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अमेरिका से भारत खरीदेगा अधिक तेल और गैस, क्या हैं मायने ?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हुए हैं.
दोनों के बीच हुई द्विपक्षीय मुलाक़ात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत, अमेरिका से अधिक तेल और गैस खरीदेगा, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी.
ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका, भारत का शीर्ष तेल और गैस आपूर्तिकर्ता होगा.
वहीं भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि इस बात की संभावना है कि अमेरिका से तेल और गैस का आयात सालाना 15 अरब डॉलर से बढ़कर 25 अरब डॉलर हो सकता है.
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भारत तेल, गैस कहां से लेता है?
कच्चे तेल के मामले में अमेरिका, भारत का पांचवा और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के मामले में एक बड़ा आपूर्तिकर्ता है.
तेल खपत में अमेरिका और चीन के बाद भारत, दुनिया का सबसे बड़ा देश है. भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत तेल आयात करता है.
साल 2021 की बात करें, तो भारत ने सबसे ज़्यादा तेल इराक से खरीदा था. इस लिस्ट में उसके बाद सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका का नंबर था. वहीं रूस 9वें स्थान पर था.
लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस स्थिति को बदल दिया. रूस ने फरवरी 2022 को यूक्रेन पर हमला किया.
यूक्रेन पर रूस के हमले के ख़िलाफ़, यूरोपीय संघ (ईयू) ने साल 2022 में रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि इसके बावजूद यूरोपीय बाज़ारों में रूस का तेल भारत के ज़रिए पहुंचता रहा.
रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले तक भारतीय तेल के आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी महज़ एक फीसदी थी, जो एक साल में यानी 2023 में बढ़कर 35 फीसदी हो गई.
युद्ध के कारण रूस को बड़े पैमाने पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा. ऐसे समय में भारत ने अच्छी दरों पर रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात किया.
अमेरिका से हुए समझौते के तहत भारत कच्चे तेल के साथ-साथ अमेरिका से प्राकृतिक गैस का भी आयात करेगा. भारत सरकार साल 2030 तक देश में प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल के शेयर को 6.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करना चाहती है.
क़तर दुनिया का सबसे बड़ा एलएनटी का निर्यातक रहा है, लेकिन अब अमेरिका ने उसे पछाड़ दिया है.
आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2022-23 में भारत ने 1.985 करोड़ टन एलएनजी आयात किया था, जिसमें से क़रीब 54 प्रतिशत हिस्सेदारी क़तर की थी.
क्या खाड़ी देश नाराज़ हो जाएंगे?
आर्थिक मामलों के जानकार और जाने-माने ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का कहना है कि भारत दुनिया के 30 से ज्यादा देशों से तेल और गैस आयात करता है.
वे कहते हैं, "भारत आज दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. हमारी रणनीति रही है कि हम अधिक से अधिक देशों से तेल मंगवाएं, क्योंकि हम अपने सभी विकल्प एक टोकरी में नहीं रखना चाहते."
तनेजा कहते हैं, "हमारे देश में प्रतिदिन 55 लाख बैरल तेल का इस्तेमाल होता है. तेल एक सामरिक वस्तु है. जरूरी है कि एक देश पर भारत की निर्भरता न बनी रहे. युद्ध, भूकंप, सुनामी या किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में हम चाहते हैं कि हमारी तेल सप्लाई बनी रहे."
उनका मानना है, "अमेरिका के साथ-साथ भारत रूस, इराक़, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देशों से बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है. भारत की खपत इतनी है कि अगर वह अमेरिका की तरफ शिफ्ट भी करता है तो दूसरे देशों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा."
कुछ यही राय फ़ोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में इंटरनेशनल बिज़नेस के प्रोफे़सर फ़ैसल अहमद की भी है.
उनका कहना है, "सऊदी अरब, यूएई के साथ कई खाड़ी देश तेल आधारित अपनी अर्थव्यवस्था को बदलना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि तेल पर निर्भरता, भविष्य नहीं है. ऐसे में अगर भारत अमेरिका से अधिक तेल या गैस खरीदता है तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा."
वे कहते हैं, "वे देश भी भारत को तेल की जगह दूसरे प्रोडक्ट्स या सर्विस बेचने के इच्छुक हैं. वहीं अगर रूस से भारत को सस्ता तेल मिलता रहेगा, तो वह वहां से भी खरीदता रहेगा."
दूसरी तरफ तनेजा कहते हैं कि तेल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, ऐसे में उसकी क़ीमत बहुत मायने रखती है.
वे कहते हैं, "भारत में 70 प्रतिशत तेल मंगवाने का काम सरकारी कंपनियां और 30 प्रतिशत प्राइवेट कंपनियां करती हैं. इनमें रिलायंस और नायरा बहुत बड़ी आयातक हैं. इस बिजनेस में सबसे पहले यह देखा जाता है कि सस्ता तेल कहां से आ रहा है."
भारत को क्या मिलेगा?
भारत और अमेरिका ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने की बात की है.
साल 2023 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 190.08 अरब अमेरिकी डॉलर का था. इसमें भारत भारत का निर्यात 83.77 अरब डॉलर और आयात 40.12 अरब डॉलर था.
दोनों देशों के बीच 43.65 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था.
भारत, अमेरिका से सबसे ज़्यादा कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला कोक, कटे और पॉलिश किए हुए हीरे, इलेक्ट्रिक मशीनरी, विमान, अंतरिक्ष यान और सोना मंगवाता है.
फै़सल अहमद कहते हैं, "व्यापार घाटे को कम करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप पारस्परिक शुल्क( रेसिप्रोकल टैरिफ़) लगाने की बात कर रहे हैं. ऐसे में अगर भारत, अमेरिका से तेल और गैस के आयात बढ़ाता है तो उसे पारस्परिक शुल्क में कुछ रियायत मिल सकती है."
वे कहते हैं, "अमेरिका साल 1974 में जेनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ़ प्रेफ़रेंस (जीएसपी) लेकर आया था. इसके जरिए वह विकासशील देशों को अपना मार्केट एक्सेस देता था. इस सिस्टम के तहत अमेरिका आने वाले सामान पर कम शुल्क या कोई भी टैरिफ़ नहीं लगाया जाता था."
बीबीसी से बातचीत में अहमद ने कहा, "ट्रंप ने साल 2019 में जीएसपी को ख़त्म कर दिया था. इसके बाद अमेरिका आने वाले सामान पर टैरिफ़ लगाए जाने लगे. हालांकि उसके बाद भी अमेरिका आने वाले सामान पर कम टैरिफ़ ही लगता था, लेकिन अब उन्होंने पारस्परिक टैरिफ़ लगाने की बात कही है."
वे कहते हैं, "इस नए टैरिफ़ का मतलब यह है कि अगर अब टेक्सटाइल सेग्मेंट के किसी सामान पर भारत 20 प्रतिशत टैरिफ़ लगा रहा है तो अमेरिका भी उसी सेग्मेंट के सामान पर 20 प्रतिशत टैरिफ़ लगाएगा. ऐसे में भारत से अमेरिका जाने वाला सामान महंगा हो जाएगा और इससे भारत के आयात निर्यात पर बहुत असर पड़ेगा."
अहमद कहते हैं, "पहले कार्यकाल में ट्रंप ने चीन के साथ 'ट्रेट डील फे़ज 1' की थी. उसमें चीन को दो सालों के लिए अतिरिक्त 200 अरब डॉलर का निर्यात अमेरिका से करना था. तब कहा गया था कि चीन के साथ ट्रेड वॉर में ट्रंप अपने चेहरा चमकाने की कोशिश कर रहे हैं."
उनका कहना है, "ऐसी ही एक मिनी ट्रेड डील ट्रंप भारत के साथ भी करना चाहते थे लेकिन यह हो नहीं पाई. यह बताता है कि ट्रंप शुरू से अपने व्यापार घाटे को लेकर गंभीर हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित