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कॉकरोच को कुदरत से कौन सा 'वरदान' मिला है कि ये ख़त्म नहीं होते?
- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अनिल कपूर: कॉकरोच, कॉकरोच...
श्रीदेवी: कॉकरोच, क क क, कहां है, कहां है कॉकरोच, कहां है?
अनिल कपूर: वो, वहां...हमारी तरफ़ देख रहा है.
श्रीदेवी: तुम, तुम कॉकरोच से डरते हो?
अनिल कपूर: मेमसाब, डरता तो मैं शेर से भी नहीं हूं, हां मगर कॉकरोच से डरता हूं!
जिन लोगों ने अरुण वर्मा और सीमा के किरदारों से सजी मिस्टर इंडिया फ़िल्म देखी होगी, उन्हें ये सीन ज़रूर याद होगा. एक ऐसी फ़िल्म जो साल 1987 में रिलीज़ हुई थी, पर आज भी मोबाइल या टीवी पर कोई सीन दिख जाए तो नज़रें ठहर जाती हैं.
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लेकिन आज हम ना तो अरुण बने अनिल कपूर की बात करेंगे और ना ही सीमा बनीं श्रीदेवी की. आज बात करेंगे इस सीन के तीसरे किरदार कॉकरोच की, जिसे हिंदी में तिलचट्टा कहते हैं.
वे किचन में इधर से उधर रेस लगाते दिखते हैं, रात के वक़्त रसोई के बर्तनों में घूमते हैं, दरारों से झांकते हैं, एंटीना बाहर निकालकर डराते हैं. और मुसीबत ये है कि बार-बार भगाने के बावजूद लौट आते हैं.
दुनिया में कॉकरोच की यूं तो 4500 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन इनमें से क़रीब 30 इंसानी बस्तियों और बसावट में मिलते हैं. कॉकरोच ब्लाटोडिया ऑर्डर से ताल्लुक से रखते हैं, जिनमें टर्माइट या दीमक भी गिने जाते हैं.
पृथ्वी पर कब से दौड़ रहे हैं कॉकरोच?
एक और ख़ास बात है कि ये कॉकरोच सदियों पुराने हैं. इतने पुराने कि ये डायनासोर से पहले भी थे और आज भी हैं.
इन्हें पृथ्वी के सबसे पुराने कीड़े-मकोड़ों में गिना जाता है. यहां तक कि जीवाश्म से जुड़े सबूत बताते हैं कि कॉकरोच की जड़ें कार्बोनिफ़ेरस दौर से जुड़ी हैं. लेकिन ये दौर था कौन सा?
ये बात है 35 करोड़ साल पुरानी. जी हां, आपनी सही पढ़ा. 35 करोड़ साल पहले भी कॉकरोच मौजूद थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ ज़ूलॉजी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर नवाज़ आलम ख़ान इस बारे में बताते हैं.
डॉक्टर ख़ान ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''कॉकरोच के बारे में सबसे पहले ये जान लीजिए कि ये डायनासोर से भी पुराने हैं. हम पुरानी बात करते हैं तो मिजोज़ोइक दौर की बात करते हैं. डायनासोर इसी दौर में हुआ करते थे.''
''इस दौर में जुरासिक पीरियड भी हुआ, जिन्हें डायनासोर का गोल्डन पीरियड कहा जाता है और इससे पहले कार्बोनिफ़ेरस ऐरा हुआ, जिसमें एनशिएंट लाइफ़, एनशिएंट एनिमल यानी प्राचीन जीव-जंतु पाए जाते थे. कॉकरोच तब भी मौजूद थे. ये क़रीब 30-35 करोड़ साल पहले भी थे, और आज भी हैं.''
मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ ज़ूलॉजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर दुष्यंत कुमार चौहान भी इस बात की तस्दीक करते हैं.
उनका कहना है, ''कॉकरोच, डायनासोर से भी ज़्यादा पुराने हैं. इन्हें इनवर्टिब्रेट ग्रुप में रखा गया है. वर्टिब्रेट जीव-जंतु इनके बाद आए हैं. वर्टिबेट का मतलब है वे जीव, जिनमें रीढ़ की हड्डी होती है. कॉकरोच का आगमन डायनासोर से भी पहले हुआ था. बाकी जीव जो आए, वे इनके बाद वजूद में आए हैं.''
लेकिन इतने लंबे वक़्त तक टिके रहना इतनी बड़ी बात क्यों है? डॉक्टर नवाज़ आलम ख़ान के मुताबिक दिलचस्प है कि करोड़ों साल में अलग-अलग तरह के बदलाव आए हैं. पर्यावरण, मौसम, हालात, सभी कुछ बदले हैं. इन्हीं बदलावों की वजह से तब से अब तक बहुत सारे ऑर्गेनिज़्म या जीव ऐसे हैं, जो ख़त्म हो गए या गायब हो गए. इसका सबसे बड़ा उदाहरण डायनासोर हैं.
''डायनासोर के अलावा और भी बहुत सारे ऑर्गेनिज़्म ग़ायब हो चुके हैं. लेकिन कॉकरोच के साथ ऐसा नहीं हुआ. वे जैसे थे, आज भी कमोबेश वैसे ही हैं. इतने लंबे अरसे में इनमें बदलाव तो आए हैं, लेकिन वे बहुत छोटे-छोटे हैं, कोई बड़ा बदलाव ऐसे देखने में नहीं आता.''
इसलिए कॉकरोच इतने ख़ास हो जाते हैं कि ये करोड़ों साल से बने हुए हैं और साथ ही इनकी शारीरिक संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.
सिर कटने पर भी ज़िंदा रह सकता है कॉकरोच
कॉकरोच का शरीर अपने आप में कुदरत का एक करिश्मा है. इसके शरीर को तीन हिस्सों में बाँटा जाता है. हेड, थोरेक्स और एब्डोमन. हेड सिर हो गया, एब्डोमेन पेट के हिस्से को मान लीजिए और इन दोनों के बीच को थोरेक्स कहा जाता है.
साथ ही आगे की तरफ़ हमें इसके जो दो एंटीना जैसे दिखते हैं, वे इसके सेंसरी ऑर्गन होते हैं, यानी इन्हीं की मदद से वे अपने आसपास के माहौल और सामान को टटोलते हैं.
डॉक्टर दुष्यंत कुमार चौहान ने कहा, ''कॉकरोच के शरीर पर हमें जो काला-गाढ़ा भूरा जैसा खोल नज़र आता है, उसे एग्ज़ोस्केलेटन कहा जाता है. ये काफ़ी मज़बूत होता है और काइटन से बना होता है. एग्ज़ोस्केलेटन को आप बाहरी खोल कह सकते हैं, कॉकरोच की आउटर कवरिंग कह सकते हैं. और ये काफ़ी प्रोटेक्टिव होता है, यानी कि उसे सुरक्षा देता है, उसे बचाए रखता है. पर्यावरण में आने वाले बदलाव और दुश्मन, दोनों से इसकी रक्षा करता है.''
आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि कॉकरोच का सिर कट जाए या कुचल जाए तो भी वह जीवित रह सकता है. लेकिन कैसे?
डॉक्टर नवाज़ आलम ख़ान बताते हैं कि जैसे इंसान के शरीर में दिमाग या ब्रेन होता है, और वह पूरे शरीर को चलाता है, ठीक इसी तरह कॉकरोच के शरीर में गैंगलियोन होते हैं. लेकिन ये सिर्फ़ इनके सिर में न होकर शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होता है. इनके शरीर में बहुत सारे नर्व मिलकर गैंगलियोन बनाते हैं. इनके सिर में भी गैंगलियोन होता है, थोरेक्स में भी होता है और एब्डोमन में भी होता है.
कॉकरोच के सिर में जो गैंगलियोन होता है, उसे सुपराइसोफेगियल गैंगलियोन या सबइसोफेगियल गैंगलियोन बोलते हैं. ये मिलकर ब्रेन का फंक्शन कर सकते हैं, इसलिए इन्हें कॉकरोच का ब्रेन कह दिया जाता है.
डॉक्टर ख़ान बताते हैं, ''अगर कॉकरोच का सिर कट जाता है तो थोरेक्स गैंगलियोन और एब्डोमिनल गैंगलियोन रेस्पॉन्ड करता है और उनकी बॉडी को कंट्रोल करने लगता है. ऐसे में ये एक हफ्ते तक जीवित रह जाते हैं. इंसान नाक या मुंह से सांस लेते हैं. लेकिन कॉकरोच के शरीर में छोटे-छोटे छेद होते हैं, जिन्हें स्पाइरेकल्स कहते हैं. वे इनके रेस्पिरेटरी सिस्टम का काम करते हैं. ये उन्हीं से सांस लेते हैं. ये शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होते हैं तो ये उन्हीं से गैस एक्सचेंज कर सकते हैं, मतलब सांस ले सकते हैं. इसलिए सर कटने पर भी ये ज़िंदा रहते हैं.''
जब ये बिना सिर के सांस ले सकता है, तो फिर हफ़्ते भर में इसकी मौत क्यों हो सकती है?
डॉक्टर ख़ान इसका जवाब देते हैं, ''कॉकरोच बिना खाए एक महीना तक जीवित रह सकता है, लेकिन बिना पानी के यह हफ़्ते भर ही ज़िंदा रह पाता है, क्योंकि यह डिहाइड्रेशन नहीं झेल पाता. अगर इसका सिर कट गया या कुचल गया तो इसका मुंह नहीं बचेगा और उस सूरत में यह पानी नहीं पी सकता. बिना पानी के यह एक हफ़्ते तक गुज़ारा कर जाएगा, लेकिन उससे ज़्यादा मुश्किल है. इन्हें पानी ज़रूर चाहिए होता है, नमी ज़रूर चाहिए होती है.''
कॉकरोच रात में ज़्यादा क्यों दिखते हैं?
आपने गौर किया होगा कि कॉकरोच रात के समय ज़्यादा दिखते हैं और दिन के समय ग़ायब से हो जाते हैं. असल में ये ग़ायब नहीं होते, बल्कि छिपे रहते हैं, लेकिन क्यों?
दरअसल, कॉकरोच नॉक्टरनल होते हैं. मतलब कि ये रात के समय ज़्यादा सक्रिय होते हैं और दिन के समय अंधेरे, नमी वाले हिस्सों में छिपे रहते हैं. ये रात के समय भोजन, पानी की तलाश में निकलते हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि ये अपने दुश्मनों से बचे रहते हैं.
डॉक्टर दुष्यंत कुमार चौहान बताते हैं, ''कॉकरोच अक्सर आपको रसोई और वॉशरूम में दिखते होंगे. इसकी वजह साफ़ है. खाना और नमी. दरअसल, ये वेस्ट प्रोडक्ट खाते हैं, इसलिए हमारे घरों में अक्सर दिखते हैं. ये खाने की तलाश में रसोई में रहते हैं. दिन में छिपे रहते हैं और रात के समय बाहर आकर खाना और पानी तलाशते हैं.''
उन्होंने कहा, ''ये नॉक्टरनल जीव हैं, इसलिए इन्हें रोशनी पसंद नहीं आती और ये अंधेरे में सक्रिय होते हैं. ये रात में ज़्यादा निकलते हैं. अगर दिन में भी कहीं दिखेंगे तो आप गौर करेंगे कि ये जल्द से जल्द किसी अंधेरे कोने की तरफ़ भागने की कोशिश करते हैं.''
डॉक्टर ख़ान भी इस बारे में रोशनी डालते हैं. उन्होंने बताया, ''कॉकरोच की 4500 प्रजातियों में से क़रीब 30 ऐसी हैं, जो हमारे बीच रहती हैं. ये वहां ज़्यादा रहते हैं, जहाँ मॉइश्चर रहता है. रसोई में इन्हें खाने-पीने का सामान मिलता है और बाथरूम में नमी मिलती है.''
''जीवों की बात करें तो दो तरह के ऑर्गेनिज़्म होते हैं. नॉक्टरनल और डाइअरनल. कॉकरोच नॉक्टरनल होते हैं, ये रोशनी को पसंद नहीं करते हैं, इसलिए छिपे हुए रहते हैं, कोनों में छिप जाते हैं. रसोई और बाथरूम के कोने में अंधेरा मिलता है, नमी मिलती है और खाना भी मिलता है, इसलिए सबसे ज़्यादा कॉकरोच वहीं दिखते हैं.''
परमाणु हमले में भी बच सकते हैं कॉकरोच?
कॉकरोच के जीवनकाल की बात करें तो ये प्रजातियों के हिसाब से अलग-अलग होता है.
कुछ कॉकरोच 150-170 दिन जीते हैं और कुछ का औसत जीवनकाल एक साल तक होता है. डॉक्टर चौहान ने बताया, ''जर्मन कॉकरोच की बात करें तो इसका औसत जीवनकाल 150-170 दिन हो सकता है. मादा कुछ ज़्यादा जीती है, जिनकी उम्र 180 दिनों तक जा सकती है.''
अक्सर ये कहा जाता है कि जब कोई परमाणु हमला होगा तो कोई नहीं बचेगा, लेकिन कॉकरोच बचे रह जाएंगे, इस बात में कितनी सच्चाई है?
इस पर वह कहते हैं, ''इसमें सच्चाई नहीं दिखती क्योंकि जब कभी परमाणु हमला या धमाका होगा, तो बाकी ऑर्गेनिज़्म की तरह कॉकरोच भी हीट से मर जाएंगे. इनका सेल्युलर मेटीरियल बर्स्ट कर जाएगा. यह बात सही है कि कॉकरोच में रेडिएशन को झेलने और बचने की क्षमता 15 गुना ज़्यादा होती है. लेकिन जहां हमला होगा, वहां ये नहीं बचेंगे.''
जानकारों के मुताबिक कॉकरोच के मामले में जेनेटिक मेटेरियल की बात करें तो एडेप्टेबिलिटी कई गुना ज़्यादा है. मतलब ढल जाने की काबिलियत. रेडिएशन के मामले में कॉकरोच की शारीरिक संरचना काफ़ी काम आती है और वह इसे झेल जाते हैं.
डॉक्टर ख़ान ने बीबीसी से कहा, ''परमाणु हमले में कॉकरोच बचेंगे या नहीं, यह सवाल कई बार सामने आता है. ऐसा नहीं है कि जहां हमला होगा, वहां भी कॉकरोच बचे रहेंगे, लेकिन यह भी सच है कि ये रेडिएशन को झेल जाएंगे. हमारे साथ ऐसा नहीं है.''
''इंसानी शरीर के साथ ऐसा नहीं है. वह म्यूटेशन से गुज़रेगा, बीमार हो जाएगा, मौत हो जाएगी. लेकिन कॉकरोच में रेज़िस्टेंस होता है लेकिन उसकी कमज़ोरी है डिहाइड्रेशन. उन्हें पानी चाहिए. पानी न मिलने से वह मर जाता है और बहुत ज़्यादा तापमान में भी जीवित नहीं रह पाता. यह जीव ज़्यादा गर्मी और बहुत ज़्यादा ठंड बर्दाश्त नहीं कर सकता.
और अंत में सबसे ज़रूरी सवाल. कॉकरोच से छुटकारा कैसे पा सकते हैं क्योंकि बार-बार जतन करने पर भी ये लौट आते हैं.
डॉक्टर ख़ान ने इस सवाल के जवाब में कहा, ''सिटरस फ्रूट्स में एक कम्पोनेंट होता है, जिसे लिमोनिन कहते हैं. कई बार कोई गंध हमें अच्छी नहीं लगती, परेशान करती है. ठीक उसी तरह कॉकरोच के मामले में वह लिमोनिन होता है. इसलिए कॉकरोच को भगाने के लिए बाज़ार में मिलने वाले प्रोडक्ट में इसका इस्तेमाल होता है.''
लेकिन कॉकरोच भी कम नहीं हैं. आप देखेंगे कि अगर ये उससे मरते नहीं, और गायब हो जाते हैं तो कुछ देर या दिन बाद फिर दिखते हैं. कैसे?
डॉक्टर ख़ान एक लाइन में जवाब देते हैं, ''क्योंकि कॉकरोच एडेप्टेबिलिटी के मामले में बहुत आगे है. वह इन सभी चीज़ों के हिसाब से ढल जाते हैं, रेज़िस्ट कर ले जाते हैं. यही वजह है कि मुश्किल और बदलते हालात में भी यह करोड़ों सालों से बचा हुआ है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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