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कमला हैरिस के साथ अगर ये बातें ना होतीं तो क्या वो चुनाव जीत जातीं?
- Author, इशाद्रिता लाहिड़ी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिका में जो भी चुनावी सर्वे आ रहे थे, उनमें बताया रहा था कि कमला हैरिस ट्रंप को चुनौती देने के लिए मज़बूत उम्मीदवार हैं लेकिन चुनावी नतीजे बिल्कुल अलग रहे.
कमला हैरिस क्यों हार गईं, अब इसकी समीक्षा की जा रही है और अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं.
चुनावी अभियान की देर से शुरुआत, जो बाइडन के कार्यकाल का बोझ और अमेरिकी मध्य वर्ग से संवाद की असमर्थता, विशेषज्ञों का कहना है कि ये कुछ कारण हैं, जिनकी वजह से कमला हैरिस अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हार गईं.
बीबीसी हिंदी ने हैरिस की हार के कारणों को समझने के लिए तीन विशेषज्ञों से बातचीत की है.
आख़िरी समय में उम्मीदवारी में हुआ बदलाव
इस साल अगस्त में ही कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया था.
ये तब हुआ जब राष्ट्रपति जो बाइडन ने राष्ट्रपति की दौड़ से बाहर होने का फ़ैसला लिया.
इस वजह से हैरिस को कैंपेन के लिए बहुत कम समय मिला जबकि ट्रंप इस साल की शुरुआत से ही चुनावी अभियान में लगे हुए थे.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गहरी नज़र रखने वाली और अनंता सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची कहती हैं, ''उन्हें (हैरिस) सिर्फ़ 100 दिन पहले ही नामांकन मिला. इसमें एक तरह की फिजिकल और लॉजिस्टिकल चुनौती है. उन्हें अमेरिका जैसे बड़े देश को कवर करना था और बेहद कम समय में टीम खड़ी करनी थी.''
अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत नवतेज सरना का कहना है कि जिस तरह से उन्हें एक उम्मीदवार के तौर पर सामने लाया गया, वो एक गंभीर दावेदार के लिए बहुत देर से उठाया गया क़दम था.
बीबीसी से वो कहते हैं, ''अगर किसी उम्मीदवार को पहले से ही प्राइमरी के ज़रिए आने और एक कैंपेन तैयार करने का वक़्त मिलता तो शायद वो बेहतर हो सकता था.''
क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी की फैकल्टी ज़िनिया बहल कहती हैं कि हैरिस के डेमोक्रेटिक प्राइमरी से होकर नहीं आने की वजह से कई लोगों को उनकी उम्मीदवारी सही नहीं लगी.
बहल का कहना है, ''उम्मीदवारी में बदलाव, ट्रंप की हत्या की कोशिशों के तुरंत बाद हुआ था. लोगों को लगा कि हैरिस वहां तक उस सही प्रक्रिया से नहीं पहुंचीं, जैसे ट्रंप पहुंचे थे. उन्हें लगा कि वो वहाँ बस इसलिए पहुंचीं क्योंकि वो एक महिला थीं और उनके पास रंग का आधार था.''
बाइडन के कार्यकाल का बोझ
कमला हैरिस को जो बाइडन के ख़िलाफ तैयार हुई सत्ता-विरोधी भावना का बोझ उठाना पड़ा, इस बात से तीनों विशेषज्ञ सहमत थे.
चुनाव से पहले किए गए ओपिनियन पोल्स में बाइडन की अप्रूवल रेटिंग केवल 40 फ़ीसद थी, जो कि एक बाइपोलर राजनीति में काफ़ी कम मानी जाती है.
हैरिस ख़ुद को बाइडन की नीतियों से अलग नहीं कर सकीं और इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा.
नवतेज सरना का कहना है कि ट्रंप ने एक सुव्यवस्थित रणनीति के तहत हैरिस को बाइडन की नाकामियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश की, चाहे वो अर्थव्यवस्था का मामला हो या इमिग्रेशन से जुड़ा मुद्दा.
वो कहते हैं, "हक़ीक़त ये है कि ट्रंप ने ये सुनिश्चित किया कि हैरिस को बाइडन प्रशासन के सभी कामकाज़ से जोड़ा जाए, जिससे वो (हैरिस) देश में पिछले चार साल से चल रही समस्याओं से ख़ुद को अलग नहीं कर सकीं.''
''इनमें अर्थव्यवस्था, इमिग्रेशन और विदेश नीति शामिल हैं. इसी वजह से उन्होंने गर्भपात और महिलाओं के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की क्योंकि वहाँ उन्हें लगा कि ट्रंप पर उनकी बढ़त हो सकती है. लेकिन वो इस तथ्य से दूर नहीं रह सकीं कि वो उपराष्ट्रपति भी थीं."
बागची और बहल बताती हैं कि भले ही हैरिस बाइडन की डिप्टी थीं, उनके पास अहम नीतियों से जुड़े फ़ैसले लेने की संवैधानिक शक्तियां नहीं थीं. हालांकि अमेरिका के लोगों ने इसे इस रूप में नहीं देखा.
इंद्राणी बागची कहती हैं, ''बाइडन का बोझ हैरिस पर आ गया, भले ही वो अहम मुद्दों पर फ़ैसले लेने वाली नहीं थीं. अमेरिकी चुनाव में वोटों में मामूली बदलाव का भी बड़ा असर होता है. भारत की तुलना में वहाँ के चुनाव थोड़े अलग होते हैं क्योंकि वहाँ लड़ाई एक छोटे से निर्णायक वोटरों के समूह के लिए होती है. ट्रंप का अपना आधार था और हैरिस का अपना आधार था और वो जनसंख्या के एक छोटे से हिस्से के लिए संघर्ष कर रहे थे.''
बहल कहती हैं, ''अर्थव्यवस्था और इमिग्रेशन पर बाइडन की कई नीतियों की मीडिया में आलोचना हुई थी. लोगों को लगा कि उपराष्ट्रपति के तौर पर हैरिस वो नहीं कर सकीं जो उन्हें करना चाहिए था, भले ही संवैधानिक तौर पर उपराष्ट्रपति के पास वो शक्तियां नहीं होती हैं.''
बहल ये भी कहती हैं कि ट्रंप ने इमिग्रेशन के प्रति लोगों की चिंता का “बहुत अच्छे से” इस्तेमाल किया, ख़ासकर अवैध माइग्रेंट्स पर लगातार हमलों के साथ. ''ये दिलचस्प है क्योंकि उनके पिछले कार्यकाल के दौरान अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ गई थी.”
'मध्य वर्ग को नहीं समझ सकीं हैरिस'
बहल का मानना है कि अमेरिकी मध्यम वर्ग की भावनाओं को समझने में हैरिस असफल रहीं, ये वर्ग बढ़ती महंगाई से जूझ रहा है. शायद यही वजह है कि उन्होंने अपने प्रमुख वोटरों, जैसे ब्लैक और हिस्पैनिक समुदायों का पूरा समर्थन नहीं ले पाईं.
वो कहती हैं, ''ब्लैक और हिस्पैनिक वोटरों का मानना था कि बाइडन ने उनके लिए कुछ ख़ास नहीं किया. राष्ट्रपति ओबामा ने विशेष रूप से ब्लैक वोटरों से अपील की थी क्योंकि शुरुआती पोल्स में दिखा था कि ब्लैक और लैटिन वोटर हैरिस के प्रति सकारात्मक नज़रिया नहीं रखते थे.''
''इनमें से कई ने कहा था कि वे उनकी नीतियों और महंगाई पर किए गए काम से सहमत नहीं थे. वास्तव में, ब्लैक और लैटिन वोटर ही आर्थिक बदलावों से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनमें से कई महीने-दर-महीने की आय पर निर्भर रहते हैं. जब आप खाने का इंतज़ाम करने में मुश्किल में होते हैं, तो नस्ल और लिंग जैसे बाहरी मुद्दों की चिंता करना संभव नहीं होता.''
सरना भी इससे सहमत हैं. वो कहते हैं कि एक सीमा के बाद, नस्ल और लिंग जैसे मुद्दे उन लोगों के लिए महत्वहीन हो जाते हैं जो बुनियादी ज़रूरतों की चिंता में लगे होते हैं.
वो कहते हैं, ''ट्रंप ने अर्थव्यवस्था और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मुद्दों पर ऐसी भाषा में बात की जो उन लोगों को भी समझ आती है, जिनके पास कम विशेषाधिकार हैं. इसलिए, इन वंचित समूहों में से अधिकांश ने सोचा कि ट्रंप इन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं. दूसरी ओर, हैरिस को इन समस्याओं से जोड़ा गया और उनके पास कहने के लिए कुछ नया नहीं था.''
बहल ये भी बताती हैं कि एक महिला उम्मीदवार होने के बावजूद, हैरिस को हार का सामना करना पड़ा, जबकि ज़्यादातर अमेरिकी वोटर गोरी महिलाएं हैं.
वो कहती हैं, "अमेरिका में सबसे बड़ा वोटर समूह गोरी महिलाओं का है और इस चुनाव में महिलाओं ने बड़ी संख्या में वोट किया. तो दिलचस्प बात ये है कि इसके बावजूद ज़्यादा वोट ट्रंप को मिले."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित