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शाह बानो का परिवार तीन तलाक़ पर बनी फ़िल्म 'हक़' के ख़िलाफ़ क्यों?
इमरान हाशमी और यामी गौतम की फिल्म 'हक़' पर शाह बानो के परिवार ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.
सिनेमाघरों में रिलीज़ होने से कुछ दिन पहले ही, इमरान हाशमी और यामी गौतम की लीगल ड्रामा फ़िल्म 'हक़' विवादों में घिर गई है.
जिन शाह बानो पर यह फ़िल्म आधारित है, उनके परिवार ने आरोप लगाया है कि फ़िल्म ने उनकी निजता का उल्लंघन किया है और निर्माताओं ने फ़िल्म बनाने से पहले उनकी अनुमति नहीं ली.
अदालत में याचिका दायर कर फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग की गई है.
'हक़' के ख़िलाफ़ अदालत का रुख़
शाह बानो की बेटी सिद्दीका बेगम ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में याचिका दायर कर हक़ की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग की है.
सिद्दीका के वकील तौसीफ वारसी ने पत्रकारों को बताया कि फ़िल्म निर्माताओं ने शाह बानो का नाम या जीवन की कहानी इस्तेमाल करने से पहले परिवार की अनुमति नहीं ली.
वारसी ने एएनआई से कहा, "यह फ़िल्म एमए ख़ान बनाम शाह बानो बेगम के ऐतिहासिक मामले पर आधारित है. भारतीय इतिहास में पहली बार किसी मुस्लिम महिला ने गुज़ारे-भत्ते के लिए लड़ाई लड़ी और केस जीता. किसी व्यक्ति के निजी जीवन या नाम का उपयोग करने से पहले उसकी सहमति लेना ज़रूरी है, क्योंकि यह निजता के अधिकार के अंतर्गत आता है."
शाह बानो के नाती जुबैर अहमद ख़ान ने भी बिना परिवार की अनुमति के फ़िल्म बनाए जाने पर आपत्ति जताई है.
उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "जो भी ये पिक्चर बना रहे हैं उन्होंने हमसे न तो संपर्क किया, न कोई इजाज़त ली. न हमको कहानी या कुछ भी बताया कि हम आपकी नानी के ऊपर ये फ़िल्म बना रहे हैं. कोई भी चीज़ होती है तो एक परिवार होने के नाते वह हमें प्रभावित करती है."
उन्होंने कहा, "टीज़र आया तो हमें पता चला कि हमारी नानी पर पिक्चर बना रहे हैं. टीज़र में शुरू में लिख रहे हैं कि मोहम्मद अहमद ख़ान बनाम शाह बानो पर फ़िल्म है. लेकिन टीज़र में ऐसी कई चीज़ें हैं जो गलत तरह से बताई गई हैं. पूरी पिक्चर में तो हमें भी नहीं पता कि क्या बताया है. टीज़र देखकर ही समझ में आता है कि इसे एक कॉमर्शियल एंगल दिया गया है, जबकि ये एक प्राइवेट मैटर है और भारतीय संविधान के मुताबिक इसके लिए हमारी इजाज़त लेनी चाहिए थी."
वहीं, फ़िल्म निर्माताओं का कहना है कि घटनाओं को नाटकीय रूप देने के लिए कुछ स्वतंत्रता ली गई है और यह एक काल्पनिक चित्रण है.
फ़िल्म निर्माता के वकील अजय बगड़िया ने कहा, "फ़िल्म के डिस्क्लेमर में साफ़ लिखा है कि यह फ़िल्म दो स्रोतों से प्रेरित है- 1985 में शाह बानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से और 'बानो, भारत की बेटी' नामक किताब से. यह एक काल्पनिक प्रस्तुति है और ज़रूरी नहीं कि सब कुछ तथ्यात्मक हो."
इमरान हाशमी ने क्या कहा
फ़िल्म के लीड एक्टर इमरान हाशमी ने कहा कि जब उन्होंने फ़िल्म की स्क्रिप्ट पढ़ी तो ऐसा पहली बार हुआ कि एक समुदाय विशेष की संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें इसका विश्लेषण करना पड़ा.
उन्होंने कहा, "फ़िल्म में बहुत ही बैलेंस्ड पॉइंट ऑफ़ व्यू है. इसमें हम ऐसी कोई बात नहीं छेड़ रहे जिससे लगे कि हम एक कौम के ख़िलाफ़ उंगली उठा रहे हैं, या किसी तरह का जजमेंट पास कर रहे हैं. सबकुछ वैसा ही है जैसे 1985 में हुआ था."
उन्होंने कहा, "जब ये फ़िल्म रिलीज़ होगी तब मुझे नहीं पता कि लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होगी. लेकिन एक लिबरल मुस्लिम के तौर पर मैं ये कह सकता हूं कि मुझे फ़िल्म के व्यू पॉइंट से कोई दिक्कत नहीं है. क्योंकि हम किसी कम्युनिटी को बदनाम नहीं कर रहे हैं. अगर होता, तो मैं ये फ़िल्म नहीं करता."
इमरान हाशमी ने ये भी कहा कि उनकी मां ईसाई और पत्नी हिंदू हैं. ऐसे में ये उनका नज़रिया है फ़िल्म को लेकर लेकिन आगे चलकर कौन इस फ़िल्म को कैसे देखता है, इसपर उनका नियंत्रण नहीं है.
क्या है शाह बानो केस?
यह मामला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में मील का पत्थर माना जाता है.
इंदौर की रहने वाली शाह बानो का साल 1932 में निकाह हुआ था. उनके पांच बच्चे थे.
साल 1978 में 62 साल की शाह बानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने अपने पति मोहम्मद अहमद ख़ान से तलाक़ के बाद हर महीने 500 रुपए गुजारा भत्ते की मांग की.
उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ते की मांग की थी. उनके पति मोहम्मद अहमद ख़ान ने तर्क दिया था कि भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तलाक़ के बाद पति इद्दत की मुद्दत तक ही गुज़ारा भत्ता देता है.
मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक़ इद्दत वह अवधि होती है, जब एक पत्नी अपने पति की मौत या तलाक के बाद बिताती है. ये तीन महीने का समय होता है, लेकिन स्थिति के अनुसार इसमें बदलाव किया जा सकता है.
इस मामले पर लंबी सुनवाई चली. 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फ़ैसला सुनाया. कोर्ट का कहना था कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी नागरिकों पर लागू होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो.
फ़ैसले को मुस्लिम महिलाओं के लिए जीत माना गया है, लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने इसका विरोध किया और इसे शरीयत में दखल करार दिया.
विरोध के दबाव में एक साल बाद राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण अधिनियम), 1986 पास कर दिया.
इसकी नतीजा ये हुआ कि शाह बानो के मामले पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट गया और कहा गया कि इद्दत की अवधि के लिए ही भत्ता दिया जा सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.