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मध्य प्रदेश: लोकसभा चुनावों में भाजपा की आक्रामक 'रणनीति' कितनी कारगर होगी?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी
मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा की सीटों पर जो चुनाव शुरुआत में फ़ीका दिख रहा था वो अंतिम यानी चौथे चरण में आते-आते रोचक होता चला गया.
जानकार मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लिए जो एक 'आराम से जीती हुई बाज़ी' मानी जा रही थी वो कई सीटों पर संघर्ष में बदलती हुई दिखी.
इस बाज़ी में दांव मारने के लिए भारतीय जनता पार्टी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरी थी. इसकी शुरुआत नवंबर महीने में उसे विधानसभा के चुनावों में मिली प्रचंड जीत से हुई थी.
'सत्ता विरोधी' लहर के दावों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदों से बड़ी जीत दर्ज की और उसी के साथ-साथ उसने लोकसभा के चुनावों के लिए बिसात भी बिछानी शुरू कर दी थी.
इस क्रम में बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेताओं को संगठन में शामिल करने का दौर भी शुरू हुआ. विधायक से लेकर महापौर तक, और कांग्रेस के उम्मीदवार तक. एक-एक कर कांग्रेस के बड़े नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते चले गए. इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी का है.
'अति-आत्मविश्वास में आ गई है बीजेपी'
भारतीय जनता पार्टी के 'सोशल मीडिया ग्रुप' में हर रोज़ सुबह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की भाजपा में 'एंट्री' की तस्वीरें साझा की जाती रही हैं. इस काम के लिए संगठन ने राज्य के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के नेतृत्व में एक अलग प्रकोष्ठ भी बनाया. मिश्रा ने दावा भी किया था कि पूरे प्रदेश में 'एक लाख से भी ज़्यादा' कांग्रेस के बड़े नेताओं और छोटे कार्यकर्ताओं ने उनके संगठन का दामन थामा है.
ये क्रम नामांकन तक चलता रहा और इंदौर की सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार अक्षय कांति बम आख़िरी बड़े नेता थे जिन्होंने नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि को अपनी दावेदारी वापस ले ली और भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रमोद भार्गव कहते हैं, "ये सब कुछ कर के भारतीय जनता पार्टी अति आत्मविश्वास में आ गयी और उसने अतिवाद का सहारा ले लिया. ये एक तरह का अतिवाद ही है जो अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल के उम्मीदवारों और नेताओं को तोड़कर लाया गया ताकि विपक्ष को ख़त्म कर दिया जाए. इस का असर कांग्रेस पर देखने को मिला जो एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह दिखने लगी. लेकिन कांग्रेस को कई सीटों पर इसका लाभ मिलता हुआ दिखा."
छिंदवाड़ा से शुरू हुआ था भाजपा का अभियान
छिंदवाड़ा एक ऐसी सीट है जिसे भारतीय जनता पार्टी वर्ष 2014 में भी जीत नहीं पाई थी. ये सीट पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके परिवार का सबसे मज़बूत गढ़ रहा है.
पिछली लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी को 29 में से 28 सीटों पर जीत मिली थी सिवाय छिंदवाड़ा के जहां से कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ सांसद चुने गए थे.
यही वजह है कि भाजपा के अभियान का सबसे पहला पड़ाव छिंदवाड़ा ही था जहां पर उसने शहर के महापौर और कांग्रेस के विधायक को संगठन में शामिल कर लिया.
सवाल उठने लगे कि इस बार जिस तरह से लोकसभा की 29 सीटों पर मतदान का 'रुझान' देखने को मिला क्या उसका फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है? क्या इस बार 29 की 29 सीटें जीतने में भाजपा कामयाब रहेगी? इस सवाल पर विश्लेषकों की राय बंटी हुई है.
वो इसलिए क्योंकि इंदौर सीट से 1989 से लेकर 2014 तक चुनाव जीतने वाली पार्टी की वरिष्ठ नेता सुमित्रा महाजन ने इस पर अपनी बेबाक टिप्पणी कर पार्टी को चौंका दिया था. उन्होंने कहा था कि "भारतीय जनता पार्टी जो कर रही है उसकी आवश्यकता ही नहीं थी."
उनका कहना था कि लोकतंत्र में विपक्ष का होना भी बेहद ज़रूरी है.
वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता को लगता है कि हर दल चुनावों में अपनी अलग-अलग रणनीति बनाता है. इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत ही ऐसा किया है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब सुमित्रा महाजन सक्रिय राजनीति में थीं, तब के हालात अलग थे. अब चुनाव का दंगल भी बदल रहा है और चुनावी मुद्दे और रणनीति भी. इस बार भारतीय जनता पार्टी को अपने चुनावी या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए इस तरह की रणनीति बनानी पड़ी जो उसका अधिकार है."
उनका कहना था कि मध्य प्रदेश में कोई तीसरी राजनीतिक शक्ति नहीं है इसलिए मुख्य मुक़ाबला हमेशा से ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही रहा है. उनका ये भी कहना था कि कांग्रेस का जो मत प्रतिशत है उसमे सिर्फ़ एक या दो पर्तिशत का ही उतार चढ़ाव रहता है.
"यानी कांग्रेस के वोट बेस पर भारतीय जनता पार्टी वैसी सेंधमारी नहीं कर पा रही है. तमाम प्रयासों के बावजूद. इसलिए ही कांग्रेस के नेताओं को शामिल करने की उसने रणनीति बनायी है."
कुछ जानकार मानते हैं कि अगर भारतीय जनता पार्टी ने 'अति आत्मविश्वास' के साथ चुनावी रण की शुरुआत की थी तो कांग्रेस ने 'अल्हड़पन' से इसकी शुरुआत की. जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने एक एक बाद एक चुनावी सभाएं कीं, कांग्रेस के उम्मीदवार 'सिर्फ़ अपने भरोसे' चुनावी मैदान में थे.
हालांकि, बड़े नेताओं जैसे मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सचिन पायलट की सभाएं हुईं ज़रूर. मगर 29 सीटों के लिए कोई उतना ज़ोर लगाता नज़र नहीं आया.
प्रमोद भार्गव कहते हैं, "इक्का-दुक्का चुनावी सभाओं के अलावा, कांग्रेस का ना तो कोई दिल्ली का बड़ा नेता आया और ना ही राज्य का. क्योंकि दिग्विजय सिंह ख़ुद राजगढ़ की सीट से चुनाव लड़ रहे थे और कमलनाथ छिन्दवाड़ा की अपने बेटे की सीट बचाने के लिए जी जान से लगे हुए थे. इसलिए जिन सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार थे वो अपने बूते पर ही लड़ रहे थे."
दिग्विजय सिंह के चुनाव लड़ने का संदेश
भार्गव मानते हैं कि दिग्विजय सिंह का चुनाव लड़ना भी 'सुस्त और निराश' पड़ी हुई कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद रहा.
वो आगे कहते हैं, "दिग्विजय सिंह राजगढ़ से चुनाव जीतें या हारें वो अलग बात है. मगर इस उम्र में उनका चुनावी मैदान में उतरना कांग्रेस के लिए बहुत मायने रखता है. उनके चुनाव लड़ने से नेताओं और कार्यकर्ताओं में चुनाव को लेकर जिज्ञासा बढ़ी भी और उन्होंने इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा भी लिया जिससे कई सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों को संघर्ष का सामना करना पड़ा. हालांकि वो प्रचार करने दूसरी सीटों पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाए. मगर उनका मैदान में होना ही अपने आप में कांग्रेस में नई ऊर्जा फूंकने का काम कर रहा था."
विश्लेषकों को ये भी लगता है कि इंडिया गठबंधन के किसी भी बड़े नेता के ना आने के बावजूद कुछ सीटों पर कांग्रेस ने जिस तरह से उम्मीदवारों का चयन किया वो भी भारतीय जनता पार्टी की राह को कठिन बनाता चला गया.
जसविंदर सिंह मध्य प्रदेश की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य के सचिव हैं. दशकों से वो यहां की राजनीति पर नज़र रखते आ रहे हैं और उनका संगठन इसमें सक्रिय रूप से शामिल भी है. बीबीसी से चर्चा के दौरान वो कहते हैं कि पहले दो चरणों में मतदान का जो प्रतिशत कम हुआ उससे इस बात के संकेत आने लगे थे कि मूल भाजपा या संघ से जुड़े कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर कांग्रेस में की जा रही सेंधमारी से खुश नहीं थे. इस लिए वो कहते हैं कि मूल कार्यकर्ता मतदाताओं के बीच ज़्यादा सक्रिय नहीं नज़र आए.
मतदान के आंकड़े क्या कहते हैं?
इस बात पर संघ के विचार पर छपने वाले समाचार पत्र 'स्वदेश' में भी कई लेख छपे हैं. इनमें प्रमुख लेख संघ विचारक अतुल तारे का छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि वर्ष 2019 की तुलना में मतदान का प्रतिशत 7.5 तक घटना भारतीय जनता पार्टी के लिए 'अच्छा संदेश नहीं है.'
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में पहले और दूसरे चरण के मतदान की अगर 2019 से तुलना की जाए तो मतदान के प्रतिशत में 8 से 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी. हालांकि, बाद के दो चरणों में मतदान का रुझान बेहतर हुआ लेकिन पहले दो चरणों की गिरावट ने राजनीतिक दलों और ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों की चिंता बढ़ा दी है.
अतुल तारे आगे लिखते हैं, "बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति के असाधारण नायक हैं. पर संगठन को ये विचार करना होगा कि एक सीमा से अधिक, व्यक्ति केंद्रित होना संभव है? कभी-कभी ये तात्कालिक लाभ दे दे, मगर दीर्घ काल में उसके नुक़सान ही हैं."
उन्होंने ये भी लिखा है कि बिना किसी की पृष्ठभूमि की परवाह किए हुए उसे भाजपा में शामिल करने की होड़ कितनी नुकसानदेह होगी "ये तो पता नहीं पर भाजपा की आंतरिक शुचिता का स्वास्थ्य बेशक ख़राब कर रही है."
चौथे और अंतिम चरण में मतदान ठीक ठाक रहा लेकिन इंदौर में ये निराशाजनक ही था.
स्वदेश समाचार पत्र में विचारक जैराम शुक्ल का भी लेख छपा था जिसमे पहले चरण के मतदान के बाद घटते हुए प्रतिशत पर चिंता व्यक्त की गयी थी. इस लेख का शीर्षक था - "कम मतदान, कहीं नयी भर्ती (कांग्रेस से भाजपा में आये नेता) का साइड इफ़ेक्ट तो नहीं?"
'कांग्रेस खाली स्लेट की तरह उतरी थी'
जानकार ये भी मानते हैं कि बड़े पैमाने पर कार्यकर्ताओं के छोड़कर जाने की वजह से कांग्रेस ने हर सीट पर अलग रणनीति बनायी थी.
भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'सांध्य प्रकाश' के संपादक संजय सक्सेना कहते हैं कि कांग्रेस एक तरह से 'खाली स्लेट' लेकर मैदान में उतरी थी जबकि राजनीतिक विश्लेषक अनूप दत्ता कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को अपनी रणनीति की वजह से ही कुछ सीटों पर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
अनूप दत्ता और प्रमोद भार्गव को लगता है कि विधानसभा में प्रचंड जीत का सेहरा अगर भारतीय जनता पार्टी में किसी के सर पर बंधता है तो वो हैं शिवराज सिंह चौहान जिनकी 'अनदेखी' की गयी और उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया.
उन्हें लगता है कि विधानसभा के चुनावों में अगर कोई एक 'फैक्टर' भाजपा के पक्ष में बहुत मज़बूत था – वो था शिवराज सिंह चौहान की योजनाएं. इनमें लाडली बहना योजना भी शामिल है.
भार्गव कहते हैं, "हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदिशा की चुनावी सभा में घोषणा की थी कि शिवराज सिंह चौहान को दिल्ली में ज़िम्मेदारी दी जाएगी. मगर उनके समाज यानी किरार और धाकड़ समुदाय के लोगों में निराशा तो देखी गयी साथ ही वो महिलाएं जो विधानसभा के चुनावों में बढ़ चढ़ कर आगे आईं थीं, उनका रुझान कम दिखा."
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