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बांग्लादेश की आर्मी ने अपने भीतर तख़्तापलट की ख़बर पर क्या कहा, जानिए रिपोर्ट में है क्या
बांग्लादेश की सेना के भीतर कथित टकराव से जुड़ी एक रिपोर्ट भारत के एक अंग्रेज़ी अख़बार ने मंगलवार को प्रकाशित की थी.
इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बांग्लादेश आर्मी में पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी परस्त लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ुर रहमान ने अन्य जनरलों के समर्थन से बांग्लादेश आर्मी के मौजूदा चीफ़ जनरल वक़ार-उज़-ज़मां को हटाने की कोशिश की थी, लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने से यह नाकाम रहा.
अब बांग्लादेश आर्मी ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए कहा है कि यह पूरी तरह से बेबुनियाद है. मंगलवार रात बांग्लादेश की इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन डायरेक्टोरेट यानी आईएसपीआर ने इस रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए विरोध दर्ज कराया है.
आईएसपीआर ने अपने बयान में कहा है, ''बांग्लादेश आर्मी ने भारत के कुछ मीडिया आउटलेट्स में बेबुनियाद रिपोर्ट देखी हैं. इस रिपोर्ट में आर्मी के भीतर ही संभावित तख़्तापलट का दावा किया गया है.''
''ये रिपोर्ट पूरी तरह से बेबुनियाद है और बांग्लादेश में अस्थिरता लाने के लिए जानबूझकर ग़लत सूचना फैलाने के लक्ष्य से प्रकाशित की गई है. बांग्लादेश की सेना मज़बूती के साथ एकजुट है और मौजूदा आर्मी चीफ़ के नेतृत्व में अपने संवैधानिक दायित्वों को लेकर प्रतिबद्ध है.''
इकनॉमिक टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''लेफ्टिनेंट जनरल रहमान को बांग्लादेश मिलिट्री इंटेलिजेंस डीजीएफ़आई ने निगरानी में डाल दिया है. बांग्लादेश वाचर्स का कहना है कि हालात तनावपूर्ण हैं. चेतावनी दी गई है कि अगले कुछ दिनों में बांग्लादेश में भारी उथल-पुथल देखने को मिल सकता है.''
''हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल ने बांग्लादेश सेना के मुख्यालय में एक बैठक बुलाई थी और इसमें अपनी ताक़त मापने की कोशिश की थी. इस बैठक का लक्ष्य था कि बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच सेना में तख़्तापलट किया जा सके. लेकिन इस बैठक में सीनियर अधिकारियों की मौजूदगी बहुत कम थी.''
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बांग्लादेश की आर्मी ने रिपोर्ट को ख़ारिज किया
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, ''इस साज़िश में बांग्लादेश आर्मी के कई अधिकारी कथित रूप से शामिल थे. जनरल ऑफिसर्स कमांडिंग (जीओसी) के 10 अधिकारियों का नाम इसमें आया है. इसमें मेजर जनरल मीर मुशफिक़ुर रहमान भी हैं, जो जीओसी के 24 इन्फैन्ट्री डिवीजन में हैं और वह चटगाँव के एरिया कमांडर हैं.''
''रहमान लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का प्रमोशन चाहते हैं. इसके अलावा मेजर जनरल अबुल हसनत मोहम्मद तारिक़ भी हैं, जो जीओसी 33 इन्फैन्ट्री में हैं. ये सभी जनरल रहमान का समर्थन कर रहे हैं.''
इकनॉमिक टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''बांग्लादेश के मौजूदा आर्मी प्रमुख जनरल वक़ार वैचारिक रूप से मध्यमार्गी माने जाते हैं. इन्हें भारत की तरफ़ झुकाव रखने वाला माना जाता है और बांग्लादेश में इस्लामिक दबदबे वाली सरकार के विरोधी रहे हैं.''
''जनरल वक़ार ने इस बात को सुनिश्चित किया था कि शेख़ हसीना सुरक्षित भारत पहुँच जाएं. पिछले साल पाँच अगस्त को इस्लामी पार्टियों की अगुआई वाली भीड़ शेख़ हसीना के आवास पर पहुँच गई थी. हाल ही में जनरल वक़ार ने संकेत दिया था कि बांग्लादेश में क़ानून व्यवस्था बनाए रखने में सेना बड़ी भूमिका निभा सकती है.''
इकनॉमिक टाइम्स के इन दावों पर बांग्लादेश की सेना ने कहा है, ''यह हमारे लिए चिंता की बात है कि इकनॉमिक टाइम्स लगातार इस तरह की ग़लत सूचना फैलाने का काम कर रहा है. बांग्लादेश की आर्मी में किसी भी तरह की कोई आंतरिक कलह नहीं है.''
''हम ख़ासकर भारत के मीडिया आउटलेट्स से आग्रह करेंगे कि कम से कम पत्रकारिता की बुनियादी बातों का तो ध्यान रखें. बिना पुष्टि के कोई सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित करना पत्रकारिता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है."
इससे पहले पिछले महीने जनरल वक़ार-उज़-ज़मां ने बांग्लादेश के नेताओं को चेतावनी देते हुए कहा था, ''अगर आप आपसी मतभेदों से ऊपर नहीं उठेंगे और आपस में ही लड़ते रहेंगे तो हमारे देश की एकता और अखंडता ख़तरे में पड़ जाएगी. अगर आप आपस में ही एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहेंगे तो इससे कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है.''
इसी साल जनवरी महीने में बांग्लादेश के अख़बार 'प्रथम आलो' को दिए इंटरव्यू में वहाँ जनरल वक़ार-उज़-ज़मां ने भारत को लेकर कई बातें कही थीं.
उन्होंने कहा था, ''भारत एक अहम पड़ोसी देश है. हम कई मामलों में भारत पर निर्भर हैं. दूसरी तरफ़ भारत को भी हमसे कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं. भारत के बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश में काम करते हैं. भारत के ये कामगार दिहाड़ी के साथ स्थायी काम भी करते हैं.''
भारत को लेकर बांग्लादेश के आर्मी प्रमुख की सोच
जनरल ज़मां ने कहा था, ''बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लोग भारत इलाज कराने जाते हैं. हम भारत से कई चीज़ें ख़रीदते हैं. ऐसे में बांग्लादेश की स्थिरता में भारत के व्यापक हित जुड़े हुए हैं. दोनों देशों के बीच लेन-देन का संबंध है. दोनों देशों के बीच संबंध बराबरी और ईमानदारी की बुनियाद पर होने चाहिए.''
जनरल ज़मां ने कहा था, ''कोई भी देश दूसरे देश से फ़ायदा चाहता है. मुझे नहीं लगता है कि इसमें कुछ भी ग़लत है. दोनों देशों के बीच बराबरी के आधार पर अब भी अच्छे संबंध हैं. लोगों को ये नहीं सोचना चाहिए कि भारत का हम पर दबदबा है. ऐसा होगा तो हमारे हितों के ख़िलाफ़ होगा.''
भारत और बांग्लादेश दोनों एक-दूसरे के लिए अहम मुल्क हैं. लेकिन पिछले साल पाँच अगस्त को शेख़ हसीना प्रधानमंत्री को हिंसक विरोध-प्रदर्शन के बीच भारत में शरण लेनी पड़ी थी. इसके बाद से दोनों देशों में अविश्वास बढ़ता गया और अभी तक वो भरोसा बहाल नहीं हो पाया है.
बांग्लादेश को 'इंडिया लॉक्ड' मुल्क कहा जाता है. दरअसल, बांग्लादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है. भारत और बांग्लादेश के बीच 4,367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और यह उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 फ़ीसदी है. यानी बांग्लादेश लगभग चारों तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है.
कहा जा रहा है कि शेख़ हसीना की सत्ता से बेदख़ली के बाद बांग्लादेश में पाकिस्तान परस्त नेताओं का बोलबाला बढ़ा है. बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी को हमेशा से पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने वाले इस्लामिक धड़े के रूप में देखा जाता है. मोहम्मद यूनुस की सरकार को बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी भी समर्थन कर रहा है.
पिछले महीने ही प्रथम आलो को दिए इंटरव्यू में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, ''1971 में हमारा रुख़ सिद्धांत से जुड़ा था. हम भारत के फ़ायदे के लिए स्वतंत्र देश नहीं चाहते थे. हम चाहते थे कि पाकिस्तानी हमें मताधिकार देने के लिए मजबूर हों."
शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, "अगर हमें किसी के ज़रिए या किसी के पक्ष में आज़ादी मिलती तो यह एक बोझ हटाकर दूसरे बोझ के तले दबने की तरह होता. पिछले 53 सालों से बांग्लादेश के लिए क्या यह सच नहीं हुआ है? हमें यह क्यों सुनने के लिए मिलना चाहिए कि कोई ख़ास देश किसी ख़ास पार्टी को पसंद नहीं करता है. कोई ख़ास देश अगर नहीं चाहता है तो कोई ख़ास पार्टी सत्ता में नहीं आ पाती है. क्या स्वतंत्र देश का यही तेवर होता है? बांग्लादेश के युवा अब ये सब सुनना नहीं पसंद करते हैं.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित