राजस्थान में गहलोत-पायलट को विधानसभा चुनाव के पहले साथ ला पाएगी कांग्रेस?
कीर्ति दुबे
बीबीसी संवाददाता

इमेज स्रोत, ANI
राजस्थान कांग्रेस में जारी राजनीतिक गरमागरमी शांत करने के लिए दिल्ली में सचिन पायलट के साथ पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने बैठक की.
अशोक गहलोत पैर में चोट की वजह से दिल्ली नहीं आ सके लेकिन उन्होंने गुरुवार को हुई इस बैठक में वर्चुअली हिस्सा लिया.
मीडिया में आई रिपोर्ट की मानें तो इस बैठक के बाद अशोक गहलोत से कहा गया कि वह सचिन पायलट की उन तीन मांगों पर कार्रवाई करें जिसमें वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ़ कथित भ्रष्टाचार के मामले की जांच कराने की मांग भी शामिल है.
राजस्थान में साल 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जो तनातनी शुरु हुई है वो लंबे समय से सतह पर है.
सचिन पायलट सार्वजनिक मंचों से अशोक गहलोत सरकार की आलोचना करते हैं तो अशोक गहलोत भी सचिन पायलट के लिए ‘नकारा, निकम्मा और गद्दार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं.
इस साल के आखिर में राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं. पार्टी के नेता और रणनीतिकार मानते हैं कि कांग्रेस अगर यहां बीजेपी को कड़ी टक्कर देना चाहती है तो उसे चुनाव के पहले पार्टी के भीतर चल रहे टकराव को ख़त्म करना होगा.
इसी कोशिश में गुरुवार को कांग्रेस हाईकमान के साथ राजस्थान के नेताओं की बैठक हुई. सचिन पायलट इस बैठक में राजस्थान के 28 नेताओं के साथ पहुंचे थे. इस बैठक में राज्य के विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा की गई.
बैठक के बाद कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बताया कि कांग्रेस राजस्थान में एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी. पार्टी वहां 'ट्रेंड को पलटेगी.'
उन्होंने कहा कि राजस्थान में पार्टी घर-घर जा कर राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लोगों के बीच पहुंचाने का काम करेगी.

पायलट की तीन मांग
बीते कुछ महीनों से सचिन पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. अप्रैल महीने में सचिन पायलट अपनी ही सरकार के खिलाफ़ अनशन पर बैठ गए थे.
दरअसल सचिन पायलट की तीन मांगें हैं और वह चाहते हैं कि गहलोत सरकार उनकी मांगों पर कार्रवाई करे. ये तीन मांगें हैं-
- वसुंधरा राजे सिंधिया के सीएम रहते हुए कथित घोटालों की जांच हो.
- राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) को रद्द करके नई व्यवस्था शुरू की जाए.
- पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने से जिन छात्रों का नुकसान हुआ उन्हें आर्थिक मुआवज़ा दिया जाए.
इन मांगों को लेकर सचिन पायलट ने मई में अजमेर से लेकर जयपुर तक पांच दिवसीय यात्रा निकाली.
गुरुवार की बैठक के बाद पायलट ने कहा, “ये सभी मुद्दे हाईकमान के सामने रखे गए हैं. पेपर, लीक और आरपीएससी में रिफ़ॉर्म के सुझावों सहित मेरी मांग को सुना गया है और कांग्रेस कमेटी ने इस मामले पर क्या कार्रवाई करनी है इसका ब्लूप्रिंट भी तैयार किया है.”
आने वाले चुनाव में अपनी भूमिका पर सचिन पायलट ने कहा, “ मुझे केंद्र या राज्य में पार्टी ने जो भी ज़िम्मेदारी दी मैंने उसे लगन के साथ निभाया. भविष्य में भी पार्टी जो निर्देश देगी, मैं वहीं करूंगा.”

इमेज स्रोत, BBC/MOHARSINGHMEENA
बैठक से आएगा बदलाव?
लंबे समय से कांग्रेस के राज्य में दो बड़े नेताओं के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा, लेकिन क्या इस बैठक से कुछ बदलेगा?
इस सवाल का जवाब वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन देते हैं.
वह कहते हैं, “राजस्थान कांग्रेस में झगड़ा तो चल ही रहा है लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि कांग्रेस एक पार्टी के तौर पर बहुत कमज़ोर दिख रही है. राजस्थान पीसीसी की कोई टीम नहीं है, कई ज़िलों में ज़िला अध्यक्ष नहीं हैं, ब्लॉक स्तर पर नेता नहीं हैं. राज्य की बात तो दूर मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बने इतना वक़्त हो गया लेकिन एआईसीसी की पूरी टीम नियुक्त नहीं की जा सकी. तुलनात्मक रूप से कांग्रेस बीजेपी से काफ़ी कमज़ोर है क्योंकि यहां संस्था के रूप में बीजेपी मज़बूत है.”
वह कहते हैं, “आज अगर सचिन पायलट और अशोक गहलोत इस तरह खुलेआम लड़ रहे हैं तो इसके लिए कांग्रेस हाईकमान ज़िम्मेदार है. इस संकट को केंद्रीय नेतृत्व ने बढ़ने दिया, कांग्रेस की परेशानी यही है कि वो शुरुआत में घाव का इलाज ना करके घाव को कैंसर बनने देती है और फिर कोशिश करती है कि सीधे कैंसर ठीक कर दिया जाए. जो बहुत मुश्किल है. मुझे नहीं लगता कि हालिया बैठक से बहुत कुछ बदलने वाला है.”

राजस्थान में कांग्रेस की चुनौती
साल 2020 में 19 विधायकों के साथ सचिन पायलट ने बगावत की थी. हालांकि, इस विद्रोह को कांग्रेस ने वक्त रहते काबू कर लिया.
सचिन पायलट की बग़ावत के दौरान उनके साथ 22 विधायक मानेसर पहुंचे थे. हालांकि, तीन विधायक वापस लौट आए थे. यानी उस दौरान 19 विधायक पायलट के समर्थन में थे. इस दौरान सरकार बचाने के लिए अशोक गहलोत के पक्ष में 80 विधायक थे. जो 34 दिन तक होटल में रहे.
राजस्थान में होने वाला चुनाव कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ़ जितना आसान नहीं होगा क्योंकि यहां राजनीतिक प्रतिद्वंदी से पहले पार्टी को आंतरिक कलह सुलझाना होगा.
राजनीति के जानकार कहते हैं कि आज से पहले प्रदेश में एक पार्टी के दो नेताओं के बीच कभी भी इस हद तक कड़वाहट नहीं देखी गई.
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, “कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए दोनों नेताओं के बीच की कड़वाहट को मिटाना आसान नहीं होगा. ये बैठक हो सकता है कि जनता के बीच कुछ हद तक ये संदेश दे दे कि दोनों नेता साथ हैं लेकिन मुझे लगता नहीं कि इससे सालों से चली रही ये कड़वाहट खत्म होने वाली है.”
बारेठ कहते हैं, “ जब अशोक गहलोत को राजस्थान का प्रमुख बनाया गया था तो उस वक्त भी राज्य में हरिदेव जोशी, शिवचरण माथुर और जगन्नाथ पहाड़िया जैसे नेता थे लेकिन तब भी पार्टी के नेताओं में इस तरह की अनबन नहीं थी.”

त्रिभुवन मानते हैं राजस्थान में कांग्रेस की राह बहुत आसान नज़र नहीं आ रही.
वह कहते हैं, “जब राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान आई थी तो दोनों नेताओं ने मिल कर इसकी तैयारी की और जिस तरह की प्रतिक्रिया इस यात्रा को मिली वो किसी की भी उम्मीद से अधिक थी. ऐसा नहीं लग रहा ता कि इतना बड़ा जन समर्थन इस यात्रा को मिलेगा, लेकिन मिला. अगर उस पेस को कांग्रेस बरकरार रखती तो आज वो बहुत मज़बूत स्थिति में होती लेकिन जैसे ही यात्रा खत्म हुई पार्टी के दोनों नेताओं के बीच विवाद फिर शुरु हो गया.”
इस साल मई में अशोक गहलोत और सचिन पायलट को दिल्ली बुलाया गया था और दोनों नेताओं की मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से मुलाकात हुई थी. लेकिन इस मुलाकात के बाद फिर सचिन पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया और गहलोत सरकार पर आरोप लगाया कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं कर रही है. ऐसे में गुरुवार की बैठक से क्या कुछ बदलेगा ये आने वाला वक्त बताएगा.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत में राजस्थान ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस अपने पारंपरिक मतदाताओं को दूर होने से बचा पाई है. यहां चुनावों में कांग्रेस के पास 33 फ़ीसदी वोट रहा है.
लेकिन इस बार अगर कांग्रेस का अपना विवाद चुनाव से पहले नहीं सुलझा तो पार्टी के लिए राज्य में अपने वोट शेयर को बरकरार रख पाना चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
सचिन पायलट अपनी सरकार के खिलाफ़ क्यों हैं?
कई बार सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. राज्य में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से कई मौक़े पर उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लिया है.
साल 2019 में कोटा के सरकारी जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत हुई, तब सचिन पायलट वहां पहुंचे थे. उन्होंने सरकार को घेरने का प्रयास किया था.
इसी तरह जालौर में एक दलित बच्चे की मृत्यु के वक़्त भी वह वहां पहुंचे थे जबकि कई नेताओं ने कहा था कि वह घटना ग़लत तरह से पेश की गई थी.
अपनी ही सरकार के खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शन में भी पायलट पहुंच जाते हैं. इस साल जब राजस्थान में राइट टू हेल्थ बिल को लेकर डॉक्टर विरोध और हड़ताल कर रहे थे तो इस दौरान सचिन पायलट डॉक्टरों से मिलने पहुंचे थे.
नाम न छापने की शर्त पर एक पत्रकार कहते हैं, “सचिन पायलट का ये रवैया उनके अति महत्वाकांक्षी होने का नतीजा है. उनमें सब्र नहीं है. वो सब कुछ तुरंत चाहते हैं. 26 की उम्र में सांसद बन गए. 32 साल की उम्र में केंद्र में मंत्री बन गए. 42 साल की उम्र में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बन गए तो अब उन्हें मुख्यमंत्री बनने की जल्दी है."
वह आरोप लगाते हैं, "सचिन पायलट मीडिया के बनाए हुए नेता हैं, अशोक गहलोत जैसे मंझे नेता के सामने वो टिक नहीं सकते उन्हें ये भी पता है.”
ऐसे आरोप गहलोत समर्थक भी लगाते हैं. वहीं सचिन पायलट के समर्थक पार्टी को राज्य की सत्ता में लाने में उनके योगदान का ज़िक्र करते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
इस तनातनी का ज़िम्मेदार कौन?
त्रिभुवन मानते हैं कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने जब सचिन पायलट को राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव की कमान सौंपी तो 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 21 सीटें मिलीं थीं और उस समय लीडरशिप अशोक गहलोत से बहुत खफ़ा थी. उस समय सचिन पायलट में बड़ी उम्मीद दिखी थी. इन हालात में उन्हें यह संकेत दिए गए होंगे कि अब कांग्रेस रिपीट हो सकी तो उन्हें कमान दी जाएगी, लेकिन सचिन पायलट और उनके समर्थकों को लगता है कि हाईकमान ने उनसे जो वादा किया गया था, उसे पूरा नहीं किया गया.
वो कहते हैं, “सचिन पायलट और उनके समर्थकों को लगता है कि उनसे सीएम बनाने का वादा किया गया था लेकिन जब राज्य में कांग्रेस को बहुमत मिला तो हालात कुछ और हो गए , अशोक गहलोत के पास समर्थन था और वो इतने पुराने और मज़बूत नेता हैं कि पार्टी के हाईकमान के पास उनको चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."
"इस बीच एक बात और हुई और वह यह कि अशोक गहलोत ने अपने राजनीतिक कौशल से पूरी स्थिति को बदल दिया और हाईकमान उन्हें लेकर अपने 2013 के चुनाव बाद के ख़यालों को बदलने पर विवश हुई. इस बीच संख्या बल पायलट के लिए अधिक मददगार साबित नहीं हुआ."
कांग्रेस के भीतर भी कई लोग मानते हैं कि राजस्थान को मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने अगर ठीक से नहीं संभाला तो स्थिति हाथ से निकल सकती है. पार्टी को लंबे समय से कवर करने वाले पत्रकार कहते हैं कि पार्टी के पास पैसे नहीं हैं. राजस्थान ने आर्थिक रूप से पार्टी को ज़िंदा रखा है, ऐसे में यहां अपनी सरकार बरकरार रखना कांग्रेस की ज़रूरत है.
साथ ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के नतीजे आने वाले लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि तैयार करेंगे. ऐसे में कांग्रेस के लिए इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करना बेहद ज़रूरी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












