झारखंड: लड़ते तो हैं, पर पढ़ते क्यों नहीं विधायक जी!

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, राँची से

झारखंड विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान कम से कम दो बार ऐसे मौके आए, जब लगा कि सदन के अंदर मारपीट हो जाएगी. हालाँकि, स्पीकर के हस्तक्षेप और साथी विधायकों के बीच-बचाव के कारण ऐसी घटनाएँ समय रहते टल गईं.

विधानसभा अध्यक्ष और दूसरे विधायकों ने अपने साथियों की इन हरकतों की निंदा की और सभी आपत्तिजनक संवादों को विधानसभा की कार्यवाही से स्पंज (बाहर निकाल देना) कर दिया गया.

ऐसी घटनाएँ पहले भी होती रही हैं.

विधानसभा अध्यक्ष रह चुके एक वरिष्ठ बीजेपी विधायक की मौजूदा सरकार के एक मंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी भी स्पंज की जा चुकी है. उनकी टिप्पणियाँ ग़लत कारणों से हमेशा सुर्ख़ियों में रही हैं, जबकि वे ख़ुद भी स्पीकर रह चुके हैं.

झारखंड विधानसभा में हुई ऐसी घटनाओं को देखने पर कई बार ये सवाल उठता है कि क्या विधायकों की पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी कम हुई है.

क्या वे पढ़ना नहीं चाहते और आपसी संवाद ख़त्म हो रहा है. क्या उनके पास वक़्त की कमी है और वे पढ़ने के लिए अपने समय का प्रबंधन नहीं कर पा रहे. या फिर किताबों में उनकी रुचि ही नहीं है.

झारखंड विधानसभा की लाइब्रेरी में विधायकों की उपस्थिति और उनकी सदस्यता के आँकड़े इस सवाल को और पुख्ता करते हैं.

झारखंड विधानसभा लाइब्रेरी की सदस्यता लेने वाले विधायकों की संख्या एक दर्जन से भी कम है. इनमें भी ऐसे विधायक कम ही हैं जो नियमित तौर पर यहां आकर किताबें इश्यू करवाते हों.

हालाँकि, विधानसभा में होने वाली बहसों और तनातनी का किताबों से कोई सीधा संबंध नहीं है. कई बार बहुत पढ़ाकू राजनीतिज्ञों की भाषा का स्तर काफ़ी गंदा होता है, तो कई दफ़ा हमें वैसे विधायक प्रभावित कर जाते हैं, जो अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे हैं.

हाल ही में लोकसभा में हुई एक बहस भी चर्चा में रही जहाँ सत्तारूढ़ बीजेपी के एक सांसद ने विपक्षी सांसद के धर्म को लेकर असंसदीय टिप्पणी की. इसको लेकर हुए बवाल के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. वे दोनों पढ़े-लिखे राजनेता हैं.

बहरहाल, हम झारखंड विधानसभा के पुस्तकालय में विधायकों की कम दिलचस्पी होने की वजहें तलाशने की कोशिश करते हैं.

पढ़ने की आदत

झारखंड मुक्ति मोर्चा की सांसद और चर्चित उपन्यासकार महुआ माजी कहती हैं कि पढ़ने की आदत दरअसल बचपन से डाली जाती है. बाद में पढ़ने की आदत बना पाना कठिन होता है.

महुआ माजी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने बांग्ला के बड़े साहित्यकार और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे सुनील गंगोपाध्याय से एक बार पूछा कि बांग्ला समाज में पढ़ने की परपंरा कैसे कायम हुई. तब उन्होंने मुझसे कहा था कि बांग्ला साहित्यकारों ने बच्चों के लिए अधिक किताबें लिखीं. इसी वजह से बचपन में ही उनमें पढ़ने की आदत विकसित हो गई. यह आदत बेहद ज़रूरी है."

झारखंड के विधायकों पर वे कहती हैं, "जहाँ तक झारखंड के विधायकों की बात है, तो हमारे अधिकतर विधायक ग्रामीण इलाक़ों से हैं. उनका ज़्यादातर समय अपने इलाके में गुज़रता है. शायद यही कारण है कि वे लाइब्रेरी के लिए समय नहीं निकाल पाते."

साथ ही वे यह भी कहती हैं कि "यह इंटरनेट का युग है और बहुत सी सामग्री ऑनलाइन, गूगल पर मिल जाती हैं. विधानसभा की लाइब्रेरी में विधायकों की कम मौजूदगी की एक वजह ये भी है. लेकिन, किताबें जीवन और व्यवहार की समझ विकसित करती हैं. इससे इनकार नहीं किया जा सकता है."

पुस्तकालय के एक ज़िम्मेवार अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "लाइब्रेरी में आकर बैठने-पढ़ने के लिए विधायकों को इसकी सदस्यता लेना अनिवार्य नहीं है."

"वे इसकी सदस्यता लिए बग़ैर भी यहाँ आकर पढ़ सकते हैं. अपने लिए रेफ़्रेंस की सामग्री की कॉपी करा सकते हैं. कई विधायक ऐसा करते भी हैं लेकिन इनकी संख्या कम है."

उन्होंने कहा, "अधिकतर विधायकों की रुचि विधानसभा की कार्यवाही से संबंधित सामग्री में होती है. वे गाहे-बगाहे यहाँ आकर ऐसी सामग्री पढ़ते हैं जिसका सदन में होने वाले बहसों में उपयोग हो. हमारे पास तत्कालीन बिहार विधानसभा (जब झारखंड बिहार से अलग नहीं हुआ था) की कार्यवाहियों की पुस्तकें भी उपलब्ध हैं. आज़ादी से पहले के भी रेफ़्रेंस हैं. लोकसभा की कार्यवाही की पुस्तकें भी हैं. विधायकों की दिलचस्पी दरअसल इन किताबों में ज़्यादा है.''

सावरकर समग्र लेकिन बिरसा गैलरी नहीं

झारखंड विधानसभा के पुस्तकालय में क़रीब चौदह हज़ार किताबें, पत्रिकाएँ और जर्नल हैं.

इनमें इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, क़ानून, साहित्य के अलावा संविधान सभा के वाद-विवाद, झारखंड लोकल एक्ट, झारखंड के महत्वपूर्ण क़ानूनी जजमेंट, विश्वकोश, आत्मकथाएँ और झारखंड पर केंद्रित किताबें शामिल हैं.

बीबीसी टीम को पुस्तकालय में सावरकर समग्र के सभी खंड और इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ हिंदुइज्म जैसी किताबें भी दिखीं.

इनके साथ पूर्व राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर, पूर्व उपप्रधानमन्त्री लालकृष्ण आडवाणी लिखित या उनपर केंद्रित किताबें भी पुस्तकालय में हैं.

महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू, कर्पूरी ठाकुर और अल्बर्ट आइंस्टाइन से संबंधित किताबें भी यहाँ रखी गई हैं.

प्रख्यात पत्रकार और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश की झारखंड केंद्रित कई किताबें भी यहाँ उपलब्ध हैं. इन किताबों में झारखंड के आदिवासी नायकों की कहानियाँ तो हैं, लेकिन बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हो, पोटो हो, फूलो-झानू आदि पर केंद्रित किताबें अलग से नहीं दिखती हैं.

"इस पुस्तकालय में बहुत काम किए जाने की ज़रूरत"

कांग्रेस की विधायक दीपिका पांडेय सिंह बीबीसी से कहती हैं कि झारखंड विधानसभा की लाइब्रेरी में अभी बहुत काम किए जाने की ज़रूरत है. तभी आप विधायकों या दूसरे लोगों को आकर्षित कर पाएँगे.

उन्होंने अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के पुस्तकालय का ज़िक्र किया और बोलीं, "हमें अरुणाचल जैसे राज्यों से सीखना होगा कि पुस्तकालय को कैसे समृद्ध बना सकते हैं. सर्विसेज़ कैसे ठीक रख सकते हैं. इस पुस्तकालय का उपयोग रिसर्च स्कॉलर्स और छात्र करें, इस दिशा में हमें सार्थक पहल करनी होगी."

बिरसा मुंडा की गैलरी की मांग

विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने कहा, ''हमें भारत की संसद और कुछ दूसरे राज्यों की विधानसभाओं के पुस्तकालयों में जाने का अवसर मिला है. वहाँ महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू जैसे महापुरुषों की पुस्तकों की अलग गैलरी है.''

वे कहती हैं, "झारखंड विधानसभा के पुस्तकालय में हमें अपने राज्य के नायकों से संबंधित पुस्तकों की अलग से गैलरी बनानी चाहिए. कमसे कम बिरसा मुंडा की गैलरी तो ज़रूर हो, जो फ़िलहाल नहीं है."

झारखंड विधानसभा की पुस्तकालय विकास कमेटी की सदस्य और कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह भी इन बातों से इत्तिफ़ाक़ रखती हैं. वे गिनती के उन विधायकों में शामिल हैं, जो अपने लिए पुस्तकें निर्गत कराती हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैंने पुराने विधानसभा भवन से नए विधानसभा भवन में पुस्तकालय शिफ़्ट कराने में बड़ी मेहनत की थी. अब यहाँ जगह तो मिल गई लेकिन पुस्तकालय कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पुरानी ही है. वे किताबों की तलाश के लिए आज भी पुराने रजिस्टर पर निर्भर हैं. इस कारण भी लोग यहाँ आने से हिचकते हैं. इसे ठीक करना होगा."

क्या कहते हैं विधानसभा अध्यक्ष

झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो पुस्तकालय को लेकर काफ़ी उत्साहित नज़र आते हैं. उन्होंने ख़ुद भी किताब लिखी है और अपने ज़िले जामताड़ा में नई लाइब्रेरी खोलने के अभियान में शामिल रहे हैं.

हालाँकि, वे विधायकों की पढ़ने में रुचि कम होने जैसी बात को तवज्जो नहीं देते. उनकी दलील है कि कई विधायकों के आवास पर अच्छी लाइब्रेरी है.

वे कहते हैं, "वे वहीं पढ़ते-लिखते हैं. कुछ विधायकों ने किताबें भी लिखी हैं."

हालांकि साथ ही वे यह कहते हुए कि "सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती" सलाह देते हैं कि "विधायकों को विधानसभा के पुस्तकालय का उपयोग भी करना चाहिए."

लाइब्रेरी को समृद्ध करने की योजना

स्पीकर रवींद्र नाथ महतो ने बीबीसी से कहा, "हम लोग ई-लाइब्रेरी की तरफ़ भी बढ़ रहे हैं. किताबों का एक्सेस आसान हो, यह प्रयास है. बिहार से अलग होने का यह 23वाँ साल है. तब हमारे पास काफ़ी कम किताबें थीं. अब हम लोगों ने यह संख्या बढ़ाई है. लेकिन, देश की कई विधानसभाओं में 50 हज़ार से लेकर एक लाख तक किताबें हैं. हम लोग वैसी लाइब्रेरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं."

"हमने इस लाइब्रेरी को शोध छात्रों के लिए भी खोलने की पहल की है. अभी क़रीब 20 रिसर्च स्कॉलर यहाँ आ रहे हैं. हम यह संख्या भी बढ़ाना चाहते हैं."

"झारखंड के कई नायकों को देश के लोग नहीं जानते. इतिहास ने सबको जगह नहीं दी. हम ऐसे नायकों पर केंद्रित किताबें इस पुस्तकालय में रखने वाले हैं. हम चाहते हैं कि न केवल विधायक बल्कि विधानसभा के पदाधिकारी-कर्मचारी भी पढ़ें. अपनी पसंद बताएँ, किताबें उपलब्ध कराना हमारा काम है."

मुख्यमंत्री आवास में भी पुस्तकालय

झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने शपथग्रहण के बाद मिलने आने वाले लोगों से फूलों के गुलदस्ते की जगह पुस्तकें भेंट देने की अपील की थी.

आज भी उनसे मिलने वाले लोग उन्हें पुस्तकें भेंट देते हैं. इन पुस्तकों से उनके आवास में भी एक समृद्ध लाइब्रेरी बन गई है.

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