही इनसे पहले मिली छोटी क़ब्रों का असली संदर्भ समझने में भी मदद मिलेगी."

पाकिस्तान के पंजाब इलाक़े में पहले जो खुदाई हुई है, उनसे पहले ही कुछ अहम सुराग मिले हैं, जिनसे पता चलता है, सिंधु घाटी के लोग किस तरह से शवों को दफ़नाया करते थे.

सिंधु घाटी पर विस्कॉसिन मैडिसन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ जोनाथन मार्क केनोयर के मुताबिक़, "यहां दफ़नाने से पहले निकलने वाली शवयात्रा में कोई दिखावा नहीं होता था, जैसा कि मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में देखने को मिलता था. अगले जन्म को देखते हुए यहां शव के साथ कोई आभूषण या हथियार कुछ भी नहीं रखा जाता था."

बलुआ पत्थर से बनी क़ब्र की दीवारें

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जोनाथन ये भी कहते हैं कि "यहां ज़्यादातर शवों को कपड़े में लपेटकर लकड़ी से बने आयताकार ताबूत में रखा जाता था. ताबूत को क़ब्र में डालने से पहले गड्ढे में मिट्टी के बर्तन डाले जाते थे."

कुछ लोगों को उनके चूड़ी, मोती और तावीज़ जैसे निजी आभूषणों के साथ दफ़नाया जाता था. ऐसा तब होता था, जब इन्हें लेने वाला कोई नहीं होता था. कुछ महिलाओं को तांबे के बने आईने के साथ दफ़नाया जाता था. दफ़नाई गई कुछ महिलाओं के बाएं हाथ में शंख की चूड़ियां भी मिली हैं.

वयस्कों को अलग-अलग तरह के खाना खाने और खाना रखने वाले बरतनों के साथ दफ़नाया जाता था. नवजात शिशुओं और बच्चों को दफ़नाते समय शव के साथ कोई बर्तन और आभूषण नहीं रखे जाते थे.

क़ब्रों और शवों के अध्ययन से मृतकों की आर्थिक हालत और स्वास्थ्य की पुख़्ता जानकारी अभी तक नहीं मिलती. हालांकि कुछ संकेत ऐसे ज़रूर मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि "दफ़नाए गए लोग अच्छा खाते-पीते थे और स्वस्थ थे. हालांकि कुछ शवों से ऐसे संकेत मिले जिनसे पता चलता है ये ऑर्थराइटिस या कोई किसी और शारीरिक बीमारी के शिकार थे."

लेकिन गुजरात में मिले इस विस्तृत क़ब्रगाह के असली रहस्य से पर्दा उठना अभी बाक़ी है.

क़ब्रगाहों में मिले अलग-अलग तरह के मिट्टी के बर्तन

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साल 2016 तक लोग समझते थे भूतों का डेरा

वैज्ञानिकों के लिए तो इन क़ब्रगाहों का मिलना ही चौंकाने वाला था.

ये साल 2016 की बात है. उस साल केरल यूनिवर्सिटी में पुरातत्व शास्त्र पढ़ने वाले छात्र कच्छ के खटिया गांव के दौरे पर थे. उनकी गाड़ी खटिया गांव के मुखिया चला रहे थे. उन्होंने ही इन क़ब्रों के बारे में छात्रों की टीम को बताया था.

ये क़ब्रगाह खटिया गांव से मुश्किल से 300 मीटर की दूरी पर है. इस छोटे से गांव की आबादी 400 के क़रीब है. यहां के लोग ज़्यादातर मूंगफली, कपास और अरंडी की खेती करते हैं. इनमें से कुछ लोगों के खेत क़ब्रिस्तान से सटे हुए थे.

खटिया गांव के मुखिया रह चुके नारायण भाई जजानी बताते हैं, "बारिश के बाद हमें अक्सर ज़मीन के नीचे से ऊपर आए बर्तन के टुकड़े देखने को मिलते थे. गांव के कई लोगों ये मानते थे, कि यहां पहले भूत रहा करते थे. हमें इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि हम इतने बड़े क़ब्रिस्तान के बगल में रहते हैं."

नारायण भाई आगे कहते हैं, "अब हमारे गांव में पूरे साल देश दुनिया के वैज्ञानिकों का तांता लगा रहता है. ये लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि यहां दफ़नाए गए लोग असल में कौन हैं."

सिंधु घाटी सभ्यता युग के ऐसे 800 से ज्यादा केन्द्र गुजरात में मिले हैं.

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कभी सुलझेगा क़ब्रिस्तान का रहस्य?

जिस तरह एक ही जगह पर इतने सारे लोगों को दफ़नाए जाने का पता चला है, इससे इस क़ब्रगाह की अहमियत को लेकर भी कुछ सवाल भी खड़े होते हैं. मसलन, क्या ये आस-पास की बस्तियों का कोई सामुदायिक क़ब्रगाह थी या फिर ये यहां किसी बड़ी बस्ती के होने का सुराग है?

इसके अलावा यह भी हो सकता है कि ये ख़ानाबदोश यात्रियों के लिए एक पवित्र क़ब्रगाह हो, क्योंकि यहां की क़ब्रों में पाया जाने वाला क़ीमती पत्थर ‘लैपिस लैज़ुली’ यहां से हज़ारों मील दूर अफ़गानिस्तान में पाया जाता है. ये भी हो सकता है कि ये ऐसी क़ब्रगाह हो, जिसमें मृतक की हड्डियों को अलग से दफ़नाया जाता हो.

इन सवालों पर केरल यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद अभयन जीएस कहते हैं, "अभी तक हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं है. आसपास में हमें कोई बस्ती नहीं मिली है. हम खुदाई के जरिए अभी भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं."

विस्कॉसिन मैडिसन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ जोनाथन मार्क केनोयर कहते हैं, "मुझे पूरा भरोसा है, यहां कोई न कोई बस्ती ज़रूर मिलेग, जिसका संबंध इन क़ब्रगाहों से होगा. लेकिन एक संभावना ये भी है कि ये मौजूदा शहरों के नीचे दबे हों या जिन्हें अभी खोजना बाक़ी हो."

केनोयर मानते हैं कि, "जिस तरह क़ब्र की दीवारें पत्थरों से बनी हुई मिली हैं, इससे पता चलता है यहां के लोग पत्थरों से निर्माण करने की कला जानते थे. इस तरह पत्थरों से बने मकान और चारदीवारी वाली बस्तियां क़ब्रगाह से 19 से 30 किलोमीटर के दायरे में पाई जा सकती हैं."

यहां रहने और मृत पाए गए लोगों के बारे में सटीक जानकारी ज़्यादा से ज़्यादा रासायनिक अध्ययन और डीएनए जांच से ही मिलेगी.

अभी तक सिंधु घाटी सभ्यता का रहस्य बरक़रार है. मिसाल के तौर पर यहां की लेखन शैली, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है.

इस साल की सर्दियों में वैज्ञानिकों की योजना खटिया गांव के उत्तर में एक जगह की खुदाई करने की है. इसके ज़रिए वैज्ञानिक इस जगह के आसपास संभावित बस्ती की तलाश करेंगे. अगर इन्हें क़ामयाबी मिली तो हो सकता है कि ये पूरी पहेली सुलझ जाएगी. अगर नहीं, तब तक ये खुदाई जारी रहेगी.

खुदाई करने वाली टीम की अगुवाई करने वाले प्रोफे़सर राजेश कहते हैं, "एक न एक दिन हमें इन रहस्यों का जवाब ज़रूर मिलेगा."

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