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लद्दाख़: सर्द मौसम में सड़क पर प्रदर्शन करने वालों की चेतावनी, 'मांगें नहीं मानी तो होगा आमरण अनशन'
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
लेह में बीते शुक्रवार को कड़ाके की ठंड के बीच हज़ारों लोगों सड़कों पर दिखाई दिए. वे केंद्र सरकार की ओर से किए गए वादे पूरे न होने को लेकर 'गुस्सा' जाहिर कर रहे थे.
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो वो आमरण अनशन करेंगे. वहीं केंद्र सरकार ने स्थानीय प्रतिनिधियों को 19 फरवरी को बातचीत के लिए बुलाया है.
शुक्रवार के प्रदर्शन के दौरान केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख़ को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा नहीं मिलने, दो सांसदों के चुनाव की व्यवस्था नहीं होने और युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों की गारंटी जैसे उन वादों को लेकर लोगों ने अपना आक्रोश जताया, जिसकी घोषणा पांच अगस्त, 2019 में जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता को ख़त्म करने और लद्दाख़ को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के दौरान केंद्र सरकार की ओर से की गई थी.
हज़ारों लोगों की भीड़ ने लेह में सड़कों पर उतरने के अलावा करगिल, जांस्कर और नुब्रा घाटी को भी बंद रखा.
लद्दाख़ के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने बताया कि अगर आने वाले दिनों में लोगों की इन मांगों को पूरा नहीं किया गया तो 'आमरण अनशन किया जाएगा.'
क्यों उतरे सड़कों पर लद्दाख़ के लोग?
'लेह चलो आंदोलन' और 'करगिल बंद' का आह्वान लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायन्स (केडीए) ने किया था.
प्रदर्शनकारी बुलंद आवाज़ में नारे लगा रहे थे, "बहाल करो, बहाल करो, लोकतंत्र को बहाल करो."
बीते साल दिसंबर में भारत के गृह मंत्रालय ने एक हाई पॉवर्ड कमिटी बनाई थी. इसने बाद में लद्दाख़ के कई प्रतिनिधियों से बातचीत की. हालाँकि, उस बातचीत से अभी तक कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला है.
शुक्रवार के विरोध प्रदर्शन से पहले भारत के गृह मंत्रालय ने एक बार फिर लोगों को चर्चा के लिए बुलाने का एलान किया. इसके लिए 19 फ़रवरी 2024 की तारीख़ तय की गई है.
लेह के पोलो चौक पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल सोनम वांगचुक ने कहा, "2019 से लेकर आजतक कई बार ये आश्वासन दिया गया कि लद्दाख़ के लोगों की मांगों को पूरा किया जाएगा, लेकिन कोई वादा पूरा नहीं किया गया है."
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वांगचुक ने बीबीसी से कहा, "19 फ़रवरी को होने वाली बातचीत से हमें कोई उमीद नहीं है, लेकिन हम फिर भी बातचीत में शामिल होंगे."
हालांकि उन्होंने ये भी दावा किया कि अगर बातचीत सफल नहीं होती है तो वे आमरण अनशन पर बैठेंगे. उनके मुताबिक, "जिस तरह से यहां के लोगों की मांगों को अनसुना किया जा रहा है, उसके चलते ही हम लोग सड़कों पर आने को मज़बूर हुए हैं."
केडीए के सदस्य सज्जाद कारगिली ने कहा, "हमारी मांगें भारत के संविधान के दायरे से बाहर की नहीं हैं."
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उन्होंने कहा, "लद्दाख़ को हर तरफ़ से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मौसम की चुनौतियां हैं, सामरिक तौर पर ये संवेदनशील इलाका है, युवाओं के लिए रोज़गार नहीं है. हमारी जायज़ मांगें हैं. इस ठिठुरती ठंड में हम क्यों सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते? सरकार ने अब हमसे कहा है कि आप लिखित रूप में अपनी मांगें सामने रखें. अब हमने ऐसा किया भी है. अगर इसके बाद भी हमारी मांगें पूरी नहीं होती हैं तो हम देश की डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज को साथ लेकर प्रदर्शन जारी रखेंगे."
सज्जाद कारगिली ने दावा किया, "बीते चार वर्षों में लद्दाख़ में एक भी गजटेड पद को भरा नहीं गया है. अब गेंद सरकार के पाले में हैं. सरकार ने खुद हमसे वादा किया था कि लद्दाख़ के लोगों को एम्पावर किया जाएगा. हम एक अलग विधानसभा चाहते हैं, ताकि हमारी नुमांदगी हो सके."
सज्जाद कारगिली ने कहा, "केंद्र शासित प्रदेश में अफ़सरशाही की मनमानी होती है. स्थानीय स्टेक होल्डर्स की कोई हैसियत नहीं होती है. आपने देखा कि बीते चार सालों में किस तरह लद्दाख़ के लोगों को दरकिनार किया गया. लद्दाख़ के लोग मौसमी संकट का सामना भी कर रहे हैं. हमारे प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) दुनिया भर की क्लाइमेट की चुनौतियों की चर्चा करते हैं, अगर वो ऐसा कहते हैं तो फिर लद्दाख़ को भी बचाना होगा.''
वांगचुक ने बताया कि 2019 में बीजेपी ने अपने चुनावी मेनिफ़ेस्टो में लद्दाख़ को सारे अधिकार देने का वादा किया था लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हुआ है.
उनका ये भी कहा है कि हाल ही में लद्दाख़ हिल काउंसिल के चुनाव में भी बीजेपी ने अपने मेनिफ़ेस्टो में लद्दाख़ के लोगों के लिए छठी अनुसूची को लागू करने की बात की थी.
छठी अनुसूची में संविधान के अनुच्छेद 244(2) और अनुच्छेद 275 (1) के तहत विशेष प्रावधान हैं. छठी अनुसूची के लागू होने के चलते ही असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन है. बारदोली कमिटी की सिफारिशों पर संविधान में इस अनुसूची को जगह दी गई. छठी अनुसूची के तहत, जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त ज़िले बनाने का प्रावधान है.
लद्दाख़ की आबादी और चुनौती
पांच अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 हटाकर लद्दाख़ और जम्मू -कश्मीर को अलग करके दोनों को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया.
लद्दाख़ में बौद्ध और मुसलमानों की क़रीब तीन लाख आबादी रहती है. इनमें बौद्ध करीब 46 फीसद हैं, जबकि मुस्लिम करीब 54 फीसद हैं.
लद्दाख़ में दो बड़े ज़िले लेह और करगिल हैं. लेह ज़िले में श्योक और नुब्रा इलाक़े पड़ते हैं जबकि करगिल ज़िले में सरूँ, दरस और जांस्कर इलाक़े आते हैं.
जाड़े में लद्दाख़ के कई इलाक़ों में तापमान शून्य से नीचे माइनस 30 तक चला जाता है. भारी बर्फ़बारी के दौरान लद्दाख़ के इलाक़े क़रीब चार महीनों तक कश्मीर घाटी से कटे रहते हैं.
लद्दाख़ की ज़्यादातर स्थानीय आबादी खेती या फिर अपना कारोबार करती है.
लद्दाख़ हमेशा ही सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील इलाक़ा रहा है.
2020 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख़ में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित गलवान घाटी में काफ़ी तनाव बढ़ गया था. दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई खूनी झड़प में कई सैनिक हताहत हुए थे. दोनों देशों के बीच लद्दाख़ में तब से तनाव की स्थिति बनी हुई है.
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