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नईमा ख़ातून: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को पहली महिला वीसी के लिए 100 साल का इंतज़ार क्यों करना पड़ा
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को आख़िरकार एक महिला वाइस चांसलर मिल ही गईं. हालांकि इसके लिए उसे 104 साल का लंबा इंतज़ार करना पड़ा.
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ की विज़िटर होने के नाते प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून को एएमयू का वीसी नियुक्त कर दिया. साल 1920 में बनी एएमयू में अब तक 21 वीसी हुए हैं और ये सब पुरुष थे.
हालांकि दिलचस्प बात यह है कि जिस यूनिवर्सिटी को अपनी पहली महिला वीसी पाने में 104 साल लगे उसकी पहली चांसलर सुल्तान जहां बेगम (बेगम भोपाल) ख़ुद एक महिला थीं.
लोकसभा चुनाव को देखते हुए चुनाव आयोग की सशर्त मंज़ूरी के बाद नईमा ख़ातून की नियुक्ति हुई है. चुनाव आयोग ने इस संदर्भ में सरकार को ताकीद दी थी कि इस क़दम को 'पब्लिसाइज़' नहीं किया जाए.
इससे पहले नवंबर, 2023 में तीन उम्मीदवारों का पैनल जिसमें प्रोफ़ेसर नईमा खातून, प्रोफ़ेसर एमयू रब्बानी और प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का नाम राष्ट्रपति (विजिटर, सेंट्रल यूनीवर्स्टीज) द्रौपदी मुर्मू के पास भेजा गया था. राष्ट्रपति ने प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून के पक्ष में फ़ैसला किया.
कौन हैं प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून?
एएमयू की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, नईमा ख़ातून मूल रूप से ओडिशा की हैं. उन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई ओडिशा से की है और उसके बाद की पूरी पढ़ाई एएमयू से की है. उन्होंने मनोविज्ञान विषय में पीएचडी की और एएमयू में ही मनोविज्ञान विभाग की अध्यक्ष भी रहीं.
उन्होंने मनोविज्ञान विषय पर कई किताबें लिखी हैं और उनके 31 रिसर्च पेपर पब्लिश हो चुके हैं. एएमयू की वाइस चांसलर बनने से पहले वो बीते दस साल से एएमयू के वीमेंस कॉलेज की प्रिंसिपल थीं.
नईमा ख़ातून ने वीसी पद का चार्ज कार्यवाहक वीसी प्रोफ़ेसर मोहम्मद गुलरेज़ से लिया है जो इत्तेफ़ाक़ से उनके पति भी हैं. प्रोफ़ेसर गुलरेज़ से पहले एएमयू के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर तारिक़ मंसूर थे.
प्रोफ़ेसर तारिक़ मंसूर ने दो अप्रैल 2023 को ये वीसी का पद त्याग दिया था जिसके बाद से ही प्रोफ़ेसर गुलरेज़ कार्यवाहक वीसी के तौर पर काम कर रहे थे.
इस्तीफ़ा देने के बाद प्रोफ़ेसर मंसूर बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने उन्हें यूपी में विधान पार्षद बनाया और बाद में बीजेपी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया.
103 साल बाद: इतनी देर क्यों हुई
प्रोफ़ेसर अज़रा मुसवी, एएमयू में सेंटर फ़ॉर वीमेन स्टडीज़ की निदेशक हैं. वो साल 2019 में गठित एएमयू वीमेंस क्लब की फ़ाउंडिंग सेक्रेटरी भी हैं.
अजरा मुसवी कहती हैं, "ये बहुत अच्छी पहल है, हालांकि ये सौ साल से ज़्यादा वक़्त के बाद हुआ. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बीस साल पहले अगर ये किया गया होता तो समाज इसके लिए तैयार नहीं होता. टीचर, स्टूडेंट्स, ऑफ़िस स्टॉफ़ के लिए ये मानसिक तौर पर स्वीकारना बहुत आसान नहीं था कि एक औरत उनकी बॉस हो. चूंकि नईमा ख़ातून प्रिंसिपल भी रही हैं, इसलिए उनको वाइस चांसलर की ज़िम्मेदारी निभाने में जेंडर संदर्भों में दिक़्क़त नहीं आएगी."
लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि उनके पति (कार्यवाहक वीसी प्रो गुलरेज़) की वजह से उनकी राह आसान हुई, इस सवाल पर प्रोफ़ेसर अज़रा कहती हैं, "गुलरेज़ साहब नहीं भी होते तो भी नईमा ख़ातून वाइस चांसलर बनतीं. एएमयू वीमेंस क्लब में बीते चार-पांच साल में इस बात को लेकर संवाद शुरू हो गया था कि अब एएमयू की वाइस चांसलर किसी महिला को बनना चाहिए. एएमयू की प्रोफ़ेसर अनवर जहां ज़ुबैरी तो तक़रीबन 15 साल पहले ही कालीकट (केरल) विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर बन गई थीं. दक्षिण भारत में ये पहले हुआ क्योंकि उत्तर भारत ज़्यादा पित्तृसत्तात्मक है."
ग़ौरतलब है कि साल 2023 में एएमयू टीचर्स एसोसिएशन के चुनाव में तीन महिला टीचर्स जीतीं, जो एक बड़ा बदलाव था.
एएमयू के वीमेंस कॉलेज में हिन्दी विषय की सीनियर एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर नाज़िश बेगम को एसोसिएशन के चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों में सबसे ज़्यादा वोट मिले थे.
नाज़िश बेगम ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, "एएमयू टीचर्स एसोसिएशन में महिला प्रतिनिधित्व कम ही रहा है. लेकिन अबकी बार की जीत ने हमारे हौसले बुलंद किए और हमने एसोसिएशन में एक प्रस्ताव पास कराके कुल आठ मेंबर की सीट में से दो महिला टीचर्स के लिए आरक्षित करवा ली है. बाक़ी यूनिवर्सिटी को पहली महिला वाइस चांसलर मिलने से हम बहुत ख़ुश हैं. ये दूसरी महिलाओं को आगे आकर अपने प्रतिनिधित्व का दावा करने के लिए भी प्रेरित करेगा."
फ़िल्म कलाकार से लेकर राष्ट्रपति तक रहे हैं एएमयू के छात्र
एएमयू उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक रहा है. इसके पूर्ववर्ती छात्र ना सिर्फ़ हिंदुस्तान बल्कि विदेशों में भी बड़े ओहदे पर रहे हैं. राष्ट्रपति डॉ ज़ाकिर हुसैन, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, मालदीव के राष्ट्रपति रहे मोहम्मद अमीन दीदी, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री मंसूर अली, इतिहासकार इरफ़ान हबीब, केंद्रीय मंत्री मोहसिना क़िदवई से लेकर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक एएमयू से पढ़े हुए हैं.
पटना यूनिवर्सिटी की वीमेंस ट्रेनिंग कॉलेज की प्रिंसिपल मुन्नवर जहां 1984 बैच की एएमयू पास आउट हैं.
वो कहती हैं, "ये हमारे लिए बहुत गर्व की बात है. लेकिन पिछले छह महीने से ये फ़ाइल अटकी रही और हमारा संस्थान एएमयू हेडलेस रहा, इससे दुख की बात क्या हो सकती है. ये महिलाओं को कुछ देने में कमज़ोर पॉलिटिकल विल को भी दिखाता है."
शाइस्ता बेदार पटना स्थित विश्व प्रसिद्ध ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी की निदेशक हैं. वो साल 1994 से 2019 तक एएमयू की मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी की लाइब्रेरियन रहीं.
शाइस्ता बेदार कहती हैं, "बतौर औरत ये फ़ख़्र की बात है कि वाइस चांसलर कोई महिला बनी. ये सही बात है कि एएमयू से बहुत सारी क़ाबिल महिलाएं निकली हैं लेकिन सैय्यद हामिद, जनरल ज़मीरूद्दीन शाह, बदरूद्दीन तैयबजी, सैय्यद हाशिम अली, कर्नल ज़ैदी जिस कैलिबर के वाइस चांसलर थे, यक़ीनी तौर पर उस कैलिबर की महिला मैंने एएमयू में नहीं देखी."
विवादों में है ये नियुक्ति
एएमयू को पहली बार एक महिला वीसी मिलने से जहां कई लोग बहुत ख़ुश हैं वहीं कुछ लोग इसे अलग-अलग नज़रिए से देख रहे हैं. लेकिन इनमें से ज़्यादातर लोग खुलकर बात करने से बचते हैं. सूफ़ियान आफ़ताब एएमयू से पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "एएमयू में हमेशा से महिलाओं को प्रशासनिक कामकाज से दूर रखा गया है. ऐसे में किसी महिला को वाइस चांसलर बनाना ऐतिहासिक घटना है. लेकिन ये भी सच है कि देश में अलग तरह का वातावरण है और इस तरह के बदलाव का कारण वोट बैंक भी है."
प्रोफ़ेसर नदीम हसनैन 'ऐस्पेक्ट्स ऑफ़ इस्लाम एंड मुस्लिम सोसाइटीज़' सहित कई महत्वपूर्ण किताबों के लेखक हैं. वो लखनऊ विश्वविद्दालय में एंथ्रोपोलॉजी के प्रोफ़ेसर रहे हैं.
नदीम हसनैन कहते हैं, "कोई महिला वीसी बनी, इसकी मुबारकबाद है उन्हें. लेकिन मैं 40 साल से अकादमिक दुनिया से जुड़ा हुआ हूं, मैंने उनका नाम कभी नहीं सुना है. दरअसल, पसमांदा मुस्लिम का बीजेपी का जो नैरेटिव है, उसमें वो फ़िट बैठती हैं. फिर सिर्फ़ एएमयू और जामिया की ही बात क्यों हो, देश में 350 से ज़्यादा यूनिवर्सिटी हैं जिसमें से ज़्यादातर में महिलाएं कभी वीसी नहीं बनीं. सिर्फ़ एएमयू को ही हाई प्रोफ़ाइल बनाकर उस पर निशाना क्यों साधा जाता है?"
'मसावात की जंग: बिहार के पसमांदा मुसलमान' के लेखक और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर कहते हैं, "अगर स्वतंत्र सोच की कोई महिला बनती तो ही स्वागत योग्य क़दम होता. महिलाओं का सशक्तीकरण होना चाहिए लेकिन अभी जो वीसी बनाए जा रहे हैं वो एक ख़ास विचारधारा के लोग हैं. ऐसे में इसका कोई फ़ायदा नहीं."
वर्तमान में बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और एएमयू के पूर्व वीसी प्रोफ़ेसर तारिक़ मंसूर इस सभी बातों को ख़ारिज करते हैं.
वो बीबीसी से कहते हैं, "यह एक स्वागतयोग्य क़दम है और इसे महिला सशक्तीकरण के नज़रिए से देखा जाना चाहिए. बाक़ी कोई बात नहीं है."
एएमयू में ही इतिहास विभाग के एक प्रोफ़ेसर ने अपना नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बीबीसी से बात की. उनके अनुसार इस मामले को राजनीति के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए.
वो कहते हैं कि अब तक जो भी एएमयू के वीसी बने हैं वो ज़्यादातर यूपी या हैदराबाद के रहने वाले अशराफ़ पुरुष मुसलमान हुए हैं. प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून एक महिला हैं और ओडिशा से आती हैं, इसलिए यह ज़रूर एक अलग और बड़ी बात है. लेकिन प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून ओडिशा के एक अशराफ़ (उच्च जाति) मुस्लिम परिवार से आती हैं. हां यह सच है कि उनकी शादी यूपी के एक पसमांदा मुस्लिम परिवार में हुई. इस आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि वो अशराफ़ हैं या पसमांदा मुसलमान.
उनके अनुसार इसको राजनीतिक नज़रिए से देखना भी ग़लत है क्योंकि एएमयू के वीसी बनने के लिए यूनिवर्सिटी की एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल जिन पांच नामों का चयन करती है उसमें 80 फ़ीसद से ज़्यादा लोग ख़ुद एएमयू के शिक्षक होते हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "इस बात का स्वागत है कि किसी महिला को वाइस चांसलर बनाया जाए. लेकिन मुस्लिम समाज में वीसी बनाई गईं महिलाओं से भी ज़्यादा स्कॉलर महिलाएं हैं. सेंट्रल यूनिवर्सिटी के जो वीसी बनाए जाते हैं, उनका अकादमिक दुनिया में नाम होना चाहिए, जो बदक़िस्मती से नहीं हो रहा. वीसी की नियुक्ति में अब राजनैतिक लाभ प्राथमिक हो गया है और अकादमिक रिकॉर्ड पीछे चला गया है."
मामला पहुंचा इलाहाबाद हाई कोर्ट, 29 अप्रैल को होगी सुनवाई
यह मामला राजनीतिक है या नहीं, यह कहना मुश्किल है लेकिन यह विवादों में ज़रूर घिर गया है क्योंकि कुछ लोगों ने इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.
एएमयू के ही प्रोफ़ेसर मुजाहिद बेग़ और दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफ़ेसर सैय्यद अफ़ज़ाल मुर्तज़ा रिज़वी ने नियुक्ति की इस पूरी प्रक्रिया को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है. जिस पर फ़ैसला आना बाक़ी है. इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होनी है.
प्रोफ़ेसर रिज़वी ने इस सिलसिले में राष्ट्रपति (विजिटर एएमयू) और प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा है. उन्होंने वीसी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया को भेदभावपूर्ण, न्यायविरुद्ध, हितों में टकराव का मामला बताया है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "वीसी की नियुक्ति में यूजीसी गाइडलाइन्स का पालन नहीं किया गया है. एक चपरासी तक की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकलता है, लेकिन वीसी की नियुक्ति के लिए विज्ञापन नहीं निकाला गया. कार्यवाहक वीसी मोहम्मद गुलरेज़ जो नईमा गुलरेज़ (ख़ातून) के शौहर भी हैं उन्होंने वीसी के चुनाव के लिए होने वाली एग्ज़िक्यूटिव कांउसिल की मीटिंग को ना सिर्फ़ चेयर किया बल्कि अपना वोट भी डाला."
प्रोफ़ेसर मुर्तज़ा रिज़वी के राष्ट्रपति को लिखे पत्र के जवाब में अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बातचीत करते हुए प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून ने कहा था, "मुझे समझ में नहीं आता कि वीसी चुनाव प्रक्रिया पर लोगों को आपत्ति क्या है, जबकि सब कुछ यूजीसी गाइडलाइन्स के तहत हो रहा है."
बीबीसी का प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून से संपर्क रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं हो पाया है.
लेकिन यह सच है कि एएमयू के कई शिक्षक अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर इस चयन प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. एएमयू के एक प्रोफ़ेसर ने पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए कहा.
23 अक्टूबर, 2023 को एक इंटर्नल मेमो के ज़रिए बताया गया कि 30 अक्टूबर को एएमयू एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल (ईसी) की बैठक होगी जिसमें एएमयू के वाइस चांसलर के लिए नाम तय किए जाएंगे.
उनका कहना है कि एएमयू जैसे संस्थान के वीसी के लिए सार्वजनिक रूप से विज्ञापन दिया जाना चाहिए और इसमें कम से कम एक महीना वक़्त दिया जाना चाहिए ताकि देश भर के क़ाबिल से क़ाबिल लोग इसके बारे में जानें और आवेदन दे सकें.
उनके अनुसार, 30 अक्टूबर को एएमयू ईसी की बैठक हुई. काउंसिल के पास तक़रीबन तीन दर्जन आवेदन आए और उनमें से 20 लोगों की सीवी चुनी गई और ईसी के सामने वोटिंग के लिए लाया गया.
एएमयू के प्रोफ़ेसर के अनुसार एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वीसी के लिए सिर्फ़ 30-35 आवेदन आना अफ़सोस की बात है उसके अलावा किस आधार पर 20 लोगों को चुना गया यह आज तक नहीं पता है. उसी दिन वोटिंग हुई और ईसी ने उन 20 में से पांच नामों को चुना. बाद में यह पांच नाम एएमयू कोर्ट के पास भेजे गए. एएमयू कोर्ट ने उनमें से तीन नाम चुनकर राष्ट्रपति के पास भेज दिया. राष्ट्रपति ने उन तीन नामों मे से प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून को वीसी बनाने का आदेश जारी कर दिया.
एएमयू के प्रोफ़ेसर कहते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ जब वीसी के लिए तय किए गए तीनों नाम इंटर्नल थे यानी तीनों ही एएमयू के प्रोफ़ेसर थे. उनके अनुसार ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.
वो कहते हैं, "एएमयू में अलग-अलग कोर्स में इंटर्नल छात्रों के लिए पचास फ़ीसद का आरक्षण है लेकिन वीसी के लिए तो सौ फ़ीसद आरक्षण इंटर्नल को दे दिया गया."
कैसे होता है एएमयू वीसी का चयन
जो कोई भी ख़ुद को वीसी के योग्य समझता है वो एएमयू ईसी को अपना नाम भेज सकता है. एएमयू ईसी उन नामों पर विचार करती है और फिर उनमें से कुछ नामों को शॉर्टलिस्ट कर फिर उन पर वोटिंग होती है. ईसी में पांच सबसे ज़्यादा वोट पाने वालों की लिस्ट एएमयू कोर्ट को भेजी जाती है. एएमयू कोर्ट में भी वोटिंग होती है और उनमें से तीन सबसे ज़्यादा वोट पाने वालों की लिस्ट राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है. आम तौर पर राष्ट्रपति पहले नंबर पर आने वाले व्यक्ति को वीसी बनाने का आदेश जारी करता है. लेकिन यह पूरी तरह राष्ट्रपति का विशेषाधिकार होता है.
पूर्व उप-राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी जब एएमयू के वीसी बने थे तो उनका नाम लिस्ट में तीसरे नंबर पर था लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें वीसी बना दिया. इस मामले में भी प्रोफ़ेसर नईमा ख़ातून लिस्ट में तीसरे नंबर पर थीं लेकिन राष्ट्रपति मुर्मू ने उन्हें वीसी बनाया.
हाल के दिनों में बनीं महिला वीसी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पहली महिला वाइस चांसलर नज़मा अख़्तर अप्रैल 2019 में बनी थीं.
प्रोफ़ेसर निलोफ़र ख़ान कश्मीर यूनिवर्सिटी की पहली महिला वाइस चांसलर साल 2022 में नियुक्त हुई थीं.
साल 2022 में ही शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की पहली महिला वाइस चांसलर बनी थीं.
इनमें से नज़मा अख़्तर और शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ाव की ख़बरें मीडिया में आती रही हैं.
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