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अर्दोआन का इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने का सपना पूरा हो पाएगा?
मानसी दाश
बीबीसी संवाददाता
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- रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने एक बार फिर जीता तुर्की का राष्ट्रपति चुनाव.
- 2014 से अब तक लगातार राष्ट्रपति रहे हैं.
- उससे पहले 2003 से लेकर 2014 तक प्रधानमंत्री रहेे.
- प्रधानमंत्री पद के लिए दोबारा उम्मीदवारी देने पर लगी रोक के बाद उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों में उतरने का फ़ैसला किया था.
- 2016 में हुई तख़्तापलट की कोशिश नाकाम करने के बाद उन पर अपने कई विरोधियों को जेल में डालने का आरोप.
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एक बार फिर चुनाव जीत कर अर्दोआन तुर्की के राष्ट्रपति बन गए हैं.
2003 में पहली बार प्रधानमंत्री और फिर 2014 में राष्ट्रपति बने अर्दोआन बीते 20 सालों से तुर्की की सत्ता पर काबिज़ रहे हैं.
जानकारों की मानें तो इस साल का राष्ट्रपति चुनाव उनके लिए बेहद मुश्किल था.
आलोचकों का कहना है कि उनकी कट्टरपंथी आर्थिक नीतियों के कारण देश में महंगाई आसमान छू रही है.
हाल में आए दो शक्तिशाली भूकंपों में हुए भारी नुक़सान के बाद भी उन पर देर में कार्रवाई करने का आरोप है.
इस भूकंप में 50 हज़ार से अधिक लोगों की जान गई थी.
इन चुनावों में पहली बार उनके ख़िलाफ़ विपक्ष लामबंद हुआ और कमाल कलचदारलू उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में मैदान में उतरे.
लेकिन दूसरे चरण में अर्दोआन को 52.2 फ़ीसदी वोट मिले और कलचदारलू को 47.8 फ़ीसदी मतों के साथ दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा.
यूरोप और मध्यपूर्व का ब्रिज
तुर्की के उत्तर में काला सागर है जिसके ज़रिए वो रूस, यूक्रेन, रोमानिया और बुल्गारिया से जुड़ा है.
वहीं दक्षिण में उसकी सीमा भूमध्यसागर पर ख़त्म होती है, जिसके दूसरे पार मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया है.
उसके दक्षिण में सीरिया और इसराइल है और उत्तर में उसकी सीमा उसे यूरोप से जोड़ती है.
तुर्की के उत्तर में काला सागर है जिसके ज़रिए वो रूस, यूक्रेन, रोमानिया और बुल्गारिया से जुड़ा है. वहीं दक्षिण में उसकी सीमा भूमध्यसागर पर ख़त्म होती है, जिसके दूसरे पार मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया है. उसके दक्षिण में सीरिया और इसराइल है.
यूरोप मामलों की बीबीसी संवाददाता कात्या एडलर के अनुसार तुर्की की अहम भोगौलिक स्थिति के कारण पश्चिमी देश उसे यूरोप और मध्यपूर्व के बीच के ब्रिज के तौर पर देखते रहे हैं.
हालांकि हाल के वक्त में, ख़ासकर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तुर्की का झुकाव रूस की तरफ बढ़ता दिखा है जिससे पश्चिमी मुल्कों और तुर्की के बीच भी तनाव पैदा हुआ है.
लेकिन मध्य पूर्व के साथ भी उसके रिश्ते हमेशा दोस्ताना रहे ऐसा नहीं है. बीते तीन दशक में उसके रिश्ते कइयों के साथ बिगड़े और कइयों की तरफ उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया.
तुर्की की स्थिति और अर्दोआन का रुख़
राजनीति में एंट्री लेने के बाद से अर्दोआन को देखें तो उनका झुकाव कभी सेकुलर, आधुनिक और थोड़ा बहुत गणतंत्रिक राष्ट्र की तरफ दिखता है.
लेकिन धीरे-धीरे उनका झुकाव इस्लामिक कट्टरवाद की तरफ होने लगा.
दो दशक पहले सरकारी सेवा में महिलाओं के हेडस्कार्फ़ पहनने को लेकर पाबंदी हटाने का पक्ष लेने वाले अर्दोआन सख्ती से इस्लामिक मूल्यों को लागू न करने का भी विरोध करते दिखे हैं.
हाल के सालों में उन्होंने कहा है कि "मुसलमान परिवारों को परिवार नियोजन नहीं अपनाना चाहिए."
उन्होंने फ़ेमिन्सटों की आलोचना करते हुए ये भी कहा कि महिला और पुरुष बराबर नहीं हो सकते.
जुलाई 2020 में ईसाई समुदाय को नाराज़ करते हुए उन्होंने इस्तांबुल की जानेमाने हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को मस्जिद बनाने की घोषणा की. कथैड्रल के रूप में बनाई गई इस इमारत को ऑटोमन साम्राज्य के तुर्कों ने इसे मस्जिद में कंवर्ट कर दिया था. बाद में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने इसे म्यूज़ियम बना दिया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो तुर्की नेटो का सदस्य है लेकिन उसे अब तक यूरोप में वो जगह नहीं मिल पाई है जिसकी उसे उम्मीद थी. वो यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहता है, लेकिन उसका ये सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है.
बीबीसी संवाददाता पॉल किर्बी कहते हैं कि नॉर्वे के नेटो में शामिल होने का उन्होंने काफी विरोध किया, लेकिन आख़िरकार उसके इस सैन्य गठबंधन में शामिल होने को लेकर स्वीकृति दे दी. लेकिन अमेरिका के दबाव के बावजूद भी स्वीडन को अब तक उन्होंने नेटो में शामिल होने से रोक रखा है.
रूस और यूक्रेन के बीच साल भर से अधिक वक्त से जारी युद्ध के कारण पैदा हुए अनाज संकट को सुलझाने में अर्दोआन ने अहम भूमिका निभाई.
संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में उन्होंने अनाज समझौता कराया और उसके जहाज़ों की सुरक्षा में यूक्रेन के बंदरगाहों से अनाज बाहर लाया गया.
राष्ट्रपति बनने के बाद अर्दोआन ने सबसे पहले जो काम किया वो है मिस्र के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते फिर से पूरी तरह बहाल करना.
बीबीसी संवाददाता माइक थॉम्पसन का कहना है कि मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अल-सीसी ने अर्दोआन को मुबारक देने के लिए फ़ोन किया तो उसके बाद अर्दोआन ने तुरंत फ़ैसला किया कि दोनों मुल्कों के बीच राजनयिक रिश्तों को फिर से बहाल किया जाएगा.
2013 में मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के तख़्तापलट के बाद दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते ख़त्म हो गए थे. बाद में दोनों के बीच भूमध्यसागरीय इलाक़े में कच्चा तेल निकालने में सीमा लांघने को लेकर विवाद तो रहा ही, लीबिया में दोनों ने विरोधी पक्षों का समर्थन किया था.
एक बार फिर से चुनाव जीतने के बाद क्या अर्दोआन तुर्की के अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को दोबारा परिभाषित करेंगे?
मध्यपूर्व में क्या बदलेगा रुख़?
डॉक्टर फज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स में सीनियर रिसर्च फेलो हैं और मध्यपूर्व मामलों के जानकार हैं. वो कहते हैं कि अर्दोआन की आगे की रणनीति समझने के लिए उनके इतिहास को देखा जाना ज़रूरी है.
वो समझाते हैं, "जिस तरह की राजनीति वो करते रहे हैं उसमें वो अपने मुल्क के पुराने इतिहास को हक़ीक़त बनाना चाहते थे जो. ऐसा करने के लिए उन्हें अरब दुनिया में अपने पैर सख्ती से जमाने थे और ख़ुद को मुसलमान मुल्कों का नेता बताना ज़रूरी था. लेकिन इससे वो पश्चिमी मुल्कों के विरोधी खेमे में खड़े दिख रहे थे."
उन्होंने क़रीब एक दशक तक इस्लाम, गणतंत्र और आर्थिक विकास की दिशा में काफी काम किया, लेकिन फिर अरब क्रांति के बाद उनकी राजनीति बदलने लगी.
डॉक्टर फज़्ज़ुर रहमान कहते हैं, "उस वक्त उन्होंने तुर्की में इस्लामिक गणतंत्र का एक नया मॉडल पेश करने की कोशिश की जिससे देश में बदलाव आया और अर्थव्यवस्था भी तेज़ी से आगे बढ़ी. उन्होंने अरब मुल्कों के सामने भी ये मॉडल पेश करने की कोशिश की. उन्होंने ट्यूनीशिया, लीबिया और मिस्र का दौरा किया. लेकिन इसका असर उल्टा पड़ा और अरब दुनिया के साथ उनके रिश्ते बिगड़ने लगे."
अरब स्प्रिंग के दौरान तुर्की ने चुप्पी साधे रखी.
सीरिया में उन्होंने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ और लीबिया में उनकी सेना ख़लीफ़ा हफ्तार के विद्रोही लड़ाकों से लड़ रही थी.
इस्तांबुल के सऊदी कॉन्सुलेट में जाने-माने सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद सऊदी अरब के साथ उनके रिश्ते बिगड़े. 2013 में मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के तख़्तापलट के बाद मिस्र के साथ उनके रिश्ते बिगड़े.
डॉक्टर फज़्ज़ुर रहमान कहते हैं, "उन्हें देश के भीतर काफी समर्थन मिला लेकिन 2018 आते-आते मध्यपूर्व में एक के बाद उसके हाथ से उसके दोस्त फिसलते गए और केवल क़तर उसका दोस्त रह गया था. इस वक्त तक देश की अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाने लगी और उनके लिए मुश्किलें बढ़ने लगीं क्योंकि उनके विरोधी अब मुखर होने लगे."
मध्यपूर्व के मुल्कों के साथ रहा लव-हेट का रिश्ता
बीते सालों में तुर्की अपनी पहचान को लेकर जूझता रहा है और अर्दोआन की राजनीति में इसका असर दिखा है.
सुजाता ऐश्वर्या दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में सेंटर ऑफ़ वेस्ट एशियन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर हैं.
वो कहती हैं कि बीते कुछ दशकों में मध्यपूर्व के साथ तुर्की के इतिहास का रिश्ता 'लव-हेट' का रहा है.
वो कहती हैं, "वो खुद को यूरोपीय हिस्सा के कम और मध्यपूर्व का हिस्सा अधिक मानता है. अर्दोआन और उनकी पार्टी की इच्छा थी कि तुर्की को इस इलाक़े में ऑटोमन साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रुप देखा जाए क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर तुर्की मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करता रहा है. तुर्की चाहता था कि अहम मुद्दों पर उसे मध्यपूर्व का नेतृत्व लेने वाले मुल्क के तौर पर देखा जाए. लेकिन कई मुद्दों पर उसने जिस तरह का स्टैंड लिया उससे उसके कई विरोधी खड़े हो गए, उसके लिए हालात पहले से अलग हो गए."
प्रोफ़ेसर सुजता कहती हैं, "सऊदी अरब के साथ तनाव के और कारण भी हैं. मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र मानी जाने वाली दो मस्जिदें सऊदी अरब में हैं. वो खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता है, और तेल उत्पादक देशों (ओपेक) का भी नेतृत्व करता है. ज़ाहिर है इसे लेकर सऊदी अरब के साथ उसका तनाव रहा."
सऊदी अरब के साथ उसके रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे. 2017 में क़तर पर सऊदी ने पाबंदी लगाई तो तुर्की उसके साथ खड़ा था, 2020 में सऊदी में तुर्की से आयात पर अनौपचारिक रोक लग गई. बीते साल अर्दोआन ने प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात की जिसके बाद दोनों मुल्कों के रिश्तों में तनाव थोड़ा कम हुआ.
2008 में सीरिया के बशर अल-असद से अर्दोआन की मुलाक़ात हुई, दोनों अच्छे मित्र थे. लेकिन बाद में दोनों के बीच तनाव बढ़ा. और तुर्की ने सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा जो मुख्य रूप से वहां के कुर्दों के ख़िलाफ़ था. उसका ये उद्देश्य पश्चिमी मुल्कों के उद्देश्य के साथ मेल खाता था.
इसके बाद पैदा हुए प्रवासी संकट को लेकर अर्दोआन के रिश्ते यूरोपीय मुल्कों के साथ बिगड़ने लगे. यूरोप जा रहे प्रवासियों को अपने यहां जगह देने को लेकर उन्होंने अपने नागरिकों के लिए यूरोपीय यूनियन के देशों में वीज़ा फ्री एंट्री की मांग की, जिससे जर्मनी और तुर्की के बीच तनाव बढ़ा.
वक्त की ज़रूरत
डॉक्टर फज़्ज़ुर रहमान कहते हैं "अर्दोआन ने अब फिर से अरब मुल्कों का रुख़ किया. वो शायद समझने लगे हैं कि उन्हें अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना है और दुनिया के इस इलाक़े में उन्हें अपने रिश्ते फिर से बेहतर बनाने हैं."
वो कहते हैं कि "उन्हें ये भी लग रहा है कि यूरोप में उन्हें जिस जगह की उम्मीद थी वो उन्हें मिल नहीं पाई है. ऐसे वक्त जब पूरे दुनिया की राजनीति बदल रही है और वो अलग-थलग नहीं रह सकते इसलिए उसे अरब मुल्कों और नॉन-अरब (रूस और चीन) के साथ अपने रिश्ते बेहतर करेगा. ये फिलहाल तुर्की की ज़रूरत है."
वहीं प्रोफ़ेसर सुजाता भी इस बात से इत्तफ़ाक़ रखती हैं.
वो कहती हैं, "2005-07 के बाद तुर्की और इस पूरे इलाक़े में जो जटिल स्थिति पैदा हुई है उसमें आप ये मान सकते हैं कि तुर्की अब आने वाले वक्त में मुद्दों पर व्यापक रणनीति रखने की बजाय पहले स्थिति को देखेगा. वो हालात के अनुसार अपनी रणनीति तय करेगा."
"मुझे लगता है कि आने वाले वक्त में वो कुर्दों के ख़िलाफ़ आक्रामक नीति तो अपनाएगा, लेकिन मध्यपूर्व में भी रिश्ते पहले बेहतर करेगा, हालांकि यहां उसके रिश्ते पहले की तरह जटिल बने रह सकते हैं. रही चीन और रूस की बात को हाल के वक्त में उसके रिश्ते दोनों के साथ बेहतर हुए हैं (तुर्की चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना में शामिल है, रूस के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते मज़बूत हैं)."
वो कहती हैं, "तुर्की आर्थिक मुश्किलों से जूझ ज़रूर रहा है लेकिन वो ख़ुद को दुनिया की एक बड़ी शक्ति के रूप में भी देखता है. इसलिए वो रूस-यूक्रेन जैसे मामलों में भी अपनी आवाज़ उठाता रहा है और ज़रूरत पड़ने पर अपनी जगह बनाई है. आने वाले वक्त में भी अपनी इस पहचान को बनाए रखने के लिए वो ऐसा करता रहेगा."
लेकिन जिस इस्लामिक कट्टरवाद का रास्ता अर्दोआन अपनाते रहे हैं उसका क्या होगा?
प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं कि दुनिया में कई तानाशाह अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए धर्म का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि देश के भीतर अर्दोआन ऐसा करना जारी रखेंगे.
वो कहती हैं, "लेकिन आप ये भूल नहीं सकते कि अगर 52 फीसदी लोग अर्दोआन का समर्थन करते हैं तो 48 फीसदी विपक्ष में भी हैं. आने वाले वक्त में वो अपनी स्थिति और मज़बूत करने के लिए धर्म का हाथ और मज़बूती से थामे रहेंगे. ऐसे में उनकी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा ये रहेगा कि वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पावरफुल मुल्क के तार पर अपनी छवि पेश करें और वैश्विक मामलों में अपनी आवाज़ उठाएं, अपने लिए अलग जगह बनाएं."
"तुर्की आर्थिक परेशानी से जूझ रहा है और आने वाले वक्त में इसमें स्थायित्व लाने में उलझा रहेगा लेकिन वो इस्लामिक रणनीति से दूरी नहीं बनाएंगे. अपनी यूरोपीय पहचान को वो ख़त्म तो नहीं करेंगे लेकिन उससे थोड़ी दूरी बनाने के कोशिश करेंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी मूल पहचान ऑटोमन साम्राज्य के उत्तराधिकारी की है. इसके लिए वो मध्यपूर्व में अपनी जगह बनाने की कोशिश जारी रखेंगे. वो कुर्दों के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया रखेंगे लेकिन उन्हें मुख्यधारा में भी जोड़ने की कोशिश करेंगे."
वहीं डॉक्टर फज़्ज़ुर रहमान कहते हैं "आर्थिक रूप से देखा जाए तो रूस यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ उसका व्यापार काफी बढ़ा है और दोनों की दोस्ती भी मज़बूत हुई है. रूस भी चाहता है कि मौजूदा वक्त में उसे तुर्की का समर्थन मिलता रहे. जब बीते साल पूरी दुनिया उर्जा संकट से जूझ रही थी पुतिन ने अर्दोआन से कहा कि वो तुर्की को गैस हब बनाना चाहते हैं."
वो कहते हैं "रही इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की बात तो वो सपना अब दूर-दूर तक कामयाब होता नहीं नज़र आ रहा. मुस्लिम दुनिया की राजनीति से ग्लोबल मुस्लिम कम्युनिटी का आइडिया ही अब धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है और इन मुल्कों में राष्ट्रवाद का मुद्दा अहम बनता जा रहा है. सऊदी अरब आधुनिकता की तरफ जा रहा है, क़तर, यूएई भी सामाजिक-आर्थिक बदलाव से गुज़र रहे हैं."
"अर्दोआन अब ये समझते हैं कि धर्म की उनकी राजनीति देश के भीतर तो काम करेगी लेकिन अरब दुनिया और वैश्विक राजनीति में उन्हें अपने व्यवसायिक हितों और अपनी पहचान को आगे करना होगा. आने वाले वक्त में यही उसकी ज़रूरत होगी."
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