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इसराइल-हमास की जंग में क्या भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को झटका लगेगा?
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क़रीब एक महीने पहले जी20 शिखर सम्मेलन के मौक़े पर घोषित भारत, मध्य-पूर्व और यूरोप के बीच एक आर्थिक कॉरिडोर बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना अब इसराइल-हमास संकट की वजह से अनिश्चितता से घिर गई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि आईएमईसी आने वाले सैकड़ों वर्षों के लिए विश्व व्यापार का आधार बनने जा रहा है. इतिहास हमेशा याद रखेगा कि इस कॉरिडोर की शुरुआत भारतीय धरती पर हुई थी.
पिछले कुछ वक़्त से ये माना जा रहा था कि अमेरिका की कोशिशों से इसराइल और सऊदी अरब अपने रिश्तों को ठीक करने के काफ़ी क़रीब थे और इन सुधरते रिश्तों की वजह से ही दोनों देशों ने आईएमईसी प्रोजेक्ट में हिस्सा लेने का फ़ैसला किया था.
लेकिन इसराइल और हमास के बीच छिड़े संघर्ष के बाद ये माना जा रहा है कि सऊदी अरब और पूरे अरब जगत में इसराइल के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों पर अब पूर्ण विराम लग जाएगा क्योंकि अरब देशों में लोकप्रिय समर्थन गज़ा के साथ है.
क्या है इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर
इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईसी) की कल्पना एक ऐसे आर्थिक कॉरिडोर के रूप में की गई है, जिसका मक़सद एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच समुद्र, रेल और सड़क की कनेक्टिविटी बढ़ाकर सामान की आवाजाही के लिए एक नया रास्ता तैयार करना है.
प्रस्तावित कॉरिडोर भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इसराइल और ग्रीस से गुज़रेगा.
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ आईएमईसी में दो अलग-अलग कॉरिडोर शामिल होंगे. पूर्वी कॉरिडोर भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ेगा और उत्तरी गलियारा अरब की खाड़ी को यूरोप से जोड़ेगा.
इस कॉरिडोर में एक रेल लाइन बनाई जाएगी, जिसके बनने के बाद मौजूदा समुद्री और सड़क परिवहन मार्गों के अलावा के नया विश्वसनीय नेटवर्क बनेगा. इससे परिवहन की लागत में कमी आएगी और इस प्रोजेक्ट में शामिल देशों को फ़ायदा होगा.
आईएमईसी प्रोजेक्ट में रेलवे मार्ग के साथ-साथ इन देशों का इरादा बिजली और डिज़िटल कनेक्टिविटी के लिए केबल बिछाने और स्वच्छ हाइड्रोज़न निर्यात के लिए पाइप लाइन बिछाने का है.
इन देशों ने इस कॉरिडोर से जुड़े जिस मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग पर दस्तख़त किए हैं, उसके मुताबिक़ ये कॉरिडोर क्षेत्रीय सप्लाई चेन्स को सुरक्षित करेगा, व्यापार पहुंच बढ़ाएगा और व्यापार सुविधा में सुधार करेगा.
इस प्रोजेक्ट से जुड़े देशों का मानना है कि ये कॉरिडोर परिवहन की लागत कम करेगा, आर्थिक एकता बढ़ाएगा, नौकरियां पैदा करेगा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करेगा.
भारत के जी-20 शेरपा अमिताभ कांत ने 'द इकोनॉमिक टाइम्स' अख़बार को बताया कि ये प्रोजेक्ट बड़े पैमाने पर व्यापार के उन अवसरों को अनलॉक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा जो कनेक्टिविटी मुद्दों के कारण गायब थे.
उन्होंने कहा कि ये कॉरिडोर प्रमुख वाणिज्यिक केंद्रों को जोड़ेगा, स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन और निर्यात को सक्षम करेगा और पावर ग्रिड एवं दूरसंचार नेटवर्क का विस्तार करेगा.
एक बार परियोजना पूरी हो जाने पर यूरोप में भारतीय निर्यातकों को समय और लागत दोनों के मामले में फ़ायदा होने की संभावना है.
'इसराइल का संकट इस प्रोजेक्ट के लिए झटका'
अनिल त्रिगुणायत जॉर्डन और लीबिया में भारत के राजदूत के रूप में काम कर चुके हैं. उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय के वेस्ट एशिया डिविज़न में भी काम किया है.
वे कहते हैं कि इसराइल और हमास के बीच हो रहा "मौजूदा संघर्ष निश्चित रूप से आईएमईसी (IMEC) के लिए एक झटका होगा".
त्रिगुणायत कहते हैं, "मैंने पहले भी कहा है कि इस कॉरिडोर की सफलता फ़लस्तीनी मुद्दे के समाधान पर निर्भर करेगी और अब वो बात सच हो रही है. खाड़ी देशों का नेतृत्व अक्सर ज़मीनी भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर देता है. दुर्भाग्य से हमास की ये कार्रवाई चाहे कितनी भी बर्बर क्यों न हो उसने अरब स्ट्रीट में फिर से नई जान फूँक दी है. इसका मतलब यह है कि अरब देशों की ये सरकारें इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने के लिए एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं ले पाएंगी."
त्रिगुणायत के मुताबिक़ वैसे भी इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में कम से कम एक दशक का वक़्त लगना था.
वह कहते हैं, "मौजूदा हालत की वजह से इस प्रोजेक्ट पर निकट भविष्य में मुझे कोई ख़ास काम होता नहीं दिख रहा है."
क्या है हमास के हमले का मकसद?
अनिल त्रिगुणायत कहते हैं कि इस हमले के पीछे हमास का सबसे बड़ा मक़सद सऊदी अरब और इसराइल के बीच रिश्तों को सामान्य होने से रोकना ही होगा.
वह कहते हैं, "अगर सऊदी सरब इसराइल के साथ रिश्ते ठीक कर लेगा तो फ़लस्तीन के मुद्दे का क्या होगा, ये बात हमास ने ज़रूर सोची होगी. इस हमले की वजह से न सिर्फ़ आईएमईसी बल्कि हर उस चीज़ को झटका लगेगा, जहाँ सऊदी अरब और इसराइल एक साथ शामिल हैं."
इंडिया मिडिल ईस्ट कॉरिडोर को एक गेम-चेंजर बताते हुए पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत सिन्हा का कहना है कि मध्य-पूर्व के सभी देशों के साथ अच्छे रिश्तों की ज़रूरत है ताकि इस कॉरिडोर जैसी पहल शुरू की जा सके जिससे इसी जुड़ने वाले सभी देशों को स्थायी समृद्धि मिलेगी.
'इंडिया टुडे' चैनल से जयंत सिन्हा ने कहा, "यही वजह है कि यह युद्ध का युग नहीं है, यह युग सहयोग का है. ये व्यापार और आर्थिक विकास का युग है और सभी लोगों के लिए समृद्धि सुनिश्चित करने का युग है. अगर हम उस तरह से सहयोग कर सकते हैं और अगर हम एक साथ काम कर सकते हैं, तो हम हर किसी की मदद कर सकते हैं - चाहे वो इसराइली हों, फ़लस्तीनी हों, सऊदी हों या ईरानी हों."
'प्रोजेक्ट बाधित हो सकता है ख़त्म नहीं'
डॉ प्रेम आनंद मिश्र जामिया मिल्लिया इस्लामिया के नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉनफ़्लिक्ट रेज़ोल्यूशन में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.
उनका कहना है कि इसराइल और हमास के बीच जिस तरह का संघर्ष हो रहा है, उसकी वजह से आईएमईसी जैसे प्रोजेक्ट बाधित ज़रूर हो सकते हैं लेकिन ख़त्म नहीं हो सकते.
वे कहते हैं, "हो सकता है कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में ज़्यादा वक़्त लगे क्योंकि और मुद्दे हावी हो सकते हैं और हो सकता है कि इस प्रोजेक्ट को कुछ वक़्त के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए. लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट्स को लेकर एक सामूहिक प्रतिबद्धता होती है तो यह बाधित हो सकता है, लेकिन ख़त्म नहीं."
डॉ मिश्रा कहते हैं कि अगर अमेरिका के रिश्ते इस प्रोजेक्ट से जुड़े देशों से ख़राब हो जाए तो यह प्रोजेक्ट खटाई में पड़ सकता है. ऐसा होने की संभावना कम है क्योंकि अमेरिका सुरक्षा देने की गारंटी देता है".
चीन के बीआरआई का मुक़ाबला
डॉ मिश्रा का यह भी कहना है कि इस प्रोजेक्ट के पीछे एक सोच यह थी कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की मुख़ालफ़त की जाए.
वह कहते हैं, "तो अगर इस तरह की प्रतिद्वंद्विता के तहत किसी प्रोजेक्ट को बनाने की सोच होती है तो कोशिश ये होती है कि हर तरह की मुश्किल के बावजूद उसे पूरा किया जाए."
मिश्रा के मुताबिक़ इस संघर्ष में सवाल सिर्फ इसराइल का नहीं है. वह कहते हैं, "हमास ने कमज़ोर होती अमेरिकी ताक़त को भी चुनौती दी है. साल 1945 से अब तक अमेरिका की ताक़त इसलिए ज़िंदा रही क्योंकि उनके पास संस्थागत तंत्र थे. बाइडन प्रशासन चाह रहा है कि उदार संस्थाओं की विचारधारा को हर जगह फैलाना है. और वो तब तक नहीं हो सकता जब तक अमेरिका इंडिया-मिडिल ईस्ट कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट को गठबंधन शक्ति के तौर पर न देखे."
डॉ मिश्र कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट में राजनीति भी है, इसमें वैश्विक व्यवस्था भी है और इसमें अमेरिका की गहरी रुचि भी है.
वह कहते हैं, "तो ये प्रोजेक्ट तब खटाई में पड़ सकता था अगर ये सिर्फ़ भारत और अरब देशों की बात होती. लेकिन चूंकि इसमें अमेरिका जैसी बड़ी ताक़त भी शामिल है इसलिए ये प्रोजेक्ट बाधित हो सकता है लेकिन ख़त्म नहीं."
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