वसुंधरा राजे अगर मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं तो राजस्थान के सियासी मौसम का मिज़ाज कैसा रहेगा? - नज़रिया

    • Author, त्रिभुवन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान की सियासत के समंदर में हर दिन नई लहरें उठ रही हैं. राजनीतिक गलियारों में लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार कोई ताज़ा हवा चलने की उम्मीद है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का एक समूह मान चुका है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को अब नई सरकार की कमान सौंपे जाने की संभावनाएं नगण्य हैं.

इसके प्रतिकूल पर्यवेक्षकों का एक वर्ग मानता है कि लोकसभा चुनावों और प्रदेश की 25 सीटों को जीतने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्हें एक बार फिर नेतृत्व सौंपा जा सकता है. यही वह कारण है, जिससे वसुंधरा राजे के समर्थक नाउम्मीद नहीं हैं.

लेकिन इसके बावजूद प्रदेश के नाज़ुक मिज़ाज सियासतदानों में अब यह संभावनाएं भी टटोली जा रही हैं कि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री नहीं बनती हैं तो फिर क्या-क्या हो सकता है?

क्या वे विद्रोह कर देंगी?

आख़िर उनके सरकारी आवास पर तीन दिन से लगातार नवनिर्वाचित विधायकों का आना-जाना लगा हुआ है.

सीएम नहीं तो और क्या?

मीडिया में चल रहा है कि वसुंधरा राजे को 70 विधायकों का खुला समर्थन है. लेकिन क्या वाक़ई ऐसा है? और अगर ऐसा है तो इसके क्या मायने हैं?

जानकारों का मानना है कि यह सब मीडिया की कहानियां हैं और हाईकमान को ताक़त दिखाने जैसी कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ दूसरे लोग मानते हैं कि सियासत में इस तरह के संकेतों के भी अपने मायने हैं.

सियासी सवालों की इसी फ़ेहरिस्त में एक सवाल ये भी है कि वसुंधरा राजे अगर मुख्यमंत्री नहीं बनीं तो क्या उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया जाएगा? जैसा कि काँग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद के दावेदार सीपी जोशी को इस बार विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया था.

इससे पहले जब 1977 में महारावल लक्ष्मण सिंह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए और इस पद के लिए हुए सियासी संघर्ष में भैरो सिंह शेखावत क़ामयाब रहे. तो महारावल को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया.

1990 और 1993 में शेखावत के नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी हरिशंकर भाभड़ा थे. भाभड़ा मुख्यमंत्री नहीं बन सके तो उनके कद को देखते हुए उन्हें दोनों बार विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया.

विधानसभा अध्यक्ष ऐसा पद है, जिसके सामने मुख्यमंत्री और पूरा मंत्रिमंडल तो नतमस्तक रहता ही है, राज्य की ब्यूरोक्रेसी पर भी उसकी पूरी पकड़ रहती है.

अशोक गहलोत के दूसरे मुख्यमंत्री काल में विधानसभा अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत अक्सर ही सरकार के प्रमुख नौकरशाहों को तलब किए रहते थे.

पार्टी में बढ़ा महत्व

तो क्या उन्हें केंद्र में ले जाया जा सकता है या वे राज्यपाल बन सकती हैं?

इसका जवाब भी ना ही है, क्योंकि वो कितनी ही बार कह चुकी हैं कि वो अब जीएंगी तो राजस्थान की माटी में और मरेंगी तो इस प्रदेश के आंचल में. समझा जाता है कि राज्यपाल के पद के लिए वो पहले ही इनकार कर चुकी हैं.

भाजपा की नई सियासत की धूप और परछाइयों का इल्म रखने वालों का कहना है कि अभी तो जितना अँधेरा छाया हुआ है, वह सब रोशनी-फ़रोशों का ही क़माल है.

तो क्या कहीं विद्रोह भी संभावित है? जैसा कि कांग्रेस आलाकमान के ख़िलाफ़ हो चुका है और वह भी उस पार्टी के सबसे क़रीबी का. क्या भाजपा में भी अब ऐसा संभव है?

सियासी चादर के नीचे इस तरह के सवाल भी तैर रहे हैं. लेकिन माना जाता है कि वसुंधरा राजे यह सब नहीं करेंगी, क्योंकि अगर उन्हें कुछ करना ही होता तो वे चुनाव से पहले करतीं.

और फिर, जिस तरह से बहुमत में महज 15 सीटों का मार्जिन रहा है, उसे देखते हुए तो वे खेल कर ही सकती थीं. लिहाजा, ऐसा लगता है कि केंद्र जो भी फ़ैसला करेगा, वे उसके साथ रहेंगी.

जानकारों का कहना है कि वो इस समय शांत रहकर पार्टी के निर्णय के साथ रहेंगी.

राजनीति के जानकारों का यह भी कहना है कि कांग्रेस में तो अब तिनके भी हाईकमान की आंख में आकर गिर रहे हैं, जहाँ पहले कभी ऐसा सपने में भी नहीं सोचा जा सकता था.

लेकिन भाजपा में अब हाईकमान इतना ताक़तवर है और उसके मिज़ाज और सियासी सितम ढा देने वाली अदाओं को देखते हुए वहां विद्रोह की संभावना भी न के बराबर है.

इतने सारे विधायक आकर मिल लिए हैं तो बात तो साफ़ हो ही गई है ना, कि सबसे पावरफ़ुल कौन है?

यह सवाल हवा में तैरता है, तो जवाब कुछ इस तरह आता है कि- मुझे ख़बर है कि इस मुश्ते ख़ाक हूं, फिर भी तू क्या समझ के हवा में उड़ा रहा है मुझे.

भाजपा में अभी हर नेता की हालत मुश्ते ख़ाक जैसी है और मोदी-शाह युग में अटल-आडवाणी वाले युग की बात सोची भी नहीं जा सकती.

क्या केंद्र का रुख़ कर सकती हैं?

अधिकतर लोग मानते हैं कि अभी सरकार आसानी से बन जाएगी, उसे बहुमत मिल जाएगा और लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

सब लोग उसमें जुट जाएंगे. मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले भी, उससे वंचित रह जाने वाले भी और मुख्यमंत्री बनने वाले भी और इससे महरूम रह जाने वाले भी. तो वो भी प्रदेश की सभी 25 सीटों पर जीत हासिल करने की कोशिश में जुटेंगी.

समझा जाता है कि अभी राजस्थान की राजनीति के भविष्य की तस्वीर लोकसभा चुनावों के बाद स्पष्ट होगी. प्रदेश में कांग्रेस की सियासत का ऊँट भी दो साल बाद उठा तो आख़िर तक बलबलाता रहा और उसने माहिरोमाहिर सवार को पांवों तले ले लिया.

तो क्या वो लोकसभा लड़ेंगी और केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई बड़ा पद लेंगी?

इस तरह के सवाल भी कम नहीं हो रहे. लेकिन यह कोई सियासी तिलिस्म से जुड़ा मामला नहीं है और इसका सीधा-सा जवाब यह ये है कि हालात में कुछ हैरान करने वाला नहीं हुआ, तो लोकसभा चुनाव में उनके बेटे दुष्यंत सिंह ही लड़ेंगे.

भाजपा में केंद्रीय कक्ष का शक्ति संतुलन अब एकदम बदल चुका है और उसके ख़िलाफ़ विद्रोह करने की बात, अपने तो क्या प्रतिपक्षी भी नहीं सोचते. तो ऐसे हालात में शांत रहो, देखो और ऊपर की कृपा बरसने की आशा रखो के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता.

ऐसे में भविष्य में उनके लिए उप-राष्ट्रपति, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाने जैसे मौक़े भी रहते हैं.

इस समय भाजपा की अंदरूनी तस्वीर यह है कि वहां अब सब क्षत्रपों की आंखें झुकी रहती हैं और किसी की अना में कहीं कोई ख़म नहीं मिलता. राजस्थान भी अब इस राह से अलग नहीं.

लेकिन सियासत का सबसे बड़ा सवाल ये है कि आख़िर जिस समय भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व देशभर में नारी शक्ति वंदन क़ानून बनाकर महिलाओं को आरक्षण दे रहा है और देश की राजनीति में बदलाव की बातें करता है, ऐसे समय में वह अपनी सबसे ताक़तवर और अपना ख़ास प्रभामंडल रखने वाली नेता को क्यों दरकिनार रहा है. बहुत से विश्लेषकों को इसका कारण समझ नहीं आता.

पार्टी में हो गए हैं बड़े बदलाव

संघनिष्ठ जानकारों का यहां बस यही कहना है कि भाजपा में यह सब किसी के व्यक्तिगत विरोध में नहीं हो रहा. इसके पीछे मूल नज़रिया 2047 की भाजपा को तैयार करने के हिसाब से चाल-चरित्र और चेहरों की कोशिश है, जो संभवत: रुकेगी नहीं.

हालात कुछ ऐसे हैं, मानो युद्ध जीत लिया गया है. बादशाहत के दावेदार अपने घोड़ों पर तैयार हैं. इन घोड़े की रिकाबों में मज़बूती से जमे पांव अचानक सो गए हैं और घोड़ा जाने आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं है. वह मालिक के बजाय किसी और के इशारे के इंतज़ार में है.

हम जब इस सियासी मेटाफ़र को सुनते हैं तो ठहका लगाने से पहले सुनाने वाला बताता है कि इसकी वजह न तो ऊपर बैठा सवार है और न ही कुछ और. दरअसल, अब घोड़े ही बदल दिए गए हैं और अब बैठने वालों के नहीं बल्कि अस्तबल के इशारे से चलते हैं.

अगर भाजपा की सियासत पर नज़र रखने वालों की बातों को तसल्ली से सुनें तो पिछले दस साल के दौरान पार्टी में भारी बदलाव हो गए हैं और वे एकबारगी समझ नहीं आते.

कमल के फूल के निशान पर चुनाव लड़ने वाली इस पार्टी में इस बार भी कितने ही फूल हैं, जो खिल नहीं सके, क्योंकि उन्हें न तो नमी मिली और न ही उनके मिज़ाज का मौसम मिला.

लेकिन सियासत और मोहब्बत की यह तो बहुत पुरानी रवायत है कि अगर किसी में किसी और की महक बसी हो तो दिल बुझ जाता है.

राजस्थान के मौजूदा हालात कहीं यही अफ़साना तो बयान नहीं कर रहे?

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