जब बीबीसी के रिपोर्टर ने सलमान रुश्दी को सबसे पहले ईरान के फतवे की जानकारी दी थी

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- Author, कसरा नाजी
- पदनाम, विशेष संवाददाता, बीबीसी पर्शियन, टेलीविजन
ईरान में जब सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ मौत का फतवा जारी किया गया था तो उनके लिटरेरी एजेंट के जरिए उन तक ये जानकारी पहुंचाने वाला मैं शायद पहला शख्स था.
यह 14 फरवरी 1989 की बात है. मैं सेंट्रल लंदन में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के हेडक्वार्टर में बीबीसी फारसी सेवा के लिए जूनियर प्रोड्यूसर के तौर पर काम कर रहा था. मेरा काम हर सुबह 10.30 बजे तेहरान स्टेट रेडियो पर आने वाले न्यूज बुलेटिन को मॉनिटर करना था.
हम हमारे ऑफिस में बुलेटिन को लाइव सुनते थे.
मैं शायद ये सोचकर विचलित था कि मैंने अपनी गर्लफ्रेंड के लिए फूल ऑर्डर करने में थोड़ी देरी कर दी है. लेकिन तेहरान रेडियो पर प्रेज़ेंटर ने बेहद गंभीरता से जो घोषणा की उससे मैं स्तब्ध रह गया.

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रेडियो पर पढ़े गए फतवे में कहा गया कि रुश्दी के साथ किसी भी भाषा में बुक के एडिटर और पब्लिशर को मौत की सज़ा दी जाए.
"मैं दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले मुसलमानों से बिना किसी देरी के उन्हें मारने का आह्वान करता हूं ताकि कोई भी मुसलमानों की पवित्र मान्यताओं का अपमान करने की हिम्मत ना कर पाए."
क्या हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने एक लेखक को उनके पब्लिशर और एडिटर्स के साथ एक किताब लिखने के लिए मौत की सज़ा सुना दी थी?
मैंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के न्यूजरूम में इस घोषणा की जानकारी दी और रुश्दी की प्रतिक्रिया जानने की उम्मीद के साथ उनके एजेंट को फोन लगाया.
ईरान के कदम की निंदा हुई

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सलमान रुश्दी की किताब 'सैटेनिक वर्सेज़' का ब्रिटेन और पाकिस्तान में विरोध हो रहा था. कई मुसलमानों ने इस किताब को पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने वाला पाया और इसकी निंदा की. लेकिन ईरान में अभी तक शांति थी.
ईरान की सत्ता ने क्रांति की दिशा का विरोध करने वाले ईरान के हजारों लोगों (जिनमें लेखक और बुद्धिजीवी शामिल थे) के ख़िलाफ़ इस तरह मौत की सज़ा की घोषणा की थी. इससे देश में काफी डर पैदा हो गया था.
लेकिन यह पहला मौका था जब किसी दूसरे देश के लेखक के ख़िलाफ़ ईरान के सर्वोच्च नेता ने इस तरह की घोषणा की.
इसके बाद सब इतिहास है. रुश्दी मेरे पास कभी अपनी प्रतिक्रिया देने नहीं आए. मैंने सुना कि वो तुरंत कहीं छिप गए थे. मुझे ये भी याद नहीं मेरे फूलों का क्या हुआ. यकीनन मेरी गर्लफ्रेंड ने मेरी पिटाई नहीं की.
ईरान अपने इस कदम के साथ और अलग-थलग हो गया और इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा भी हुई.
अनुवादकों पर भी हुआ हमला

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किताब का जापानी भाषा में अनुवाद करने वाले अनुवादक हितोशी इगाराशी की 1991 में चाकू मारकर हत्या कर दी गई. इगाराशी टोक्यो की सुकुबा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे.
उसी साल इतालियन अनुवादक एतोरे कैप्रियोलो पर भी चाकू से हमला हुआ, वो बच तो गए थे, लेकिन गंभीर रूप से जख़्मी हुए.
ईरान के राजनयिकों ने कई बार फतवे पर बात करते हुए कहा कि फतवे पर कार्रवाई करना देश का काम नहीं है लेकिन ईरान के मौलवियों ने कभी भी फतवा वापस लेने की घोषणा नहीं की.
ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने एक बार कहा कि उस वक्त फतवा तीर से छूटे कमान की तरह था और आज नहीं तो कल वो अपने टारगेट तक पहुंच ही जाता था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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