'मुझे सच में लगा था कि मैं मर जाऊंगी': कैंसर के इलाज की नई तकनीक से जगी उम्मीद

16 साल की एलिसा टैप्ले पहली मरीज़ हैं जिनका इस तरीक़े से इलाज किया गया
इमेज कैप्शन, 16 साल की एलिसा टैप्ले पहली मरीज़ हैं जिनका इस तरीक़े से इलाज किया गया
    • Author, जेम्स गैलाघर
    • पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

डॉक्टरों का कहना है कि एक नई इलाज पद्धति ने कुछ मरीज़ों में आक्रामक और लाइलाज ब्लड कैंसर को ख़त्म कर दिया है.

इस इलाज में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं के डीएनए में बेहद सटीक तरीके़ से बदलाव किया जाता है, ताकि उन्हें कैंसर से लड़ने वाली 'दवा' में बदला जा सके.

इस तरीक़े से जिस पहली मरीज़ का इलाज हुआ, वह अब बीमारी से पूरी तरह मुक्त है और अब कैंसर साइंटिस्ट बनने की योजना बना रही है. बता दें कि बीबीसी ने 2022 में इस लड़की से बात की थी.

अब इस पद्धति से आठ बच्चों और दो वयस्कों का इलाज किया गया है, जिन्हें टी-सेल एक्यूट लिम्फ़ोब्लास्टिक ल्यूकेमिया था. इनमें से 64% मरीज़ों में बीमारी कम हो गई है.

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टी-सेल्स शरीर के रक्षक माने जाते हैं, वे ख़तरों को ढूंढकर नष्ट करते हैं, लेकिन इस तरह के ल्यूकेमिया में ये कोशिकाएं नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं.

इस ट्रायल में शामिल लोगों पर कीमोथेरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट असफल हो चुके थे.

इसके अलावा प्रयोगात्मक दवा भी बेअसर रही थी. इनके पास अब सिर्फ़ एक विकल्प बचा था- मौत को थोड़ा आसान बनाना.

लेस्टर की रहने वाली 16 साल की एलिसा टैप्ले कहती हैं, "मुझे सच में लगा था कि मैं मर जाऊंगी और कभी बड़ी नहीं हो पाऊंगी. मैं कभी वे सब चीज़ें नहीं कर पाऊंगी जो हर बच्चे को करने का हक़ है."

वह दुनिया की पहली व्यक्ति थीं जिन्हें यह इलाज ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल में मिला. अब वह ज़िंदगी के मज़े ले रही हैं.

एलिसा अब ज़िंदगी के मज़े ले रही हैं
इमेज कैप्शन, एलिसा अब ए-लेवल की पढ़ाई कर रही हैं, ड्राइविंग सीखने की तैयारी कर रही हैं और अपने भविष्य की योजना बना रही हैं
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इस क्रांतिकारी इलाज के तहत तीन साल पहले एलिसा का पुराना इम्यून सिस्टम पूरी तरह मिटा दिया गया और नया बनाया गया.

वह चार महीने तक अस्पताल में रहीं और इस डर से अपने भाई से भी नहीं मिल सकीं कि कहीं उससे कोई इन्फ़ेक्शन न हो जाए.

लेकिन अब उनका कैंसर पूरी तरह ग़ायब हो गया है और उन्हें सिर्फ़ सालाना चेकअप की ज़रूरत पड़ती है. एलिसा अब ए-लेवल की पढ़ाई कर रही हैं, ड्राइविंग सीखने की तैयारी कर रही हैं और अपने भविष्य की योजना बना रही हैं.

वह कहती हैं, "मैं बायोमेडिकल साइंस में अप्रेंटिसशिप करने की सोच रही हूं, और उम्मीद है कि एक दिन मैं ब्लड कैंसर की रिसर्च के क्षेत्र में भी काम करूंगी."

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल की टीम ने एक तकनीक का इस्तेमाल किया जिसे 'बेस एडिटिंग' कहते हैं.

इसे ऐसे समझें...बेस जीवन की भाषाएं हैं.

चार तरह के बेस - एडेनिन (ए), साइटोसिन (सी), गुआनिन (जी) और थाइमिन (टी) - हमारे जेनेटिक कोड के निर्माण खंड हैं. जैसे अक्षर मिलकर शब्द बनाते हैं जिनका कोई अर्थ होता है, वैसे ही डीएनए में अरबों बेस हमारे शरीर की निर्देश पुस्तिका तैयार करते हैं.

बेस एडिटिंग वैज्ञानिकों को जेनेटिक कोड के किसी ख़ास हिस्से तक पहुंचने और सिर्फ़ एक बेस की संरचना बदलने को संभव बनाती है.

शोधकर्ताओं का लक्ष्य था कि स्वस्थ टी-सेल्स की प्राकृतिक ताकत का इस्तेमाल करके खतरों को ढूंढना और उन्हें ख़त्म करना. और उसी ताकत को टी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया से लड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाए.

लेकिन यह आसान काम नहीं था. शोधकर्ताओं को 'गुड' टी-सेल्स को इस तरह तैयार करना पड़ा कि वे बुरे टी-सेल्स को ढूंढकर मार सकें.

एलिसा बायोमेडिकल साइंस में अप्रेंटिसशिप करने की सोच रही हैं
इमेज कैप्शन, एलिसा बायोमेडिकल साइंस में अप्रेंटिसशिप करने की सोच रही हैं

उन्होंने एक डोनर से लिए गए स्वस्थ टी-सेल्स से शुरुआत की और उनमें बदलाव करने का काम शुरू किया. पहले बेस एडिट ने टी-सेल्स के टारगेटिंग मैकेनिज़्म को निष्क्रिय कर दिया ताकि वे मरीज़ के शरीर पर हमला न करें.

दूसरे एडिट ने एक रासायनिक निशान को हटा दिया है, जिसे सीडी7 (CD7) कहते हैं, जो सभी टी-सेल्स पर मौजूद होता है. इसे हटाना ज़रूरी है ताकि इलाज से मरीज़ के शरीर को नुक़सान ना हो.

तीसरे एडिट में एक तरह का 'अदृश्य कवच' तैयार किया गया, जो कोशिकाओं को कीमोथेरेपी की दवा से मारे जाने से बचाता है.

अंतिम चरण में जेनेटिक मॉडिफिकेशन से टी-सेल्स को यह निर्देश दिया गया कि वे ऐसी किसी भी चीज़ को खोजें और नष्ट कर दें जिस पर CD7 का निशान हो.

अब ये बदले हुए टी-सेल्स हर दूसरे टी-सेल को नष्ट कर देंगे, चाहे वह कैंसरग्रस्त हो या स्वस्थ, लेकिन वे एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे.

यह थेरेपी मरीज़ों को इंजेक्शन के ज़रिए दी जाती है. अगर चार हफ़्तों बाद कैंसर का कोई निशान नहीं मिलता, तो मरीज़ों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है ताकि उनका इम्यून सिस्टम फिर से विकसित हो सके.

यूसीएल और ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट के जुड़े प्रोफेसर वसीम क़ासिम कहते हैं, "कुछ साल पहले यह साइंस फ़िक्सन जैसा लगता था."

"हमें मूल रूप से पूरे इम्यून सिस्टम को तोड़ना पड़ता है…यह बेहद कठिन इलाज है. मरीज़ों को बहुत हिम्मत रखनी होती है, लेकिन अगर यह काम कर गया, तो बहुत कारगर होता है."

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में उन 11 मरीज़ों के इलाज के नतीजों के बारे में बताया गया है जिनका ट्रीटमेंट ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट और किंग्स कॉलेज हॉस्पिटल में किया गया.

इसमें बताया गया कि नौ मरीज़ों को बहुत राहत मिली, जिसके बाद उनका बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराया गया. इनमें से सात मरीज़ इलाज के बाद तीन महीने से लेकर तीन साल तक बीमारी से मुक्त हैं.

इस तरीके से इलाज के बाद संक्रमण होने का डर है, क्योंकि इसमें इम्यून सिस्टम पूरी तरह मिटा दिया जाता है.

दो मामलों में, कैंसर सेल्स ने अपने CD7 निशान खो दिए, जिसकी वजह से वह मॉडिफ़ाइड टी सेल्स से बच गए और शरीर में फिर से कैंसर लौट आया.

डॉक्टर रॉबर्ट चिएसा, ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल के बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग में हैं. वह कहते हैं, "जितने आक्रामक इस तरह के ल्यूकेमिया होते हैं उसे देखते हुए, ये नतीजे बेहद असाधारण हैं. और बेशक मुझे बहुत खुशी है कि हम उन मरीज़ों में उम्मीद जगा पाए, जिन्होंने इसे खो ही दिया था."

किंग्स की कंसल्टेंट हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर डेबोरा यालोप कहती हैं, "हमने ऐसे ल्यूकेमिया को ख़त्म करने में भी प्रभावशाली नतीजे देखे हैं, जो लाइलाज लग रहा था. यह बहुत शक्तिशाली तरीका है."

यूके स्टेम सेल चैरिटी एंथनी नोलन की सीनियर मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर तानिया डेक्सटर कहती हैं, "इन मरीज़ों के पास ट्रायल से पहले जीवित रहने की बहुत कम संभावना थी, इसलिए इन नतीजों से उम्मीद जगती है कि इलाज के ऐसे तरीके अभी और विकसित होंगे और ज़्यादा मरीज़ों को इनका फ़ायदा मिल सकेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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