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उत्तरकाशी टनल हादसा: लगातार दस दिन तक ऑगर मशीन चलाने वाले नौशाद अली की कहानी
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, उत्तरकाशी से, बीबीसी हिंदी के लिए
17 दिनों की लगातार कोशिशों के बाद उत्तरकाशी की सुरंग में फँसे सभी 41 मज़दूरों को सुरक्षित निकालने की घटना देश-दुनिया की सुर्ख़ियां बटोर रही है.
सुरंग में फँसे मज़दूरों को बचाने में सभी सरकारी एजेंसियों के साथ काम करने वाले चुनिंदा जाँबाज़ों का भी योगदान रहा.
इस अभियान को कामयाब बनाने में ऑगर मशीनों की अहम भूमिका रही.
पूरे अभियान के दौरान इस मशीन का नाम चर्चा में रहा. लेकिन इस मशीन को दिन रात चलाने वाले नौशाद अली को कम ही लोग जानते हैं.
41 वर्षीय नौशाद अली ने बताया, "जो अमेरिकन ऑगर मशीन यहाँ आई थी, उसको मैं ऑपरेट करता हूँ. मैंने 10 दिनों तक लगातार 24 घंटे ऑगर मशीन को ऑपरेट किया."
"मुझ पर एक तरह का दबाव तो था कि इस ऑपरेशन को किसी भी तरह से कामयाब करना है. लेकिन हमारी पूरी टीम मेरा हौसला बढ़ाने के लिए थी."
उन्होंने बताया कि सुरंग में काम करके उन्हें थकान महसूस हो रही थी लेकिन मज़दूरों के सुरक्षित बाहर आने के बाद वो थकान अब दूर हो गई है.
नौशाद अली बताते हैं, "सुरंग में काम करते वक़्त न नींद आती थी और न भूख लगती थी. ड्रिल करते समय बीच में कभी-कभी कई रुकावटें भी आती थी. कभी-कभी काम आसानी से चलता था और कभी-कभी अचानक मलबे में लोहे का जाल आ जाता था जिससे दिक़्क़तें पेश आती थीं."
"ड्रिल करते वक़्त पाँच बार लोहे के जाल का सामना करना पड़ा. जिसके बाद हमने जाल काट कर पुशिंग का काम चालू किया."
उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ियाबाद के मसूरी में रहने वाले नौशाद होरिजेंटल डायरेक्शन ड्रिलिंग के काम पिछले 23 सालों से कर रहे हैं.
नौशाद ने बताया, "ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के साथ काम करते हुए छह साल हो चुके हैं."
उन्होंने बताया कि अमेरिकन ऑगर से पहले वो वेर्मीयर मशीन चलाते थे और अब वह अमेरिकन ऑगर और एचके हेरीकनेक्ट दोनों मशीनें चलाते हैं.
नौशाद ने बताया, "टनल में जिस ऑगर मशीन को चलाना पड़ा वो 600 टन की थी. कंपनी को यह लगा था कि मैं ही इस ऑपरेशन में बेस्ट परफ़ॉर्मेंस दे सकता था. मुझे ख़ुशी है कि ऑपरेशन कामयाब रहा. यह मेरी ज़िंदगी का अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन भी रहेगा."
जब सारी मशीनें नाकाम हो गईं, तो रैट माइनिंग तकनीक से काम करने वाली टीम को बुलाया गया और इस टीम ने पुशिंग तकनीक से काम करते हुए मज़दूरों तक पहुँचने का रास्ता बनाया.
इस टीम के लीडर वक़ील हसन ने पूरे अभियान के बारे में बताया, "जब सारी मशीनें नाकाम हो गईं, तब हमें बुलाया गया और हमने मज़दूरों को बचाने के लिए ना केवल अपना काम किया बल्कि खुद को साबित भी किया. मुझे मिलाकर हमारी टीम में कुल 12 लड़के थे और हम सब ने लगातार 24 घंटे काम किया है."
इस टीम में शामिल मुन्ना क़ुरैशी ने बताया, "हमें बताया गया था कि हमें क़रीब 12 मीटर पाइप मलबे में डालना है. जब हम काम पर लगने जा रहे थे, तो इन्होंने ऑगर मशीन लगाई, जो अंदर जाकर फँस गई."
उन्होंने बताया, "उसकी वजह से हम तीन दिन बैठे रहे. जब हमारा काम शुरू हुआ तो हमने इनको 24 घंटे का समय दिया था. जिसके बाद हमने 26 घंटे में पाइप डाल भी दिया. जब हमारे लड़के अंदर पहुँचे, तो अंदर मौजूद 41 लोगों से मिले, तो उन्हें बहुत ख़ुशी हुई. उन लोगों ने कहा कि हमें मुन्ना भाई से मिलना है, जिसके बाद मैं उनसे मिला. उन लोगों ने मुझे गले से लगाया और एक चॉकलेट भी दी."
जब ऑगर मशीनों ने काम करना बंद कर दिया
मुन्ना क़ुरैशी बताते हैं, "उन्होंने मुझसे बोला कि आपको क्या चाहिए? उन्होंने कहा कि आपको जान चाहिए, दौलत चाहिए या भगवान का ओहदा चाहिए. मैंने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा कि मुझे बस आपका प्यार चाहिए. उस वक़्त मुझे ऐसा अहसास हो रहा था कि न जाने मुझे क्या मिल गया."
इस टीम में शामिल मोहम्मद नसीम ने बताया, "सुरंग में काम करने के दौरान मलबे में दबे सरिए, पाइप और लोहे की चीज़ें आईं. लेकिन रास्ते में आए लोहे और पत्थरों को हमने काटा."
वहीं मोहम्मद राशिद ने बताया कि उनके सामने मज़दूरों को बचाने का लक्ष्य था.
उन्होंने कहा, "हमारे मन में लोगों को बाहर निकालने का जज़्बा था. पाइप तो हमने 15 मीटर ही डाला, अगर 50 मीटर भी डालना होता, तो वह भी डाल देते."
वे जवान जिन्होंने मज़दूरों को निकाला
इस मिशन को पूरा करने में एनडीआरएफ़ की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण थी.
एनडीआरएफ़ के जवान मनमोहन ने बताया, "हमारी तीन-तीन लोगों की 12 सदस्यीय टीम थी. रैट माइनिंग तकनीक से काम कर रहे लोगों ने जब मिट्टी निकाली, उसके बाद मैं टनल के अंदर गया. टनल के अंदर पहुँचने के बाद जैसे ही मैं मज़दूरों के पास पहुँचा, तो वह लोग इतने उतावले और ख़ुश थे कि उन्होंने जयकारा बोला- एनडीआरएफ़ की जय हो."
"मैंने उन्हें बोला कि आप लोग घबराएँ नहीं. मेरे बाद सचिन, प्रदीप और विनोद पहुँचे. फिर मैंने सचिन के साथ नोटल रोप बनाया और उसके माध्यम से नीचे गया. मैंने उन्हें कहा कि हम आपकी जान बचाने आए हैं, हम आपको बाहर ले जाएँगे."
एनडीआरएफ़ के जवान सचिन ने बताया, "हम वेल ट्रेंड सोल्ज़र हैं, तो परेशनियाँ होना हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं. हमारे सामने यह चैलेंज था कि कैसे उन लोगों को सुरंग से निकाला जाए. हमने हमारे मज़दूर भाइयों को बाहर निकाला, तो हमें अच्छा लगा और साथ ही पूरे देश को भी अच्छा लगा."
"हमने ज़्यादा उम्र के लोगों को स्ट्रेचर पर स्टेबल करके, एल्बो और नी पैड लगाकर भेजा. जो चलने की स्थिति में थे, उनको एल्बो और नी प्रोटेक्टर लगाकर भेजा."
ऑपरेशन को कामयाब बनाने की थी ज़िम्मेदारी
इस मिशन के दौरान टनल में काम करने वाले मज़दूर हो या फिर अधिकारी, सभी की नींद उड़ी रही.
इस ऑपरेशन की कामयाबी के बारे में बातचीत करते हुए एनएचआईडीसीएल के कार्यकारी निदेशक संदीप सुधेरा ने बताया, "सुरंग में फँसे मज़दूर हमारे देश के ही बच्चे थे. इनको बाहर निकालने का ज़िम्मा हमारा था."
"हमें ख़ुशी के साथ संतुष्टि भी है कि हम इनको बाहर निकाल सके. उन्हें निकालने में थोड़ी देर ज़रूर हुई, लेकिन हमें पता था कि वे लोग सुरंग में सुरक्षित हैं. उनको वहाँ खाना और पानी मिल रहा था, और हम उनको सेफ़्टी से निकालना चाहते थे."
उन्होंने बताया कि इनके रेस्क्यू के समय किसी को भी किसी तरह की चोट भी नहीं लगी, इस बात की भी संतुष्टि है.
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