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'लोग कहते, तुम्हारी ज़िम्मेदारी कौन लेगा' बाल विवाह के ख़िलाफ़ लड़ने वाली सोनाली की कहानी
- Author, प्राची कुलकर्णी
- पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
''मैं जब नौवीं क्लास में थी तभी मेरे माता-पिता ने मेरी शादी तय कर दी थी. मेरी उम्र 13 साल थी और उनकी 30 साल.''
अब 26 साल की हो चुकीं सोनाली बडे आज भी 13 साल पहले की उस घटना को याद करके बेचैन हो उठती हैं.
सोनाली महाराष्ट्र के बीड तालुका के शिरुर कासर गांव की रहने वाली हैं. उनके माता-पिता गन्ना काटने का काम करते हैं.
उनकी तीन बहनें और एक भाई है. उनके माता-पिता हर साल छोटे बच्चों को घर में छोड़कर गन्ना काटने जाते थे.
सोनाली की शादी की चर्चा छोटी उम्र में ही शुरू हो गई थी. उनके माता-पिता चाहते थे कि जल्द से जल्द उनकी शादी हो जाए.
सोनाली का विवाह उस समय बीड में हो रहे कई बाल विवाहों में से एक था.
सोनाली कहती हैं कि जब शादी के लिए लोग लड़की देखने आते थे तो उन्हें स्कूल से जबरदस्ती घर ले जाया जाता था.
लेकिन हर बार उनकी एक ही मांग होती थी. वो चाहती थीं कि पहले उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने दी जाए.
सोनाली कहती हैं, "मेरी एक ही मांग थी. वो ये कि मुझे 12वीं तक पढ़ने दिया जाए. फिर मुझे यकीन था कि मैं अपनी आगे की पढ़ाई ससुराल में पूरी कर पाऊँगी.
लेकिन लोग कहते थे, ''तुम्हारी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?''
सोनाली कहती हैं कि उनके इलाके में लड़कियों का दसवीं पास करने से पहले ही शादी कर देना आम बात थी.
सोनाली के माता-पिता सोचते थे कि जब उनके इलाके में ऐसा चलन है तो उनकी बेटी शादी से इनकार क्यों कर रही है.
उसी घर में उनकी बड़ी बहन की भी बचपन में ही शादी हो गई थी. सोनाली का सपना अपनी पढ़ाई पूरी करने का था.
लेकिन जब वह नौवीं कक्षा में थीं, तभी उनकी शादी तय हो गई और ये सब इतना जल्दी हुआ कि उन्हें ज्यादा सोचने का मौका ही नहीं मिला.
सोनाली कहती हैं, "लड़का नासिक का था. जब हमारी शादी हुई तब मेरे पति 30 साल के थे और मैं 13 साल की."
शादी से महज एक दिन पहले लड़केवाले उनके घर आए थे और फिर दूसरे दिन ही उनकी शादी हो गई.
सोनाली कहती हैं कि उनके पिता ने सीधे तौर पर धमकी दे दी थी कि अगर शादी से इनकार किया तो वो खुद को नुक़सान पहुंचा सकते थे.
वो कहती हैं, '' हल्दी कार्यक्रम के दौरान भी मैंने दुल्हनों की तरह व्यवहार नहीं किया.''
मुश्किल हालात से निकलने का जज़्बा
सोनाली अजीब परिस्थिति में फंस गई थी. शादी के लिए न मानने पर उनकी मां के साथ मारपीट होती थी.
सोनाली को समझ नहीं आ रहा था कि उनसे क्या गलती हो रही है. लेकिन उनके साथ जो हो रहा था वो सही नहीं था.
सोनाली ने बाल विवाह से बचने के लिए पुलिस का भी सहारा लिया. वो थाने पहुंचीं लेकिन वहां भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली. इलाके में बाल विवाह आम था.
सोनाली ने बताया कि उनकी शादी में पुलिस और सरपंच भी मौजूद थे. सोनाली की शादी की रस्में स्कूल परिसर में बने मंदिर में शुरू हुईं. स्कूल देखकर सोनाली खुद को रोक नहीं पाई और रो पड़ीं.
जब सोनाली के माता-पिता से पूछा गया कि उनकी बेटी इतना रो क्यों रही है तो बताया गया कि उसे अपने मां-बाप को छोड़ना पड़ रहा है इसलिए रो रही है.
शादी के बाद विदाई के लिए सोनाली को कार में बिठाया गया. लेकिन वो ससुराल न जाने की ठान चुकी थीं. गाड़ी गाँव से निकलकर हाईवे पर पहुँची.
सोनाली ने उल्टी होने की बात कहकर खिड़की खोलने को कहा. थोड़ी देर बाद उन्होंने दरवाजा खोला और चलती गाड़ी से कूद गईं.
सोनाली कहती हैं, "मैं बेहोश हो गई थी. मुझे कोई फ्रैक्चर नहीं था और न कहीं चोट लगी थी."
वो कहती हैं, ''मुझे लगा कि अगर मैं कार से कूद कर बच गई तो कुछ कर सकती हूं.''
''इसी उम्मीद को लेकर मैं घर लौटी लेकिन पूरे साल मुझे सार्वजनिक उपहास से बचने के लिए अलग-अलग रिश्तेदारों के पास भेजा जाता रहा.''
पढ़ाई को बनाया हथियार
इन हालातों के बीच नौवीं क्लास की उनकी पूरी पढ़ाई बर्बाद हो गई. इसके बावजूद सोनाली में कुछ करने का जज़्बा बाकी था.
सोनाली ने अपने दोस्तों की मदद से नौवीं क्लास की परीक्षा दी और फिर दसवीं कक्षा का फॉर्म भी भर दिया. लेकिन इस बीच उनके पति उन्हें अपने घर ले जाने की कोशिश कर रहे थे.
सोनाली कहती हैं कि उनके पति घर आते थे. कभी वो बहलाने की कोशिश करते और कभी जबरदस्ती अपने घर ले जाने की कोशिश करते.
मेरे माता-पिता कहते थे, '' तुम हमारे लिए मर चुकी हो. फिर मेरे पति से कहते कि वो तुम्हारी है. तुम तय करो कि क्या करना है.''
वो कहती हैं, '' मैं पहाड़ों पर चली जाती. और तब तक वापस नहीं आती जब तक मेरे पति वापस नहीं चले जाते.''
इस बीच सोनाली ने पढ़ाई जारी रखी. उनके पास किताबों के लिए पैसे नहीं थे तो उन्होंने खेतों में मजदूरी कर कमाई की. वो रोज 70 रुपये कमाती थीं.
इस दौरान उनकी मुलाकात गांव में एक आशा कार्यकर्ता से हुई और उनकी मदद से सोनाली ने आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाने का फ़ैसला किया.
इसी बीच सोनाली को सतारा की वकील वर्षा देशपांडे के बारे में पता चला.
उन्हें पता चला कि वो बाल विवाह के ख़िलाफ़ मुहिम में शामिल हैं. सोनाली ने उनसे संपर्क किया और सतारा जाने का फैसला किया.
लेकिन सोनाली के पास पैसे नहीं थे. ऐसे में शादी का मंगलसूत्र उनके काम आया. उन्होंने मां से छिपा कर मंगलसूत्र बेच दिया. सोनाली को पांच हजार रुपये मिले. ये पैसे लेकर वो सतारा पहुंच गईं.
सतारा आने पर उन्हें वर्षा देशपांडे की ओर से शुरू किए गए ट्रेनिंग प्रोग्राम के बारे में पता चला. उन्होंने नर्सिंग कोर्स पूरा करने का फ़ैसला किया.
उस समय सतारा में प्राथमिक स्तर की नर्सिंग की पढ़ाई चल रही थी. इसे पूरा करने के बाद सोनाली नौकरी की तलाश में पुणे पहुंच गईं.
सपना पूरा हुआ अब साथी की तलाश
अलग-अलग अस्पतालों में नर्स के तौर पर काम करते हुए उन्हें इस विषय में आगे की पढ़ाई के बारे में पता चला. लेकिन फिर पैसे का सवाल खड़ा हो गया.
लेकिन सोनाली ने ज़्यादा काम करके पैसे बचाने शुरू किए. इसके बाद उन्होंने जेएनएम में नर्सिंग का कोर्स पूरा किया. यहां एक साल की पढ़ाई की फीस एक लाख रुपये थी.
सोनाली ने ये कोर्स पूरा किया और अब वो पुणे के एक बड़े अस्पताल में काम करती हैं.
26 साल की सोनाली अब अपने पैरों पर खड़ी हैं. उनकी कोशिशों की बदौलत उनकी छोटी बहन को भी 12वीं तक पढ़ने का मौका मिला.
अब वो अपना सपना पूरा कर चुकी हैं और एक नए साथी की तलाश में हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित