उत्तरकाशी टनल हादसा: 'आज मनी असली दिवाली', झारखंड के मज़दूरों के परिजन की आपबीती

टनल से बाहर आए मज़दूर

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, रांची से

फूलकुमारी देवी की कई दिनों से न तो नहाने-धोने की हिम्मत थी और न खाने की फ़िक्र.

वे बस जिंदा थीं. जी रही थीं. क्योंकि, उनका बेटा राजेंद्र बेदिया उस सुरंग में फंसा था, जिस पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई थीं. लेकिन उनके दिल के किसी कोने में ये आस ज़रूर थी कि उनका बेटा जिंदा वापस आएगा.

वो झारखंड के खीराबेड़ा गांव में रहती हैं. ये गांव रांची ज़िले में आता है.

अब वे खुश हैं. उन्हें खबर मिल गई है कि इस बहुचर्चित 'सुरंग हादसे' में फंसा उनका बेटा अनिल बेदिया और उनके साथ के सभी 40 मज़दूरों को बचा लिया गया है. अब उन्हें अनिल की घर वापसी का इंतज़ार है.

मंगलवार देर शाम उन्होंने फोन पर अपने बेटे से बातचीत की. अनिल ने उन्हें बताया कि वे एक दिसंबर को घर वापस आ जाएंगे.

फूलकुमारी देवी ने बीबीसी से कहा, “भगवान की कृपा है कि मेरा इकलौता बेटा अब घर वापस आ रहा है. हम रोज उसका सपना देखते थे. एक रात देखे कि घर पर आ गया है. नींद खुली, तो खूब रोए. सपना देखकर बेचैनी बढ़ गई थी. अब हम सरकार से माँग करते हैं कि सबके लिए यहीं पर रोज़गार का इंतज़ाम करा दे. अब बेटे को बाहर नहीं जाने देंगे.”

फुलकुमारी देवी
RAVI PRAKASH
हम लोग न दिवाली मनाए, न छठ की पूजा की. कभी लगता था कि आज ही निकल जाएगा. अब हम खुश हैं. भगवान अब कभी ऐसी विपत्ति नहीं दें.
फूलकुमारी देवी
राजेंद्र बेदिया की माँ

‘न दिवाली मनाई, न छठ’

फूलकुमारी देवी आगे कहती हैं, “हमलोग न दिवाली मनाए, न छठ की पूजा की. कभी लगता था कि आज ही निकल जाएगा. फिर खबर आती कि काम रुक गया है, तो हिम्मत जवाब भी देने लगती थी. मेरे पति विकलांग हैं. एक कुंवारी बेटी है. सबकी आस तो मेरे बेटे से ही है.”

वो कहती हैं, “अब हम खुश हैं. भगवान अब कभी ऐसी विपत्ति नहीं दें.”

फूलकुमारी देवी का बेटा अनिल बेदिया झारखंड के उन 15 मज़दूरों में से एक था, जिन्होंने अपनी 16 रातें उत्तरकाशी की उस सुरंग में गुजारी, जहां वो दिवाली के दिन से फंसे हुए थे.

उस सुरंग में खीराबेड़ा गाँव के दो और मज़दूर फंसे थे.

अब इन सभी घरों में मिठाई बँटी है. पटाखे फोड़कर दिवाली भी मना ली गई है. स्कूली बच्चों ने अपने गांव के मज़दूरों के बाहर निकलने की ख़ुशी में डांस भी किया. पूरे गांव में जश्न का माहौल है.

टनल ग्राफ़िक्स

स्कूल के प्रधान शिक्षक मोहम्मद उमर 25 साल से इस गाँव के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. सुरंग में फँसे अनिल बेदिया, सुखराम बेदिया और राजेंद्र बेदिया भी इनके शिष्य रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “जितनी भी एजेंसियाँ इनके रेस्क्यू में लगी थीं, हम उन सबके आभारी हैं. यह देश के लिए गौरव का दिन है. इससे सरकार के प्रति लोगों का विश्वास और मज़बूत हुआ है. हम सबकी सलामती की दुआएँ कर रहे हैं.”

मज़दूरों के परिजन

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घर वापसी का इंतज़ार

बुधवार की सुबह से ही खीराबेड़ा में लोगों की आवाजाही लगी है. मीडिया के लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और पीड़ित परिवारों के सगे-संबंधियों का आना-जाना लगा है. सबको गाँव के उन सबकी वापसी का इंतज़ार है, जो उत्तरकाशी सुरंग परियोजना में काम करने गए थे.

सुरंग में फँसे रहे तीन मज़दूरों समेत इस गाँव के कुल आठ लोग वहाँ काम करने गए थे. अब सभी मज़दूर वापस आने वाले हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी मज़दूरों की सकुशल वापसी पर ख़ुशी ज़ाहिर की है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक पोस्ट भी किया है.

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मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक्स पर लिखा, “हमारे 41 वीर श्रमिक उत्तराखण्ड में निर्माणाधीन सुरंग की अनिश्चितता, अंधकार और कंपकंपाती ठंड को मात देकर आज 17 दिनों के बाद जंग जीतकर बाहर आये हैं. आप सभी की वीरता और साहस को सलाम. जिस दिन यह हादसा हुआ उस दिन दीपावली थी, मगर आपके परिवार के लिए आज दीपावली हुई है. आपके परिवार और समस्त देशवासियों के तटस्थ विश्वास और प्रार्थना को भी मैं नमन करता हूँ.”

मुख्यमंत्री ने अपने अधिकारियों की एक टीम भी घटनास्थल पर भेजी थी, जो इन मज़दूरों के साथ वापस लौटेगी.

‘जब बेटा आएगा तब चैन से सोएंगे’

मज़दूरों के परिजन

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सुरंग में फँसे रहे सुखराम बेदिया के पिता बुरहन बेदिया और अनिल बेदिया के पिता चरकू बेदिया को बेटों की वापसी का इंतज़ार है. इनका मानना है कि उनके गाँव में आज असली दीपावली मनी है.

चरकू बेदिया ने बीबीसी से कहा, “ हम सो नहीं पा रहे थे. अब बेटा आएगा, तो सोएँगे. पूछेंगे कि अंदर बिना खाए-पीए कैसे रहा. हमलोग आज दिवाली मना रहे हैं. हमारे लिए यह जिंदगी की सबसे बड़ी घटना है.”

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