पटना में गर्ल्स हॉस्टल के हालात : 'दिल्ली महंगा था, लेकिन यहां तो जान पर ही ख़तरा है'

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 13 मिनट

भय, असुरक्षा, भविष्य की चिंता और सालों से संजोए सपनों के टूटने का डर...

पटना के हॉस्टलों में रहने वाली लड़कियां आजकल इसी कश्मकश से गुज़र रही हैं.

बीती 11 जनवरी को पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली एक छात्रा की संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी. इस मौत की जांच की अनुशंसा सीबीआई से की गई है. लेकिन इस मौत ने पटना में हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा पर सवाल को केन्द्र में ला दिया है.

बीते डेढ़ दशक में पटना में हॉस्टल की संख्या में बहुत इज़ाफ़ा हुआ है. देश के कई नामचीन कोचिंग संस्थान की ब्रांच पटना में खुली, जिसके बाद राज्य के अंदरूनी इलाकों से छात्र-छात्राएं अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली जैसे बड़े शहर का रुख़ करने के बजाए पटना आने लगे. उनकी इस आमद के चलते बड़ी संख्या में पटना में हॉस्टल खासतौर पर गर्ल्स हॉस्टल खुले.

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बीबीसी ने पटना में हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं से बात की है. हमने इस बातचीत में हॉस्टल में रहने के दौरान होने वाली मुश्किलों, भविष्य के सपने और छात्रा की मौत के बाद उपजे डर की थाह लेने की कोशिश की है.

लड़कियों ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर हमसे बात की है. इस रिपोर्ट में सभी लड़कियों के नाम बदल दिए गए हैं.

'पटना में तो जीवन पर संकट है'

"दिल्ली बहुत महंगा पड़ रहा था तो क्या करते ? लेकिन पटना में तो जान पर ही संकट है."

तनीषा (बदला हुआ नाम) ठंडी आह भरकर जब यह बोली तो उनके शब्दों में डर की झलक थी.

21 साल की यह लड़की कुछ महीनों पहले ही दिल्ली से ग्रेजुएशन करके पटना आई है.

वह मूल रूप से बिहार के रोहतास ज़िले के एक गांव की रहने वाली है. मां आंगनबाड़ी सेविका है और पिता प्राइमरी स्कूल के टीचर.

सामान्य आर्थिक बैकग्राउंड से आने वाली तनीषा, तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी है.

पटना के हनुमाननगर इलाके के एक हॉस्टल में रहकर वह यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं.

शंभू गर्ल्स हॉस्टल में छात्रा की मौत के बाद क्या डर लगता है?

इस सवाल पर तनीषा बताती हैं, "अब तो कोई हॉस्टल के कमरे का दरवाज़ा भी खटखटाता है तो डर लगता है. पहले तो कमरे का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था लेकिन अब हमेशा बंद रखते हैं. ऐसा लगता है जाने कब कोई आ जाएगा. आप सोचिए एक इंसान अपने ही कमरे में कंफर्टेबल ज़ोन में नहीं है."

डर सिर्फ़ हॉस्टल में रहने वाली इन छात्राओं के भीतर ही नहीं है, बल्कि इनके माता, पिता, परिचित सब डर गए हैं.

तनीषा के माता-पिता भी अब दिन में कई-कई बार फ़ोन, ख़ासतौर पर वीडियो कॉल, करने लगे हैं.

वह बताती हैं, "पहले तो सुबह 10 बजे तक मम्मी का फ़ोन आता था. बल्कि मम्मी फ़ोन ही नहीं करती थी कि मेरी पढ़ाई में डिस्टर्ब होगा. लेकिन मम्मी इतना डर गई है कि रात में एक बजे भी अब फ़ोन कर देती है. उनको लगने लगा है कि पटना एकदम सुरक्षित नहीं है. पापा भी कई बार फ़ोन करते हैं और मैं अपने हर मूवमेंट की जानकारी उनको देती रहती हूं ताकि वह ज़्यादा परेशान न हों."

'पापा रोज़ाना 20-20 बार फ़ोन करते हैं'

अपनी बच्ची की सुरक्षा की चिंता करने वाले तनीषा के मां-बाप अकेले नहीं है.

मधुबनी की पिंकी के पापा तो उनको 20-20 बार फ़ोन करने लगे हैं.

साल 2023 से पटना में रह रही पिंकी के पापा किसान हैं और मां टीचर.

लड़कियों के लिए करियर बनाना कितना मुश्किल है इसका अंदाज़ा पिंकी की बातों से लग जाता है.

वह कहती हैं, "मधुबनी के एक गांव से पटना आना ही बहुत बड़ा स्ट्रगल है. मैं तो अपने पापा के चलते यहां तक पहुंच सकी. मेरे पापा चाहते हैं कि मैं गर्वनमेंट सर्विस में जाऊं लेकिन मेरे साथ वाली लड़कियां पढ़ नहीं पाईं. जो लड़की मेरे साथ दसवीं में थी, वह ग्यारहवीं में नहीं है. जो बारहवीं में थी वह ग्रेजुएशन में नहीं है. धीरे-धीरे सबकी शादी हो रही है. वह पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं."

इस घटना के बाद क्या हुआ?

इस सवाल पर पिंकी कहती हैं, "पापा 20-20 बार फोन करते हैं दिन में. पापा-मम्मी तो डर गए हैं बहुत ज़्यादा. मैं भी डर गई हूं. कोचिंग जाने से पहले, वापस हॉस्टल लौटने पर, कहीं बाहर जाने पर पापा को फोन करती हूं. मम्मी-पापा को डर है कि पटना में रहकर मेरे साथ भी कुछ न हो जाए. लड़की होने के बाद भी मुझे यहां भेजा गया. इसके बाद मेरे साथ कुछ हो जाता है तो मेरी ज़िंदगी खराब हो जाएगी. भले ही मैं विक्टिम हूं लेकिन समाज मुझे छोड़ेगा नहीं. मैं जी नहीं पाऊंगी नज़रें उठाकर."

कुछ ने मां बाप को मना लिया, कुछ वापस चली गईं.

तनीषा पटना के हनुमाननगर स्थित एक हॉस्टल में रहती हैं.

35 छात्राओं के रहने की व्यवस्था वाले उनके हॉस्टल में ज़्यादातर छात्राएं नीट की तैयारी कर रही हैं. नीट की तैयारी करने वाली ज़्यादातर छात्राएं 18 साल से कम उम्र की हैं.

वह बताती हैं, "उनके पैरेंट्स प्रेशर डाल रहे हैं वापस आने का. लेकिन बच्चियां इनकार कर रही हैं क्योंकि शिफ्टिंग में भी उनका समय लगेगा. नीट की परीक्षा करीब है. छात्राएं किसी तरह से अपने पैरेंट्स को मना रही हैं. वह जहां जाती हैं, वहां के बारे में अपने मम्मी-पापा को बताती हैं. अब मां-बाप कब तक मानेंगें, यह मालूम नहीं. लेकिन सोचिए लड़कियों को कितनी टेंशन है, किस ट्रॉमा से गुज़रना पड़ रहा है."

लेकिन हॉस्टल में रहने वाली सभी छात्राएं खुशकिस्मत नहीं है.

योगिता के हॉस्टल में रहने वाली बहुत सारी लड़कियों को वापस बुला लिया गया है.

दरभंगा से आई योगिता, अपने परिवार की पहली लड़की हैं जो पढ़ने के लिए पटना आई हैं. उनके पिता होम्योपैथी डॉक्टर हैं और वह प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रही हैं.

योगिता बताती हैं, "बहुत सारी छात्राओं को उनके मां-बाप ले गए हैं. वह कहते हैं कि लड़कियों को हॉस्टल भेजने से पहले ही गांव वाले कहते हैं कि लड़कियों को भेज तो रहे हो, कुछ हो जाएगा तो उसकी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी. पेरैंट्स भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उन पर भी दबाव है."

दड़बेनुमा कमरे, घटिया खाना, गंदगी

हॉस्टल में रहने वाली ये लड़कियां और उनके माता- पिता सिर्फ़ इस भय से ही नहीं गुज़र रहे. बल्कि अच्छा खान-पान, जरूरत पड़ने पर चिकित्सीय सुविधा और एक हवादार कमरा मिलना भी बड़ी चुनौती है.

पटना के ज़्यादातर हॉस्टल में कमरों का पार्टिशन प्लाईवुड से किया गया है. ये दड़बेनुमा कमरे हैं जिसमें हवा आने के लिए भी कोई रास्ता नहीं.

सेहत से खिलवाड़ करता खाना, हॉस्टल में अनियमित साफ़-सफ़ाई, छत पर जाने की मनाही, बीमार पड़ जाने पर भी ज़रूरी देखभाल न मिलना. यह ज़्यादातर हॉस्टलों का हाल है.

हॉस्टल के खाने के चलते पिंकी के पेट में संक्रमण हो चुका है.

वह बताती हैं, "शुरूआत में तो सारे हॉस्टल वाले बोलते हैं कि खाना अच्छा देंगे. लेकिन बाद में सब एक जैसे हो जाते हैं. खाने का मेन्यू रिपीट होता रहता है. कोई ऐसा खाना नहीं, जिसमें आलू नहीं हो. बहुत तेल वाला खाना मिलता है और ऐसा भी नहीं कि ऑयल किसी अच्छे ब्रांड का इस्तेमाल करते हों. कमरों की बात करें तो जिस लड़की के कमरे में छोटी सी भी खिड़की हो, वह खुश हो जाती है. गर्मी के मौसम में प्लाईवुड तपता है तो लगता है कि कहां भाग जाएं."

पटना का बोरिंग रोड इलाका पॉश माना जाता है. यहां पर कोचिंग संस्थान और गर्ल्स हॉस्टल अच्छी तादाद में हैं.

बोरिंग रोड में हॉस्टल में रहने वाली योगिता कहती हैं, "बोरिंग रोड सबसे अच्छा इलाका माना जाता है. लेकिन यहां के हॉस्टल में भी खाने का कोई ढंग नहीं, रहने का कोई ढंग नहीं, डिब्बे जैसे रूम. जब यह हालत बोरिंग रोड जैसे इलाके की है तो दूसरे इलाकों की बात क्या की जाए? ये लोग पैसा लेते हैं लेकिन इन पर कोई नियम-कानून लागू नहीं होता."

स्ट्रगल का कम वक़्त

पटना में हॉस्टल की बात करें तो गर्ल्स हॉस्टल तीन कैटेगरी के हैं.

पहला जो आर्थिक तौर पर कमजोर परिवारों से आने वाले स्टूडेंटस के लिए है. जिनका खान-पान, कमरा आदि सुविधाएं देकर किराया चार से आठ हजार प्रति माह होता है.

उसके बाद के हॉस्टल मिडिल क्लास परिवार से आने वाले स्टूडेंटट के लिए होते है जो हर माह 9 से 13 हज़ार तक का किराया दे सकते हैं.

तीसरी कैटेगरी वाले हॉस्टल में आर्थिक तौर पर समृद्धि परिवार वालों के बच्चे रहते हैं. इनमें किराया ज़्यादा होता है.

पटना में हॉस्टल खोलने के इच्छुक लोग किराए पर अपार्टमेंट या लीज़ पर घर लेते हैं.

अपार्टमेंट में पति-पत्नी यानी एक दंपति ही खाने बनाने से लेकर सुरक्षा तक की जिम्मेदारी संभालते हैं.

वहीं जो ज़्यादा पेशेवर तरीके से हॉस्टल चलाना चाहते हैं वह बाकायदा वार्डन, गार्ड, कुक आदि रखते हैं. साथ ही सीसीटीवी कैमरा आदि भी लगाया जाता है ताकि स्टूडेंटस के माता-पिता को भरोसा रहे.

लेकिन इस घटना के बाद पटना के हॉस्टल के साथ-साथ यहां रहने वाली लड़कियों पर भी सवाल उठने लगे हैं.

पहले ही समाज का एक तबका इन हॉस्टल और यहां की गतिविधियों को शक की नज़र से देखता था. लेकिन अब यह शक ज़्यादा गहरा गया है.

इस संदेहास्पद नज़रों से परेशान योगिता कहती हैं, "इस तरह की घटनाएं होती है तो पैरेंट्स का माइंडसेट चेंज होता है. उनको लगता है हम हॉस्टल में अफ़ेयर, सेक्स ट्रेड जैसी चीज़ों में फंसे हुए हैं. कई बार लड़कियों को अपने सपने पूरे किए बिना घर लौटना पड़ता है. वैसे भी आप देखिए तो लड़कियों के पास करियर में स्ट्रगल करने का भी कितना कम समय है. लड़का 30 साल का भी है तो जब तक उसका जॉब नहीं होता, उसकी शादी नहीं होती. लेकिन लड़कियों को तो परिवार साल-दो साल के लिए हॉस्टल भेजता है. वह सफ़ल हो गई तो ठीक, नहीं हुई तो उसकी शादी हो जाएगी."

'बेटी बचेगी ही नहीं तो पढ़ेगी क्या?'

शंभू गर्ल्स हॉस्टल में छात्रा की संदिग्ध मौत के बाद पटना पुलिस ने इसे शुरुआती जांच में आत्महत्या का मामला बताया था.

लेकिन बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई जिसमें लिखा था कि छात्रा के शरीर पर जगह-जगह ज़ख़्म हैं और उसके साथ यौन हिंसा से इनकार नहीं किया जा सकता.

इस रिपोर्ट के बाद इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सेकेंड ओपिनियन के लिए पटना एम्स भेजा गया.

पटना एम्स ने इस मामले में अब तक कोई ओपिनियन नहीं दिया है वहीं एसआईटी भी इस मामले में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई.

जिसके बाद इस मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा बिहार सरकार ने की है.

इस मामले में पटना पुलिस के लापरवाह रवैये ने हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं को परेशान कर दिया है.

तनीषा सरकार के स्लोगन 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का ज़िक्र करते हुए कहती हैं, "बेटी बचेगी ही नहीं तो पढ़ेगी कौन. आजकल तो हम लोग बहुत देख रहे हैं कि रेपिस्ट को जमानत मिल जा रही है और सांइटिस्ट जेल में है. लड़कियों को अपनी सेफ़्टी पर ध्यान देना चाहिए. यहां कोई सरकार नहीं आएगी. कैंडल मार्च करने सभी आ जाएंगे."

वहीं प्रशासनिक अधिकार बनने का सपना आंखों में संजोए योगिता कहती हैं, "अभी जो देखने को मिला, उससे मैं निराश हूं. मैं सच में अंदर से परेशान हूं कि लोग इतनी मेहनत करके अधिकारी बनते हैं. सरकार उनको सुविधा देती है और किसी मां-बाप के बच्चे के मर जाने पर वह गलत रिपोर्ट देते हैं."

वह जिंदा रहती तो यह मामला सामने ही नहीं आता

लेकिन हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं को इस तरह की हिंसा से अक्सर गुज़रना पड़ता है.

हॉस्टल में रहने वाली छात्राएं कहती हैं कि उनके हॉस्टल में रहने के चलते, अन्य लड़कियों के मुकाबले उनके साथ ज़्यादा हिंसा होती है.

कई बार इस यौन हिंसा को झेल चुकी पिंकी बीबीसी से कहती हैं, "यह तो हमारा रोज का है. रोड पर चल रहे हो तो कमेंट सुनने को मिल ही जाता है. महिला होने के नाते हमें यह सब सहना होगा. और हम पर कमेंट करने वाले लोग कभी ग़लत नहीं होंगे. ग़लत तो हम होते हैं, हमारे कपड़े होते हैं. वह लड़की (मृतक छात्रा) ज़िंदा रहती तो उसका मामला सामने ही नहीं आता. उसको न्याय नहीं मिल पाता. और अब भी लोग उसके मरने के बाद उसी को जज कर रहे हैं."

इस घटना के बाद पटना प्रशासन शहर में खुले गर्ल्स हॉस्टल का सर्वे करा रहा है.

वहीं पटना हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है कि क्या प्राइवेट हॉस्टलों में सुरक्षा, भोजन और साफ़-सफ़ाई से जुड़ी निगरानी के लिए कोई रेग्यूलेटरी बॉडी है?

हॉस्टल को लेकर दिशा-निर्देश

पटना हाईकोर्ट के इस जवाब तलब के बाद 4 फरवरी को बिहार सरकार ने गर्ल्स हॉस्टल और लॉज के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं.

इन दिशा निर्देशों के तहत सभी गर्ल्स हॉस्टल और लॉज को स्थानीय थाने में पंजीकरण कराना ज़रूरी होगा.

हॉस्टल में 24 घंटे महिला वार्डन की नियुक्ति अनिवार्य होगी. साथ ही वार्डन, गार्ड, रसोइया और सफाईकर्मी सहित सभी कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन ज़रूरी होगा.

हॉस्टल में सीसीटीवी कैमरा लगाना होगा. कमरे के जिस हिस्से में छात्राएं रहती हैं वहां पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित होगा. सीसीटीवी कैमरे की रिकार्डिंग कम से कम 30 दिन तक सुरक्षित रखना होगी.

हॉस्टल की साफ़-सफ़ाई, खिड़कियों में लोहे की जाली, आने-जाने वाले व्यक्ति का नाम उसके आधार नंबर के साथ रजिस्टर में मेंटेन करना होगा.

सरकार की ओर से जारी ये दिशा-निर्देश क्या हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं का आत्मविश्वास वापस लौटा पाएगीं?

इस सवाल पर पिंकी कहती हैं, "मन भर गया पटना से. नौकरी लग जाए तो पटना दोबारा नहीं आएंगे. अब पटना अच्छा नहीं लगता."

आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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