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ओडिशा रेल दुर्घटना: एक शव, दो दावेदार, मृतकों की पहचान की तकलीफ़देह कोशिश
अमिताभ भट्टासाली
बीबीसी संवाददाता, बालासोर से
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- बालासोर रेल दुर्घटना में कई लोग अब भी लापता हैं.
- प्रशासन का कहना कि अब भी कई मृतकों की शिनाख़्त नहीं हो सकी है.
- परिजन अपनों को खोजने के लिए अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं
- पढ़िए कहानी दो परिवारों की जो अपने बच्चों की तलाश में भटक रहे हैं
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तफ़सीर अंसारी 16 साल के थे और उनके भाई तौसीफ़ उनसे तीन साल छोटे.
बालासोर के ज़िला अस्पताल में जब मोहम्मद निज़ामुद्दीन ने दोनों भाइयों की तस्वीर देखी तो उनके मुंह से निकल पड़ा, “यही तो हैं दोनों बच्चे.”
बिहार के रहने वाले ये दोनों भाई अपने पिता के साथ कोरोमंडल एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे थे.
इस ट्रेन के एक खड़ी हुई मालगाड़ी से टकराने और बाद में एक और ट्रेन के पटरी पर आ जाने से हुए भीषण हादसे में कम से कम 288 लोग मारे गए हैं.
ये 21वीं सदी में भारत में हुआ सबसे भीषण ट्रेन हादसा है.
अस्पताल की दीवार पर लगे एक प्रोजेक्टर पर तफ़सीर और तौसीफ़ के बुरी तरह से घायल चेहरों की तस्वीरें दिखाई जा रहीं थीं.
तफ़सीर की तस्वीर पर 20 नंबर अंकित था जबकि तौसीफ़ की तस्वीर पर 169.
लेकिन उनके पिता मोहम्मद भिकारी और सात साल की ज़ाहिदा को अभी तक कोई नंबर नहीं मिला है क्योंकि वो अभी भी लापता हैं. ज़ाहिदा अंसारी भाइयों से संबंधित नहीं है.
ज़ाहिदा अपनी मां शबनम बीवी के साथ कोरोमंडल एक्सप्रेस से हैदराबाद वापस जा रहीं थीं.
ज़ाहिदा के पिता सरफ़राज़ आंखों से आंसू पोंछते हुए कहते हैं, “मुझे अपनी पत्नी की लाश मिल गई. मैंने किसी तरह भुवनेश्वर में उसे दफ़न किया. अब मैं यहां अपनी बेटी को खोजने के लिए वापस लौटा हूं. ना ही वो यहां के किसी अस्पताल में भर्ती है और ना ही दीवार पर उसकी तस्वीर दिखाई जा रही है.”
अहमद बालासोर से क़रीब 1200 किलोमीटर दूर हैदराबाद के रहने वाले हैं. वो अपनी पत्नी के शव को वापस नहीं ले जा सके क्योंकि उन्हें अपनी बेटी ज़ाहिदा को खोजना था.
कुछ देर पहले वो एक लैपटॉप पर शवों की तस्वीरें देख रहे थे. लेकिन उनकी बेटी उनमें भी नहीं थी.
अहमद कहते हैं, “उनके पास वातानुकूलित डिब्बे के टिकट थे लेकिन वो वेटिंग थे इसलिए हमने स्लीपर कोच के भी दो टिकट ख़रीद लिए थे. मेरी पत्नी और बेटी कोरोमंडल एक्सप्रेस के एस-1 कोच में यात्रा कर रहे थे. उसने मुझे ट्रेन के भीतर से शाम क़रीब साढ़े पांच बजे कॉल की थी.”
इसके लगभग डेढ़ घंटा बाद ही हादसा हो गया था. कोरोमंडल एक्सप्रेस के जिन डिब्बों को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ उनमें एस-1 कोच भी शामिल था.
अहमद ने हादसे से कुछ वक़्त पहले अपने परिवार से फ़ोन पर बात की थी. लेकिन मोहम्मद भिकारी का परिवार ऐसा नहीं कर सका. हादसे की ख़बर के बाद उनके परिवार ने बार-बार फ़ोन किया लेकिन बात नहीं हो सकी.
उनके एक रिश्तेदार सवाल करते हैं, “हम पूरी रात फ़ोन करते रहे. शनिवार को किसी ने फ़ोन उठाया और कहा कि जिनका ये फ़ोन था, वो अब ज़िंदा नहीं है. दोबारा फ़ोन मत कीजिए. इसका मतलब ये था कि मोहम्मद भिकारी के शव के साथ ही उनका फ़ोन मिला था.”
बालासोर के अस्पताल में सिर्फ़ मारे गए लोगों की तस्वीरें ही परिजनों को पहचान के लिए दिखाई जा रही हैं. सभी अज्ञात शवों को राजधानी भुवनेश्वर भेज दिया गया है.
अपनों की पहचान की जद्दोजहद
मोहम्मद निज़ामुद्दीन और उनके परिवार के लोग अंसारी भाइयों का शव लेने के लिए भुवनेश्वर के लिए निकलने ही वाले थे कि एक अधिकारी ने अस्पताल में उन्हें रोका.
अधिकारी ने परिजनों से कहा, “शव संख्या बीस को पहले ही किसी और परिवार ने दावा करके ले लिया है.”
ये बड़े भाई तफ़सीर का शव था.
जिस परिवार ने शव संख्या बीस को अपना बताया था उसे तीन घंटे पहले भुवनेश्वर भेजा गया था.
तफ़सीर और तौसीफ़ के दादा निज़ामुद्दीन कहते हैं, “ये कैसे संभव है, क्या आपका मतलब ये है कि मैं अपने पोतों को ही नहीं पहचानूंगा.”
अधिकारी बुज़ुर्ग निज़ामुद्दीन को प्रक्रिया के बारे में समझाते हुए शांत करने की कोशिश करते हैं. वो कहते हैं, “कृपया भुवनेश्वर जाइये, हम आपको मुफ़्त यातायात देंगे. वहां जाकर नगर निगम के अधिकारियों से संपर्क कीजिए. वो आपका और दूसरे परिवार का दावा जांचेंगे और ज़रूरत पड़ेगी तो डीएनए टेस्ट करवाएंगे.”
निज़ामुद्दीन भुवनेश्वर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनके परिवार के सदस्य आलम भी साथ में हैं. वो बीबीसी से कहते हैं, “हमारा बच्चा मुसलमान हैं, ज़ाहिर है वो उसका खतना भी जांच सकते हैं. अगर फिर भी कुछ नहीं हुआ तो हम डीएनए टेस्ट करवा लेंगे.”
शव संख्या 20 के दावेदार
रिकॉर्ड के मुताबिक शव संख्या बीस को झारखंड के रहने वाले सुखलाल मरांडी के रूप में पहचाना गया है. बीस वर्षीय सुखलाल दुमका ज़िले के थे.
सुखलाल के परिवार के एक सदस्य बेटका मरांडी ने शव संख्या बीस की पहचान उनके रूप में की है.
मरांडी परिवार ने अधिकारियों को जो नंबर दिया था उस पर बीबीसी ने फ़ोन किया.
फ़ोन उठाने वाले अनिल मरांडी ने बताया कि उन्हें शव पर अंसारी परिवार के दावे के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
इसके बाद उन्होंने कहा, “हमने सिर्फ़ क्षत-विक्षत शव का चेहरा देखा था. हमने सोचा ये सुखलाल है. लेकिन ये भी संभव है कि हमसे ग़लती हुई हो. जब हम शव को देखेंगे तब पुष्टि कर सकेंगे.”
बालासोर में अस्पताल प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए एक शव पर कई दावों की स्थिति में प्रक्रिया क्या होगी ये समझाया.
वो कहती हैं, “जब दोनों परिवार भुवनेश्वर पहुंच जाएंगे, संबंधित शव को मोर्चुरी से बाहर लाया जाएगा. अधिकारियों की एक टीम मौजूद रहेगी. वो दावों को जाचेंगे. पहचान पत्र और अन्य दस्तावेज़ों को देखेंगे. अंत में, अगर ज़रूरत हुई, तो डीएनए टेस्ट कराया जाएगा.”
शव संख्या बीस किसका है ये अभी पता नहीं है. ज़ाहिदा और बुखारी क्या क्या हुआ ये भी किसी को नहीं पता है.