ईरान और पाकिस्तान के बीच छिड़े विवाद पर क्या कह रहा है पाकिस्तानी मीडिया?

''ईरान पर जवाबी कार्रवाई ज़रूरी थी.''

''हिसाब बराबर हो गया है. दूसरा संकट नहीं खड़ा करें.''

''पाकिस्तान इराक़, सीरिया और लेबनान नहीं है.''

ये शब्द पाकिस्तान के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की है, जो ईरान पर पाकिस्तान की कथित जवाबी कार्रवाई को सही ठहराया है.

पश्चिमी पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले के दूसरे दिन पाकिस्तान ने आज ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में चरमपंथियों को निशाना बनाते हुए हमले का दावा किया है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि आज सुबह किए गए इस हमले में पाकिस्तानी सेना ने ईरान में शरण लेकर रह रहे पाकिस्तानी मूल के आतंकवादियों को निशाना बनाया गया है. और इस ऑपरेशन का नाम रखा गया है ‘मार्ग बार सर्माचार’.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा है, “पाकिस्तान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को हर ख़तरे से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है. पाकिस्तान अपनी सुरक्षा के लिए आगे भी इस तरह के क़दम उठाता रहेगा.”

इससे पहले मंगलवार को ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भी कुछ यही कहते हुए हमले किए थे कि उसने जैश अल-अद्ल नाम के संगठन को निशाना बनाया जो उसके यहां लगातार आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे रहा है.

ईरान और पाकिस्तान दोनों के रिश्ते सामान्य रहे हैं, दोनों मुस्लिम बहुल देश हैं और बीते 16 जनवरी को दोनों देशों की नौसेना ने संयुक्त सैन्य अभ्यास भी किया था.

वहीं जिस वक़्त ईरान के मीडिया में "पाकिस्तान के भीतर अतिवादी गुट जैश-अल-अद्ल के ठिकानों पर ईरान के मिसाइल हमलों" की ख़बर आ रही थी, कुछ उसी वक़्त ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान पाकिस्तान के केयरटेकर प्रधानमंत्री अनवर उल-हक़ काकड़ से मुलाक़ात कर रहे थे. ये मुलाक़ात यूरोप के स्वित्ज़रलैंड में दावोस में हो रहे सालाना वर्ल्ड इकोनॉमिस फ़ोरम कार्यक्रम में हुई थी.

ऐसे में ईरान का ये हमला कई मायनों में चौंकाने वाला था. ऊपर से आज पाकिस्तान की तरफ़ से भी जवाबी हमले किए गए.

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के यूजर्स बीते रात से ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रहे थे. यहां तक की पाकिस्तान के समाचार चैनल्स पर भी इस बात को लेकर बहस हो रही थी कि क्या ईरान ने पाकिस्तान को सीरिया या इराक़ मान लिया है? राजदूत वापस बुला लेने मात्र से क्या ईरान को कड़ा संदेश मिलेगा? और सवाल पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी उठें.

न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए पाकिस्तान के पत्रकार सलमान मसूद ने ईरान पर किए गए जवाबी हमले को सही ठहराया है.

मसूद ने अपने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा है, ''पाकिस्तान के दृष्टिकोण से, ईरान पर जवाबी हमले उन्हें रोकने के लिए आवश्यक थे. पाकिस्तान ने अब ईरान से आगे किसी भी ऐसे कदम से दूर रहने का आग्रह किया है. अन्यथा मामला और भी बढ़ सकता है.''

पाकिस्तान के समाचार चैनल समा टीवी में पत्रकार सैयद तलत हुसैन ने बीते मंगलवार बलोचिस्तान प्रांत में ईरान के हमलों पर टिप्पणी करते हुए एक्स पर लिखा है, '' देश में कोई आंतरिक मंत्री नहीं है, किसी ने केयरटेकर रक्षा मंत्री को न सुना, न देखा है (बिना गूगल किए नाम बताने वाले को 100 रुपए दिए जाएंगे) और केयरटेकर प्रधानमंत्री यूरोप के 10 दिनों के दौरे पर हैं, जो एक पिकनिक ट्रिप ज़्यादा लग रही है. और देश पर हर तरफ़ से हमले हो रहे हैं.

वहीं पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई पर हुसैन ने लिखा, ''पाकिस्तान की प्रतिक्रिया के बाद, ईरान के पास स्व-निर्मित संकट से बाहर निकलने का मौका है. हिसाब बराबर हो गया है. दूसरा संकट नहीं खड़ा करें. गलत धारणाएं न बनाएं. सहभागिता दिखाएं. लेकिन अगर वो इस रास्ते को नहीं चुनना चाहते तो ऐसा ही होगा. इसे व्यापक रूप से निपटाया जाएगा.''

वरिष्ठ पत्रकार डॉ क़मर चीमा ने कहा है कि पाकिस्तान इराक़, सीरिया या लेबनान नहीं है. ईरान पर पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई को सही ठहराते हुए उन्होंने लिखा, ''पाकिस्तान ने ईरान में 7 बलूच आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया है. पाकिस्तान के सब्र का इम्तिहान लेकर ईरान ने बड़ी ग़लती की है. पाकिस्तान इराक़, सीरिया और लेबनान नहीं है.''

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार कामरान ख़ान ने लिखा है कि पाकिस्तान में जल्द से जल्द चुनाव आयोजित किए जाने चाहिए.

क्या लिख रहे हैं पाकिस्तान के अख़बार?

पाकिस्तान के दैनिक अंग्रेज़ी अख़बार 'दी न्यूज़' ने लिखा, ''पाकिस्तान पर हमले से ठिक पहले, भले ही ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की मुलाक़ात हुई हो लेकिन उन्होंने इस संबंध में अपनी किसी योजना का कोई संकेत नहीं दिया था. जब प्रधानमंत्री को हमले की सूचना मिली तो वो चौंक गए.''

वहीं लाहौर से छपने वाले दैनिक अंग्रेजी अख़बार 'दी नेशन' में लिखे एक लेख में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत नज्म उस साकिब लिखते हैं, '' पाकिस्तान के 'भाई' देश के ख़िलाफ़ ईरान की ये आक्रामकता के पीछे एक सोची-समझी योजना की बू आती है क्योंकि मिसाइलों और ड्रोन के साथ 'ईरानी आतंकवादी समूह' को निशाना बनाना उचित रणनीति के बिना संभव नहीं है. इसमें समय लगता है. पाकिस्तान न तो इसराइल है, न इराक़, न सीरिया. पाकिस्तान की तुलना इन तीन देशों से और वह भी मित्रवत ईरान के द्वारा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.''

पाकिस्तानी अख़बार और अंग्रेज़ी न्यूज़ बेवसाइट 'डॉन' अपने संपादकीय में लिखता है, ''सीमा के दोनों ओर चरमपंथी समूह और उनकी गतिविधियां दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की सबसे बड़ी परेशानियों में से एक है, और पाकिस्तान और ईरान को इस मुद्दे को परिपक्व तरीके से हल करने की ज़रूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्थिति और खराब न हो. इन हमलों के बाद पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते एक नाज़ुक मोड़ पर हैं.''

अख़बार आगे लिखता है, ''इस बीच, यह भी सच है कि अलग-अलग विदेशी ताकतें पाकिस्तान-ईरान संबंधों में स्थायी विराम देखना चाहेंगी; इसलिए, दोनों देशों को तनाव बढ़ने से रोकना चाहिए और शांति बहाल करने के लिए काम करना चाहिए.''

पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने भी अपने एक लेख में हालिया हमलों के मद्देनज़र ईरान-पाकिस्तान रिश्तों पर चिंता ज़ाहिर की है.

अख़बार लिखता है, ''ये पहली बार है जब पाकिस्तान ने ईरान से अपने राजदूत को वापस बुला लिया,हालाँकि दोनों देशों के बीच पहले भी तनावपूर्ण संबंध रहे हैं. यह दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव के स्तर को दर्शाता है.''

कैसे रहे हैं ईरान-पाकिस्तान संबंध?

पाकिस्तान की पूर्वी सीमा ईरान से सटती है. दोनों लगभग 900 किलोमीटर (559 मील) लंबी सीमा साझा करते हैं और दोनों देशों की सीमा के पास पहले भी हमले होते रहे हैं.

अप्रैल 2023 में पाकिस्तान की सेना ने कहा था कि बलूचिस्तान में एक चरमपंथी हमले में चार पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हुई थी.

जानकार बताते हैं कि दोनों देशों के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. साल 1947 में पाकिस्तान को एक देश के तौर पर मान्यता देने वाला ईरान पहला देश था. ईरान में ही पाकिस्तान ने अपना पहला दूतावास खोला था.

साल 1965 में भारत के साथ जंग में ईरान पाकिस्तान के साथ खड़ा था. लेकिन 1979 में ईरान में हुई क्रांति और 'अफ़ग़ान जिहाद ' के दौरान पाकिस्तान का सऊदी से प्रेरित इस्लाम के वहाबी स्वरूप के प्रति झुकाव ने गलतफ़हमियां पैदा कर दीं.

फिर 1990 के दशक में ईरान पर पाकिस्तानी शियाओं के ज़रिए, देश में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने के आरोप लगते रहे. वहीं ईरान को भी पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार का समर्थन पसंद नहीं था.

धीरे-धीरे ईरान और भारत की बढ़ती दोस्ती और पाकिस्तान की अमेरिका से नज़दीकी ने दोनों देशों को और दूर कर दिया.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)